Tuesday, May 31, 2011

मेरी आदमीयत....


जमाना बदल रहा है, लोग विश्वास का दिखावा कर रहे हैं और पीठ पीछे धोखा कर रहे हैं। इसी विश्वास के नाम पर की जाने वाली ठगी का शिकार मैं भी हूँ।मेरे अपने और पुराने शहर में ही मेरे साथ छल किया गया। इस बदले ज़माने में ये बात मैं अब आम मानता हूँ। मुझे लगता है कि लोगों कि महत्वाकांक्षाएँ ही इतनी ज्यादा हैं कि किसी पर तोहमत लगा कर आगे बढने में कोई हिचकिचाहट नहीं है। अगर बस चले तो स्वार्थ के लिए दूसरे की हत्या करवाने से भी गुरेज नहीं कर सकते हैं। लेकिन ये खुद के जज्बें हैं कि इस वार को भी झेल कर अपना संतुलन नहीं खोता हूँ। अगर इन्हें शब्दों में बाँधे तो कुछ इस तरह निकल कर आ सकता है।

विश्वास की हथेली पर रखा गया धोखा
आत्मीयता के हवाले किया गया छल
फिर भी ज़िन्दा रहा आदमी की तरह,
बार-बार धोखे और छल से गुज़रकर।
ढकेला गया पहाड़ से नीचे बार-बार
बार-बार आग में डाला गया ज़िन्दा
डाला गया बार-बार समुद्र के तल में
निकला फिर भी सही और साबित
बचा रहा--- बचा रहा आदमीयत फिर भी।

Tuesday, May 17, 2011

मोहसिन कौन...


आज ज्यादा लिखने का ना तो मन कर रहा है और ना ही फुरसत ही है। डॉक्टर के पास जाना है , पिछले कई दिनों से उलझन में था, उससे निकले के कोशिश कर रहा हूँ। इस उलझन में मैं जब जब अनयास बैठा रहता हूँ, उस समय कई विचार घेरते रहते हैं। कई बार तो सोंचते सोंचते मन कई दिशाओं में घूमने लगता है जिसे देखकर जीवन से ही विरक्ति होने लगती है। लेकिन मेरी विरक्ति से किसी को फायदा भी जरुर होता है... मेरी इस अवस्था पर वो बेहद जश्न भी मनाते हैं....।फिर भी आपका साथ है जिससे एक बार फिर बिखरने से पहले ही जुड जाता हूँ और यायावरी शुरु हो जाती है....


देख कर आवाम यही कहता,
हर बार ही रहता कहीं ख्वाबों में,
तो कहीं किसी का मुन्तजिर रहता हूँ,
मैं कहता हूँ कि मैं कोई मोहसिन नहीं
मसलक को ख़्याल कर चलता हूँ,
और ये कवायद बेज़ा नहीं मेरे मुन्सिफ
अपने आप को भूलने की,
कोशिश हर बार करता हूँ।

Monday, May 16, 2011

अँधेरे से मुकाबला जारी...


अगर कोई जबरदस्ती कहे कि मैं आपका ही हूँ, और आपने मुझे छोड दिया है। तो ये बातें उसी तरह लगती हैं जैसे सोनिया गाँधी से नरेन्द्र मोदी कहे कि मैं तो कांग्रेस का ही हूँ और आपने मुझे छोड दिया है। जो खुलेआम आपकी इज्जत की धज्जियाँ उडा दे,सरेआम आपको गालियों से सराबोर कर दे वही आप से कहे कि मैने तो कुछ किया ही नहीं तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। मेरे साथ ये कई बार से हो रहा है, हर बार आरोप पर आरोप ही लग रहे हैं। चलो इसे भी सहते हैं। कहते हैं कि हमारे इसी भारत वर्ष में कृष्ण और शिशुपाल भी हुए थे। कृष्ण ने वचन दे रखा था कि एक लगातार शिशुपाल 100 गलतियाँ लगातार करेगा तभी उसे सजा देगें वरना नहीं। लेकिन गलतियाँ पूरी होने के बाद शिशुपाल मारा भी गया। मैं ना तो कृष्ण हूँ ना ही कभी कोई ऐसा व्यवहार करने की तमन्ना रखता हूँ। लेकिन हाँ ये जरुर है कि हिसाब किताब जरुर रख रहा हूँ। क्या पता कभी इंडियानामा में कुछ नया लिखने को मिल जाए आज कल मैं इंडियानामा में समाज के उस स्वरुप को दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ, जो सीधा लोगों से जुडा है। उस कडी में मैं रहूँ या कोई और रहे। लेकिन हकीकत यही है कि बदलते दौर में बगैर अपनी गलतियों को देखते हुए आरोप लगाना आसान हो गया है। मैं मानता हूँ अगर मैं किसी पर आरोप लगा रहा हूँ तो कम से कम आचरण तो ऐसा करुँगा कि मुझे दोषी नहीं ठहराया जा सके। लेकिन ऐसा नहीं है। पिछले ब्लॉग में मैने लिखा ही है कि पंडित सोई जो गाल बजावा अक्षरस: सही है। हल्ला मचाओ किसी की सूनो नहीं अपनी मन गढंत बातें घूम-घूम कर कहो हर तरह का क्षद्म उपयोग में लाओ जिससे लोग तुम्हारी झूठी बातों को भी सच मानने लगे। यही है आज कल अपने आप को काबिल साबित करने के तरीके।
अब लिजिए ना पिछले ही दिन बंगाल सहित बाकी राज्यों में चुनाव हुए। उन चुनावों में क्या जीत कर आने वाले दूध के धुले हुए, हैं मेरे ख्याल से तो बिल्कुल नहीं। ममता बनर्जी हो जयललिता दोनों ही अपने लोगों के सामने जाहिर किए गए उसूल से विपरीत हैं। 1991 में जयललिता के यहाँ गए जाँच दल ने गहने कपडे सहित पैसे और मँहगी साडियों के खान को ही सामने लाया। वहीं ममता बनर्जी तो कहतीं कि वो हवाई चप्पल और सूती साडी ही पहनी हैं, लेकिन चुनाव के दौरान प्राइवेट जेट और हैलीकॉप्टर की सेवा लेने में हिचकी तक नहीं। आखिर पार्टी के पास इतना पैसा आया कहा से। इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
ये बडे लोग और राजनेता हैं किसी आम इन्सान के बारे में बात करें। मेरा एक मित्र है जो आजकल अपने परिवार से अलगा एकाकी रह रहा है उसके मुताबिक उसके परिवार के सदस्य उसका साथ इसलिए छोड दिया क्योकि वो गलत है। लेकिन मैने जिस तरह के साक्ष्य और सबूत देखे उसमें यही लगता है कि गलत वो नहीं ब्लकि उसके परिवारवाले हैं। लेकिन लोगों ने उसके बारे घूम घूम कर ऐसा कुप्रचार किया जिससे कई बार तो उसके हिम्मत टूटते हुए मैने देखा। फिर मैने उसे ढाढस बँधाया और कहा कि मानव हो कभी भी हिम्मत नहीं हारो । ये तुम जानते हो और तुम्हारा ईश्वर जानता है कि तुम कितने सच्चे हो, इसलिए कभी ये मत सोचो कि इन्साफ नहीं मिलेगा। जरुर मिलेगा ये तो तुम्हारी परीक्षा की घडी है कि तुम विकट परिस्थितियों में कैसा आचरण रख रहे हो। कुछ दिनों के बाद धीरे धीरे जीवन सामान्य होने की कगार की तरफ बढने लगा।
इस बात से मुथे यही कहना है कि कष्ट उसे बहुत हुआ क्योकि गलत बाते उसे ना तो जीने देती थी और ना ही मरने क्योकि कलंक लेकर ना तो जीया जा सकता है और ना ही मरा। ईश्वर दुशमन को भी इस परिस्थिती में ना जाले। लेकिन सामनेवाले बडे चैन से जीवने के मजे जी रहे थे। मुझे तो लगता है कि ऐसे आरोप लगाने वाले और आरचरण करने वालों के पीछे कोई ऐसी मानसिकता होती होगी जिससे उनके अहं की संतुष्टी मिलती होगी कि हाँ वो श्रेष्ठ हैं। मैं तो केवल यही कहूँगा......
पी जा हर अपमान और कुछ चारा भी तो नहीं !
तूने स्वाभीमान से जीना चाहा यही ग़लत था
कहाँ पक्ष में तेरे किसी समझ वाले का मत था
केवल तेरे ही अधरों पर कड़वा स्वाद नहीं है
सबके अहंकार टूटे हैं,वो अपवाद नहीं है
ग़लत परिस्थिति ग़लत समय में ग़लत देश में होकर
क्या कर लेगा तू अपने हाथों में कील चुभोकर
चाहे लाख बार सिर पटको दर्द नहीं कम होगा
नहीं आज ही, कल भी जीने का यह ही क्रम होगा
माथे से हर शिकन पोंछ दे, आँखों से हर आँसू
पूरी बाज़ी देख अभी तू हारा भी तो नहीं।

Sunday, May 15, 2011

अभिमान...


कुपथ कुपथ जो रथ दौडाता पथ निर्देशक वह है, लाज लजाती जिसकी कृति से नीति उपदेशक वह है....। ये बातें मैंने बचपन में ही सुनी थी। लेकिन अनयास आज याद आ गया। दरअसल अपने ही इमेल को देखते देखते कई बातें ऐसी देखी, जिसे देखकर पहले तो हँसी आई, फिर सोचा चलो लोगों का मन है जुबान है मीटर तो लगा है नहीं जो मन में आए दूसरे पर थोप दिया। चलो अच्छा ही है जिसको जो मर्जी कह ले, किसने रोका है। आरोप ही लगाने है कोई इसके बारे में पूछता थोडे ही ना। एक कहावत और भी है---पंडित सोई जो गाल बजाए...।स्पष्ट है कि लोग ज्ञानी उसी को मानते हैं जो अपनी बात मनवाने को लिए हर तरकीब का इस्तेमाल करे। अपनी बातों को सही साबित करने लिए भले किसी और पर लांक्षन ही क्यों ना लगाने पडे पीछे नहीं हटेंगे। ये भारत वर्ष है लोग हकीकत थोडे ही ना जानने की कोशिश करते हैं, आइने के आगे के चेहरे को देखते हैं,आइने के पीछे छुपे चेहरे को देख ही नहीं पाते हैं। ना ही उस चेहरे के पीछे की मानसिकता को समझ पाते हैं। मैं बेहद मुश्किल से उस चेहरे को देखा, देखते ही अचंभिक हुआ और थोडा सहमा भी आखिर कोई ऐसा भी हो सकता है क्या। मैं अपने आप को ऐसा अनुभवी नहीं मानता हूँ कि हर बारीकियों को समझ सकूँ, लेकिन कहते हैं-आवश्यकता पडने पर ही आविष्कार होता है। मेरे साथ ये शब्दश: चरितार्थ होता है। पिछले एक साल की अवधि ने कई बार ये अनुभव दिलाए कि जिससे आज मैं ये कह सकूँ कि – "हाँ मैं छला गया"। मेरा मन तो पहले यही किया कि सच्चाई दिखा दूँ लेकिन मेरे खुद के संस्कार ने ऐसा करने से रोका, सोचा यही कि –कीचड में जाने पर खुद अपने ही पैरों में कीचड लगते हैं..। मैने ना तो पलट कर कुछ जवाब ही दिया और ना ही अपनी बात को ही रखी लोग समझते गए कि मैं गलत हूं, लेकिन जो बातें और हकीकत मेरे सामने आई पूरे कुनबे को देखकर और भी हँसी आई कि लोपुलता किसी को इतना भी घेर सकता है कि सच्चाई जानते हुए भी सच्चाई से मुँह मोडे और ये कहे कि ये तो मेरी मजबूरी है। खैर जो भी हो लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में तो बेहद सही है। एक बात और है जब लोग सच्चाई जानते हुए भी सच्चाई से आनजान बनते हैं तो उसे-धृटराष्ट्र मोह की संज्ञा देते हैं। इसके जरिए यही साबित होता है कि उनका सोना सोना है दूसरे का खरा सोना भी पीतल। हर बार धृटराष्ट्र मोह से ग्रसित लोग अपने ही आँगन के नीम को कल्पतरु कहते हैं। मैने कभी भी किसी को ऐसा सोंचने का मौका नहीं दिया, हर किसी को बराबर मौका दिया। ना तो मैं कभी याचक रहा हूँ, ना ही कभी किसी से कोई उम्मीद ही बाँधी है। क्योकि मेरे ही बुजर्गों ने मुझे सीख दी है कि –अपनी भुजा की ताकत पर विश्वास करो। आज शहर दर शहर आने जाने पर भी अपनी भुजा की ताकत के बदौलत ही अपनी पहचान और जगह बनाई है। भले ही इसके लिए कोई घमंड कहे या कुछ और। लेकिन एक बात दृढ सत्य है कि मुझे अपने आप पर अभिमान है। आज जो साक्ष्य मिले हैं उन्हे देखकर तो यही लगता है कि, कपडे बदलने के मानिन्द विचार तो बदले ही,लोगों ने अपने संबंध को भी बदला साथ में नए लोगों के आगोश में भी घिरते चले गए। हाँ बात की शुरुआत जहाँ से मैने की थी फिर एक बार वहीं आता हूँ, लोग नीति और ज्ञान आजकल वही दे रहे हैं जो सदैव नीति विरुद्ध काम करते रहे हैं। समाज में ये बदलाव होरहै है चाहे वो राजनेता हो या कोई आम इन्सान। बदलते परिवेश ने आपसी प्यार को तो कब का खा गया, लोक लाज को भी सुरसा की तरह लील रहा है। आज यही धारणा है कि पैसा कमाना है भले ही किसी तरह से हो पैसे के बल पर दूसरे को नीचा दिखाना है चाहे वो किसी तरह से क्यो ना आए कुछ दिन पहले एक बात प्रचलित हुई थी कि-- पैसा खुदा से कम नहीं है...। मेरा मानना है कि ऐसी मानसिकता रखनेवालों के लिए गहने और पैसे ही सबकुछ हैं, पैसा ही मीत पैसा ही खुदा पैसे से बढकर कुछ नहीं। आप भी कहेंगे कि कहाँ कि बाते कह रहे हैं तो मैं मानता हूँ कि देश में जो पैसे को लेकर खेल मचा है वो आज हर घर में प्रवेश कर गया है। खासकर वहाँ तो और जहाँ दिखावे की होड है। लेकिन अगर जिसने भी पैसे के लिए अपने ज़मीर और उसूल को नही छोडा मुझे लगता है उसे यही सहना पडा होगा...
जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद तय किया
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा,
तब तब या तो मुझे
आग के दरिया में कूदना पड़ा
या उन्होंने अपने आरोप और अपमान के अग्निदंश से
मुझे जीवित लाश बना दिया।
घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में;
और जब भी मेरे होठों से निकलता है एक 'ना'
तो वे सारी नफ़रत
सारा तेजाब
उलट देते हैं मेरे मुँह और आत्मा पर।

छला गया मैं...



मैं अपने आप से ये सवाल करता हूँ कि दुनिया में बहुत सारी घटनाएँ आस पास घट रहीं हैं लेकिन इनसे कहीं दूर होता जा रहा हूँ। ये सब देखते हुए लग रहा है कि मैं कहीं अपने उद्देश्य से भटक तो नहीं गया हूँ। शायद हाँ ...., लेकिन सच मानिए तो नहीं हाँ आज मेरे देखने का दायरा शायद कुछ दूर तक ही सिमट गया है व्यापक नहीं रहा। जो दंश मैं झेल रहा हूँ इन परिस्थितियों में यही केवल उचित जान पड रहा है। उम्मीद है कि इस जहर को जल्द ही पी जाउँ और फिर से चिर परिचित समाज में हँसी खुशी से फिर लौट सकूँगा...शब्दों के रुप सें शायद यही उधेडबुन है....

घायल हो गया हूँ मैं
समय ने छला है मुझे
एक तुम हो कि
चमड़ी हटे भाग को
बार-बार छूते हो
खेलते हो मेरे घाव से
मुस्कुराते हो
जब-जब भी मैं
कराहता हूँ दर्द में
प्यार की परिभाषा के इस पक्ष को
समझना चाहता हूँ मैं सचेतन,
अँधेरे के गर्भ में पल रहे
श्वेत अणुओं से
कुछ सार्थक सवाल करना चाहता हूँ मैं
जानना चाहता हूँ
तुम्हारे दिए पीड़ा की समय-सीमा को,
विदा होना चाहता हूँ मैं,
साथ में जानना चाहता हूँ मैं
तुम्हारी मुस्कुराहट की अबूझ पहेली को....।.

Sunday, May 8, 2011

मैं कौन हूँ....


मैं कौन हूँ....
एक सवाल बराबर मुझे कौधता रहता है कि आखिर मैं हूँ कौन। कई बार मैं अपने आप से कहता हूँ कि मैं ही ब्रह्म हूँ, लेकिन ये कहने के पीछे मेरा तर्क है कि मैं अपने आप को हर किसी के समाप मानता हूँ, इसलिए ये मेरा विचार है। मुझे लगता था कि जिस तरह से मैं लोगों को भूल नहीं पाता हूँ, लोग भी शायद मुझे भूल नहीं पाते होंगे। लेकिन मैं गलत हूँ । इस बात का अहसास आज मुझे हो गया। वास्व में लोगों ने कभी मुझे याद ही नहीं रखा था तो भूलना तो स्वाभिक था ही। हर बार दोष मेरे उपर आया कि मैं अपने अहम में रहता हूँ, और किसी का सम्मान नहीं करता हूँ । ये आरोप सरासर गलत है इसे तो आजन्म मैं नकारता रहूँगा। खैर अपनी बातों को और आगे नहीं बढाउँगा क्योकि ये इन्डियानामा है ना कि मेरा खुद का वृतांत चलिए आपको एक कविता नज़र करुँ.....
इतने आरोप न थोपो
मन बागी हो जाए
मन बागी हो जाए,
वैरागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो...
यदि बांच सको तो बांचो
मेरे अंतस की पीड़ा
जीवन हो गया तरंग रहित
बस पाषाणी क्रीडा
मन की अनुगूंज गूंज बन-बनकर
जब अकुलाती है
शब्दों की लहर लहर लहराकर
तपन बुझाती है
ये चिनगारी फिर से न मचलकर
आगी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो... !!
खुद खाते हो पर औरों पर
आरोप लगाते हो
सिक्कों में तुम ईमान-धरम के
संग बिक जाते हो
आरोपों की जीवन में जब-जब
हद हो जाती है
परिचय की गांठ पिघलकर
आंसू बन जाती है
नीरस जीवन मुंह मोड़ न अब
बैरागी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो... !!
आरोपों की विपरीत दिशा में
चलना मुझे सुहाता
सपने में भी है बिना रीढ़ का
मीत न मुझको भाता
आरोपों का विष पीकर ही तो
मीरा घर से निकली
लेखनी निराला की आरोपी
गरल पान कर मचली
ये दग्ध हृदय वेदनापथी का
सहभागी हो जाए
मन बागी हो जाए.......