Wednesday, September 13, 2023

चीन के BRI के जवाब में भारत का IMEC

 


व्यापार के रास्ते अगर सुगम हो तो वह इलाका निश्चित तौर पर ज्यादा तरक्की करता है। इतिहास गवाह है कि किसी भी देश ने जब भी किसी के उपर हमला किया है तो इसके पीछे निश्चित तौर पर कारण आर्थिक ही रहा है। आज भी विश्व में जो राष्ट्र आर्थिक रुप से मजबूत है उसकी बात सुनने के लिए वो देश आतुर है जो उनकी सहायता चाहता है य़ा जो उनसे कमजोर है। चीन अब विकासोन्मुख नहीं विकसित राष्ट्र है। इसका कारण भी रहा है कि विश्व के हर कोने में वहाँ के बने सामग्रियों का बाजार। यानि चीन की नई विस्तारवादी नीति का सूत्र वाक्य बन गया है कि “सामान हमारा, इलाका हमारा”। जिसका मतलब है कि अगर हमारा सामान किसी अन्य राष्ट्र के बाजार में पहुँच गया मतलब साफ है कि वहाँ कब्जा जमाया जा सकता है। चीन की महत्वाकांक्षी योजना Belt Road Initiative साल 2013 में शुरु किया गया है। जिसके तहत चीन को सीधे यूरोपीय बाजार से जोडा जाए। चीन उज्बेकिस्तान और रुस होते हुए ये व्यापारिक रास्ता यूरोप को जोडने के लिए बनाने का का सरा विचार रहा है। हालाकि इस मुद्दे पर काम करते हुए चीन ने इसे नए सिल्क रुट की तर्ज पर विकसित करने के लिए कई इलाकों में इन्फ्रास्ट्रक्रचर का निर्माण शुरु कर दिया है। इस निर्माण की कवायद ने अमेरिका और अन्य राष्ट्र चीन के इस नीति के खिलाफ हैं विश्व व्यपार के लिए खतरा मान रहें है। लेकिन इस संभावित खतरे से निपटने के लिए कुटनीति के साथ विकल्प की जरूरत थी। जिसकी अगुआई भारत ने की है। भारत ने रूस और मध्यपूर्व राष्ट्र के साथ मिलकर भारत-मिडिल ईस्ट- यूरोप गलियारा India Middle East Europe Corridor  पर आपसी सहमति G-20   के दिल्ली शिखर सम्मेलन में संबिधित राष्ट्रों से करवा लिया। व्यापार का नया अवसर किसी एक का एकाधिकार नहीं रहने से अब विकल्प ज्यादा दिखने लगे। क्योकि चीन के एकाधिकार और बाजार पर हर तरीके से कब्जा करने वाली नीतियों के सामने विकल्प दिखाई देने लगा जो व्यपारिक हितों के लिए बेहतर है, तो विश्व भर से इसके लिए सराहना मिली। अमेरिका जो पहले से ही चीन से त्रस्त था इसे विकास को बढाने वाला गलियारा कहा। मित्र राष्टों ने भारत के कूटनीति की प्रसंशा करने के साथ ही बढचढ कर हिस्सा लेने की बात कही और इसे दुनिया के लिए बेहतरीन और बदलने वाला बताय। दरअसल ये रास्ता कुछ हिस्सा समुद्र और कुछ हिस्सा रेल मार्ग जो जुडेगा जो कुछ इस प्रकार होगा भारत से यूएई के जाबेल अली तक सामान समुद्र के रास्ते फिर इस्त्राइल के हाइफा तक रेल मार्ग से। इसमें दूसरा चरण होगा इस्त्राइल के ग्रीस का रास्ता जलमार्ग से जो यूरोप का गेटवे हो। इसके बाद के अन्य हिस्सों में इसे आसानी से पहुँचाया जा सकता है। जाहिर है कि चीन और उसके समर्थित राष्ट्रों को इससे बडा झटाका लगा है। क्योकिं चीन ने अपने Belt Road Initiative प्रोजेक्ट में जिन लोगों को साथ लेकर काम कर रहा है उन्हें ये नागवार गुजरेगी , जिनकी सारी संभावानाएँ इसी से जुडी थीं वो इसका विरोध भी करेंगे। लेकिन जो मजबूत राष्ट्र है जो चीन के प्रजोक्ट के साथ जुडने के अलावा भारती के इस विकल्प से जुट कर अपने हित के साथ ही विश्व में एक बेहतरीन माहौल बनाने के लिए इसे एक भविष्ट का कॉरिडोर मान रहे हैं। भारत के राजनैतिक मजबूत और दूरदर्शिता का ये मिसाल बनेगा जो भविष्य में लाभ ही पहुँचाएगा।    

Saturday, April 22, 2023

देश की सही दिशा

यात्राओं का सिलसिला यूँ तो बरकरार रहता ही है, लेकिन लंबें अंतराल के बाद ये महसूस होता है कि देश की दिशा बदल रही है। मसलन अब राह तरक्की की ओर दिख रही है। वैसे मैं अपने नजरिए से इसे देख रहा हूँ इससे आप सहमत हैं कि नहीं इस बात से मैं अनजान हूँ। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि विश्व स्तर पर भारत की छवि को देखकर ये जरूर कह सकता हूँ कि अब बदलती हुई दिशा अब बेहतरी के लिए है।जब कोई भी भारतीय राजनयिक आज से पहले विदेश यात्रा पर रहता था, तो उसकी छवि मजह औपचारिकता पूरा करने भर की थी, क्योकि ना तो कोई बेहद इज्जत मिलती थी और ना ही उसे अपनी बातें खुलकर कहने की आजादी ही थी। क्य़ोकि हम तीसरी दुनिया के सबसे पिछडे देश के रूप में जाने जाते थे। लेकिन अब नहीं सबको एक समान देखने को मजबूर हमने किया है। जिससे हमें हमारा खोया सम्मान मिल सके।

                              बहुत दिनों के बाद शब्दों को पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ, शायद इससे आप लोग के बीच एक बार फिर पहले की तरह गुफ्तगू कर सकूँ। कुछ बातें अधूरी रह गई हैं, चर्चा जारी रहेगी । 








Tuesday, May 5, 2020

इंडियानामा...: एक बार फिर पुरानी शुरुआत

इंडियानामा...: एक बार फिर पुरानी शुरुआत: एक बार फिर  पुरानी शुरुआत ,,, जाने कितने दिन और साल बीत गए .., शायद साल दर साल लग गए हैं।अब ये अलग बात है कि इस दौरान मेरे लिखने और आप ल...

एक बार फिर पुरानी शुरुआत

एक बार फिर  पुरानी शुरुआत ,,,
जाने कितने दिन और साल बीत गए .., शायद साल दर साल लग गए हैं।अब ये अलग बात है कि इस दौरान मेरे लिखने और आप लोगों से रुबरु होने के कई कारण थे, लेकिन मैं आप लोगों के सामने मुखाबित नहीं हो सका।इसके लिए खेद है । दरअसल ये समय का चक्र कुछ ऐसा था कि मैं आप लोगों से दूर चला गया था, आप सभी एक बैधिक पाठक हैं आप लोगों की आलोचना और सुझाव सदैव मेरे लिए महत्वपूर्ण रहें हैं इसलिए मैं आप लोगों  से मुखातिब होते रहता हूँ, कदापि दूरी रखना नहीं चाहता यही कारण है कि एक बार फिर पुरानी शुरुआत है ये । ये शुरुआत वहाँ से है जहाँ से मैं आपसे दूर हो गया था, मै आपसे उस मोड पर अलग हो कर आया था, जहाँ मैने लिखा था कि एक युग का अंत हो गया, हकीकत ही है एक युग का अंत हो चुका है। आज का दौर ना तो हमने कभी सुना था और ना ही कभी सोचा ही था कि इस तरह के भी समय आ सकते हैं। महामारी से लेकर अर्थव्यवस्था के उछल पुथल तक सबकुछ गडबड सा हो रहा है। आप सभी कई दिनों से अपने अपने घरों में बंद हैं , एक अघोषित भय सा सबके मन में घूम रहा है कि अगला पल कैसा होगा इस बात से अनजान हैं।इन बातों पर पर विस्तार से चर्चा जरूर करूँगा।फिलहाल मैंने संवाद की शुरुआत कर दी है इस संवाद को आगे बढाते रहेंगे। अभी आप सबों से बहुत बातें करनी है , कुछ विचार साझा करना है । इस सफर को आगे बढाते चलते हैं। 

Friday, August 17, 2018

एक युग का अंत

"
किधर है मेरा किसलय " ये वो शब्द हैं जो पटना गाँधी मैदान में गूँजे थे , देश की महान विभूति ने अपने बचपन को तब खोजा जब  महज 5 और 10 साल के बच्चों का अपहरण का दर्द हर कोई सह रहा था। बिहार के शासन को "जंगल राज " के नाम करण की शुरूआत इसी मंच से हुई थी साल 2005 में।युग पुरूष पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस जंगल राज का नाम करण किया था। मेरा किसलय ये शब्द जब मंच गूँजे तो क्षण भर के लिए ही सही अपार अर्थ और लोगों के जनमानस को झकझोर देने वाला रहा। आज भी उन के जरिए कही गई बातें सार्थक दिख रही है कि आखिर किस तरह से जंगलराज दशकों तक रहा। हालांकि हालात में सुधार हो रहे हैं और उत्तरोत्तर और भी सुधार हो सकते हैं। यह वही दौर था जब लोग तकरीबन तकरीबन अपने आप से जूझ रहे थे। 90 के दशक में तो पूरी तरह से जंगलराज बनना शुरू हुआ जो 2005 तक आते-आते पूरी तरह से बिहार में परिपक्व हो गया था। हालांकि इस दौरान बीजेपी की सरकार भी बनी ,लेकिन समस्या यह रही कि राज्य सरकार पर कोई बस नहीं चल रहा था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी के भाषण उनकी शैली और उनका व्यक्तित्व शायद ही कोई पा सके। सरल स्वभाव बेहद ही सारे तरीके से रहने की अदा अनयास सबका मन मोह लेती थी। पटना कॉलेज में हम लोग पढ़ते जरूर थे वहां स्टूडेंट यूनियन में कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस के लोगों का दबदबा था लेकिन मन में कहीं ना कहीं एक कोने में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भी हिलोरे मार रहा था। कारण यही था कि उस समय भी जब जब खजांची रोड के ज्ञानदा प्रकाशन और राजकमल प्रकाशन की तरफ रुख होता, तो वहां अटल जी की कविताओं से रूबरू होने का अवसर भी मिल जाता। उन किताबों में से यदाकदा एक- आध कविता पढ़कर हम भी कवि बन जाते। लगने लगता था कि जीवन में यही है इसके अलावा कुछ है ही नहीं। याद है हमें कि उस समय राजनीतिक उठा पटक पर अखबारों में छपी हुई खबरें  हमारे हॉस्टल के न्यूज़ स्टैंड पर गरमा गरम बहस का कारण होती थी। बाद में अटल जी के शासन काल में  किए गए पोखरन परीक्षण पर हम दोस्त मिलकर ये जरूर चर्चा करते कि भारत अब एक सुपर पावर देश बन ही जाएगा। हमें यह ध्यान नहीं था कि इस परीक्षण के बाद कितनी चीजों पर हम पर पाबंदी लगी थी, सरकार किस तरीके से चलती है भले ही उस समय बहुत ज्यादा ज्ञात ना हो क्योंकि उस समय हमारे लिए TV कि दुनिया इतनी बड़ी नहीं थी 24 घंटे का न्यूज़ चैनल नहीं था। लेकिन यह लग रहा था कि भारत की गौरव की बात है। कॉलेज के दिनों में एक हॉस्टल से लेकर दूसरे हॉस्टल के छात्र आपस में जरूर कुछ ना कुछ मुद्दों को लेकर बहस करते थे उन दिनों यह भी मुद्दा एक हुआ करता था कि आखिर सरकारों ने हमारे लिया किया क्या। मुझे अच्छी तरह से याद है कि प्रधानमंत्री होते हुए अटल जी जब कर लो "दुनिया मुट्ठी में " की पहल की महज 500 रुपए में हर किसी के हाथ में फोन आया , भले ही आलोचक इसकी आलोचना करें , लेकिन सपने साकर तो हुए। आज स्वर्ण चतुर्भुज योजना पर सरकार काम कर रही है, इसकी शुरूआत अटल जी की ही देन है।
     अभी हाल ही में मुझे ये जानकर अचरज हुआ कि मंच की शोभा माने जाने वाले अटल जी कई बार लोगों से बिना मंच और जलसे के ही लोगों से मुखातिब हुए । गिरगांव में एक घर के छत से भाषण देकर लोगों का मन मोह लिया था। उनकी ही पंक्तियों में ....
बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

Thursday, April 19, 2018

क्या ख़ता हुई...


मैं हरबार सोचता हूँ कि‌ आखिर क्या ख़ता हुई ,
मुनासिब तो नहीं है आप का ऐसे खफा होना
नहीं हँसना अगर आया तो रोने से ही क्या होना
हजारों लोग हम जैसे सिसकते जो दिलों में ही
बुरा लगता नहीं है अब हमें इतना बुरा होना
अजब लाचार हैं हम, है अजब लाचारियाँ अपनी
किसी भी दर्द का होना नहीं मतलब दवा होना
सितारे रात भर रोते रहे अपने मुकद्दर पर
सरासर धाँधली है आसमाँ में चाँद का होना
हमें तकलीफ आखिर क्या, हमें नाराजगी क्यों हो
रहे छोटे हमेशा जो उन्हें क्यों हो बड़ा होना
नहीं पर्दा है उनके और हमाे बीच में कोई
अलग वे हों को क्योंकर हों, हमें क्यों हो जुदा होना ,!!

अंधेरा अच्छा लगता है


निर्वासन आत्मदाह,
से बेहतर
जीने की प्रबल चाह
ढहते हैं मूल्य अगर, ढहने दे!
ये तब की बातें हैं
जब अंधेरा से,
उजाला श्रेयस्कर ,
रक्त के रिश्ते से
दिल का रिश्ता बेहतर,
अब तो दिल कहता
मन को अंधकार में रहने दे !
अकूलाहट मे
शामिल हो
भीड़-भाड़ में अपने को खोज
मन को रोज  तिरस्कार सहने दे!!

मैं हारा नहीं हूँ


झर गया हूँ
पत्ते से कहता हूँ
पर टूटा तो नहीं हूँ!
टूट गया हूँ
पेड़ से कहता हूँ
पर उखड़ा तो नहीं हूँ!
उखड़ गया हूँ
जड़ से कहता हूँ
पर सूखा तो नहीं हूँ!
सूख गया हूँ
बीज से कहता हूँ
और चुप रहता हूँ!
इस नम अँधेरे में जन्मना है मुझे 
कहता हूँ अपने आप से
इस बार बीज की भांति!!

Friday, March 16, 2018

मैं दिल का किसान हूँ...

मैं दिल से आज भी किसान हूं। यह बात मुझे तब महसूस हुआ, जब मैं मुंबई में किसान मोर्चे को नजदीक और बारीक से देखा। 12 मार्च का दिन यूँ तो मुंबई के लिए बेहद ही खास है, क्योंकि 25 साल पहले इसी दिन मुंबई दहल उठी थी। लेकिन साल 2018 में इस 12 मार्च का दिन मेरे लिए खास रहा। आम दिन की तरह 11 मार्च को मैं रोजमर्रे के काम में व्यस्त था। यह तय था कि अगले दिन किसान मार्च मुंबई में पहुंचेगा, इसके लिए सारी तैयारियां भी हो चुकी थी। जगह जगह कैमरे और यूनिट में लगा दिए गए थे। लेकिन किसान रात में ही 11 मार्च को सोमैया ग्राउंड से आजाद मैदान की तरफ निकल पड़े। अब मेरे लिए चुनौती का समय था कि मैं अपने शिफ्ट को खत्म करके घर चला आउ या वहीं रुक जाऊं। जिम्मेदारी थी और उस जिम्मेदारी को निभाना भी था। जब किसान मुंबई के लोगों को सहूलियत को देखते हुए रात में ही निकल पड़े तो मैं भला कैसे अपने ऑफिस को छोड़कर घर चला आता। मैं भी वहीं रुक गया और रात करीब 1:00 बजे किसानों के साथ पैदल सफर पर निकल चला आजाद मैदान की तरफ।। तकरीबन 5:30 घंटे पैदल चलते रहे उस दौरान मैं आला पुलिस अधिकारी, महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और विशाल आदिवासी किसानों का हुजूम था। यह एक अलहदा अनुभव था। मुंबई में तकरीबन 22 किलोमीटर लगातार पैदल चलने का यह एक अनुभव था। मुंबई में कई तरह के बम ब्लास्ट हुए आतंकी हमले हुए बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई इन सब स्थितियों में मैंने पत्रकारिता की कलम को थामे रखा, तो तकरीबन 200 किलोमीटर का सफर तय करके आ रहे किसानों के लिए मैं अपनी कलम को विराम कैसे दे सकता था। मैं मौजूद रहा उनके बीच, उनके समस्याओं को सुना सोचा समझा और महसूस भी किया कि आखिर वह किस समस्याओं से जूझ रहे हैं। जंगल की जमीन को खेती लायक बनाते हैं लेकिन इस जमीन का मालिकाना हक उनके पास नहीं है। पथरीली जमीन पर हार तोड़ मेहनत कर उसे उर्वरा बनाते हैं लेकिन इस जमीन का मालिकाना हक उनके पास नहीं है। कहने को वह अन्नदाता है लेकिन सालों साल अकाल पड़ने सूखा होने या बाढ़ की स्थिति या होने पर उन्हें अनाज का एक दाना नसीब नहीं होता है क्योंकि उनके पास राशन कार्ड नहीं है। अपनी उपज की रक्षा वह वैसे करते हैं जैसे कोई मां अपने शिशु की रक्षा करती है , लेकिन फसल हो जाने पर बाजार में उनको उनकी लागत तक नहीं मिलती है। लिहाजा या तो सड़कों पर उन्हें फेंक ना होता है या यूं ही फसल सड़ जाती है। जिन नदियों का पानी उनके खेतों तक जाना चाहिए वह बड़े-बड़े मल्टीनेशनल कंपनियों तक जाता है कोक ,कोल्ड ड्रिंक्स और ऐसे पर बनाए जाते हैं कि नशे में लोग धुत्त हो जाते हैं अनाज का भरा पूरा खेत पानी के लिए तरसता रहता है। नेता मंत्री या कोई भी जो कि उनके मत पर यानी वोट पर सरकार में शामिल होता है या उनका प्रतिनिधित्व करता है उसे वेतन और पेंशन के रूप में लाखों रुपए मिलते हैं। इन अन्नदाताओं को वृद्धा पेंशन के रूप में महज ₹600 मिलते हैं जिससे इनकी गुजारा भी नहीं होती। बिजली का बिल इन्हें देख कर इनका सर चकराने लगता है कि आखिर यह अनाज उगाए या इस बिजली के बिल से अपना सर फोड़े। इस तरह की कई समस्याएं थी जिन्हें देखकर यह महसूस होता है कि हम जिन्हें अन्नदाता कहते हैं  वो कितनी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
              ‌‌‌‌ इन समस्याओं से रूबरू होते हुए जब मैं आजाद मैदान पहुंचा तो मुझे कोई थकान नहीं थी। दिल में यही था कि जिस तरह से महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया है कम से कम इन की बात माने सुनें और उनकी समस्याओं को दूर भी करें। लेकिन तब मुझे घोर आश्चर्य हुआ जब इन को मदद करने के नाम पर राजनीतिक दलों ने अपनी दुकान सजा ली। अपने-अपने पोस्टर और बैनर लगाकर टेबल सजा लिए, और इन्हीं कतार में लाकर खड़ा कर दिया कि आइए खाना ले जाइए और कुछ बिस्किट और पानी ले जाइए। अगर मदद ही करनी है तो उन्हें खाना देती और उनके पांव छूते क्यों कीजिए अन्नदाता आपके शहर में आए हैं उन्हें कतार में लगाकर हाथ पसारने पर मजबूर नहीं करना चाहिए था। वह दृश्य मुझे देखकर अचरज होने लगा कि आखिर ऐसे बुद्धिजीवी लोगों ने क्यों ऐसे किया इन भोले भाले किसानों और आदिवासियों को क्यों बे जा मूर्ख बना रहे हैं। तब और मुझे कोफ्त होने लगी जब इन राजनीतिक दलों ने मीडिया के सामने आकर यह कहना शुरू किया कि हमने उनकी मदद के लिए पानी दिया है बिस्किट दिया है खाने का सामान दिया है आप इसे मीडिया में दिखाइए मुझे कोफ्त होने लगी कि आखिर यह कौन सी मिट्टी के बने हैं कि इन्हें शर्म भी नहीं आ रही। तकरीबन 75 साल की उम्र में पैर में छाले हुए उस महिला को देखकर मुझे दिल कचोटने लगा कि वह किस उम्मीद से मुंबई में आई है और उसे क्या मिलेगा। उसी तरह से 10 साल के बच्चे को भी देख कर अजीब से मन में हलचल होने लगी कि वह मुंबई तो पहली बार आया है वह क्या देख रहा है। राजनीतिक दल महज एक वोट की तरह इन्हें देख रहे हैं इन्हें लुभाने की कोशिश कर रहे हैं अगली बार जरूर उन इलाकों में यह राजनीतिक दल पहुंचेंगे और वहां यह दिखाएंगे कि हमने आपकी मदद मुंबई में की थी। कौन सी मदद है किस तरह की मदद कर रहे हैं मदद की सबूत के तौर पर इनकी तस्वीरें रख रहे हैं अपने Twitter Facebook हर जगह इन लोगों की तस्वीरें वह टांग रहे हैं।
                खैर जब उनकी बातों को मैंने सुना कि हमने अपना दिल बड़ा किया मुंबई के किसी भी व्यक्ति को कष्ट नहीं होने दिया हम भले ही 15 घंटे चलकर आए इसके बाद बगैर आराम किए बगैर फिर चले तो मेरा भी दिल भर आया। सुबह तक मैं काम करते गया लेकिन मुझे कहीं कोई थकान महसूस नहीं हुई अगले पूरे दिन तक मैं काम कर सकता था, लेकिन बंधन था ऑफिस का मुझे लौट कर आना पड़ा।
                     ‌‌‌मैं यहां मैं यहां अपनी बात नहीं लिख रहा हूं मैं इंडियानामा के जरिए भारत के उस अन्नदाताओं से आपकी मुलाकात करा रहा हूं जिनकी सुध लेने वाले शायद ही सुध ले रहे हैं। उनका इस्तेमाल तो सब कोई कर रहा है लेकिन उनके बारे में सोचने वाले बेहद ही कुछ कम लोग हैं। शायद यह सरकार जरूर उनके बारे में सोचें और उनके लिए कुछ बेहतरीन फैसले ले जरूरी भी है क्योंकि अनाज आप फैक्ट्रियों में नहीं उगा सकते फैक्ट्रियों में किसी भी अनाज को आप नहीं बना सकते। अनाज के अवशेषों का आप इस्तेमाल फैक्ट्रियों में करते हैं लेकिन शुद्ध अनाज आप किसी भी मशीन के जरिए नहीं बना सकते। हरी सब्जियां कोई मशीन नहीं बना सकती। इन सारी चीजों को देखकर अगर मैं कहूं कि मैं भी किसान हूं तो इस बात पर मुझे फक्र महसूस होता है कि आखिर मेरी परवरिश जो हुई है देने के लिए ना कि लेने के लिए। दादी सही कहते थे कि बेटे हाथ सदा देने के लिए उठना चाहिए कभी भी हाथ लेने के लिए नहीं उठना चाहिए। अन्नदाता है देने वाले लेकिन बेचारे मजबूर होकर मुंबई में अपनी समस्याएं कहने आए कि कोई तो सुने।
आज तुम्हारे लिए कुछ पंक्तियां लिख दूं,
कौन जाने कल मेरी कलम चले ना चले?
परिस्थितियों की आपाधापी के इस दौर में मालूम नहीं,
मेरी कलम मेरे हाथ में रहे ना रहे....!


मन और अन्तर्मन एक साथ



मैं दरअसल आप सबों के मुखातिब होते रहा हूँ .. लेकिन आज कुछ अलग प्रयास हैं। प्रयास ये है कि मैं अपने विचार के साथ अपने अंन्तर्मन का विचार दोनों एक एक पंक्तियों में आपके सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ। इन दोनों विचारों में तारतम्य बेहद ही खास है कि जिससे ये अंतर ही नहीं महसूस होता है कि कौन से शब्द मेरे है और कौन से शब्द मेरे अन्तर्मन के। अब उन शब्दों को आपके सामने रखता हूँ।

ये दिल है कि बार बार कहता है ..
क्या कहता है..? 
ये बादल की रंगत, 
ये तितलियों की झिलमिलाहट, 
ईशारे करता है..
दूर क्षितिज के पीछे, 
चुपचाप कोई सपना पलता है ..!
ये सतरंगी बादलों पर बने इन्द्रधुष 
सा कोई अपना हर पाल आँखों में होता है, 
कभी सामने तो कभी ओझल होता है ..
बादलों का आना जाना हर पल होता है .., 
बूँदों का किस्मत धरती पर बरस कर 
सबकी प्यास मिटाकर घरती में खो जाना ही होता है ..।





Sunday, March 11, 2018

मैं भी किसान हूँ




जिस देश में नारा हो जय जवान जय किसान , वहाँ किसानों को सडक पर उतर कर अपना हक माँगना पडे, ये तो ऐसे ही लगता है कि भगवान को जय कहने वाले लोगों से भगवान खुद कह रहें हो कि तुमने मुझे सदियों से भूखा रखा है। दिल सोचने पर मजबूर होता है कि आखिर मैं भी तो किसान हूँ, क्या मेरे साथ भी किसी दिन इसी तरह का माहौल सामने आएगा। हालाकि खेत से मैं दूर इस महानगर में एक किसान से मजदूर हो गया हूँ, लेकिन दिल के कोने अंदरे में किसान की आतमा ही जग रही है। पिछले 10 साल से महाराष्ट्र के किसानों की हालत में बडे बारिकी से देख रहे हूँ आर समझ भी रहा हूँ। जितने किसानों ने आत्म हत्या की है उतने तो किसी महामारी में भी नहीं मरते। इनकी सुध लेने के लिए किसी के अंदर भावना जगी है इस बात पर संदेह ही हो रहा है।
                          इस मामले सॆ किनारा करने वाले ये जरूर कह सकते हैं कि ये किसी दल के जरिए प्रायोजित है इस लिए इस पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी नहीं है। लेकिन सोचिए जिस किसान का काम खेतों में अपने खून पसीने से सींचकर फसल उगाना है वो तकरीबन 200 किलोमीटर तक पैदल चला आ रहा है। पिछले सात दिनों से लगातार 30 हजार किसान महाराष्ट्र की राजधानी मुबई की ओर आ रहे हैं लेकिन सरकार की चुप्पी कह रही है कि इनके बारे में सोचने वाला शाय़द ही कोई व्यक्ति है। अपने कर्ज माफी , उपज की लागत का 50 प्रतिशत लाभ , नदियों को जोडने की माँग जिससे सिंचाई सुगम हो, स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिश पर अमल, जंगल जमीन पर खेती करने वालों को सहायता और सहुलियत , किसान सहायता राशि 600 रुपए से बढा कर 3000 रुपए करने की माँग करने वाले ये किसान कष्टदायक यात्रा कर कर आर्थिक राजधानी पर पहुच रहे हैं। लेकिन इनकी बात सुनने के लिए इक्का दुक्का नेता तो जरूर आ रहे हैं लेकिन किसी ने ये आश्वासन नहीं दिया कि आपकी सारी समस्या को दूर कर दिया जाएगा । नासिक से लेकर मुबई की काली स्याह सडके लाल झंडों से भर गईं लेकिन किसानों की समस्या का निदान निकालने के लिए आगे आने अपने लोग इस सोच में हैं कि कहीं अनकी सफेद पोशाक पर दाग ना लग जाए।
                       मेरे दिल का किसान यही कहता है कि जमाना बदल रहा है लेकिन हमारे लिए नहीं, उनके लिए जो छल और प्रपंच का इस्तेमाल करते रहते हैं और आगे बढने के लिए दूसरे को गला भी घोंट दें तो कम ही महसूस करते हैं। एक एक किसान का दर्द, उसके पैरों में उठे छाले, धूप से गर्म हुई सडकों पर चलते समय पांव का लडखऱडाते रहना., चलते चलते थक के प्यास से गले सूखना इन सबको अपने अंदर महसूस कर सकता हूँ।
महज एक दिन और शेष है शायद इन भाइयों, न्याय मिले और हँसी खुशी ये अपने अपने .. घर को लैट सके ...!
 के कवि किसान ..

बोओ, फिर जन मन में बोओ,
तुम ज्योति पंख नव बीज अमर,जग जीवन के अंकुर हँस हँसभू को हरीतिमा से दें भर।

पृथ्वी से खोद निराओ, कवि,मिथ्या विश्वासों के तृण खर,सींचो अमृतोपम वाणी कीधारा से मन, भव हो उर्वर।  


   




Saturday, March 10, 2018

भेद भाव कब तक...



पिछले दिनों एक बात देखी, समाज में असमानता कितनी है। इस बात को बड़ी शिद्दत से महसूस किया मैंने। अगर बात मध्यमवर्ग की होती या किसी खास वर्ग विशेष की होती तो बात इतनी खलती नहीं। यह बात उन के संदर्भ में थी जो देश के लिए गौरव और जी जान से अपनी शत प्रतिशत देने की कोशिश करते हैं। यहां पुरुष और महिलाओं का भेदभाव का साफ तौर पर दिखा। इसके बाद कई तर्क वितर्क दिए जा सकते हैं कहा यह जा सकता है कि जो भी मेहनताना तय किया गया वह अलग-अलग फॉर्मेट में खेलने से तय किया गया और चुकी महिलाओं का कई फॉर्मेट में हिस्सा लेना नहीं होता है इसलिए उनका मेहनताना कम है। अब आप समझ गए होंगे कि मैं किस विषय पर बात कर रहा हूं। दरअसल मैं बात कर रहा हूं बीसीसीआई के जरिए तय किए गए नए मानदंड के बारे में। बीसीसीआई के नए मानदंड तय किया है कि पुरुषों के लिएA+श्रेणी रहेगी जिसमें महज 5 खिलाड़ी हैं। कैप्टन विराट कोहली सहित इन के चार और खिलाड़ी हैं जो कि क्रिकेट के हर फॉर्मेट को खेलेंगे यानी 20 -20 , वनडे मैच और टेस्ट मैच भी खेलेंगे इनका मेहनताना 7 करोड़ रुपए सालाना है। उसी तरह से A ,B और C श्रेणी भी रखा गया है। जिन का अंतिम यानी सी श्रेणी का मेहनताना 1 करोड रूपए सालाना है।
       अब बात हाल ही में महिला दिवस पर बड़ी-बड़ी बातें लिखने और कहने वालों की भी सुन ले। भारतीय महिला क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए जिनकी श्रेणी A रखी गई है, जिसमें कैप्टन मिताली राज सहित तेज गेंदबाज झूलन भी हैं इनका मेहनताना महज 50 लाख रुपए सालाना रखा गया है। यानी पुरुषों के सबसे निचले श्रेणी से भी कम। इन लोगों ने हाल ही में देश का कीर्तिमान स्थापित किया है जो शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन इनके साथ पक्षपात का व्यवहार साफ दिखाता है कि अभी भी हमारी मानसिकता नहीं बदली है। इनके लिए किसी ने आवाज नहीं उठाई, सांसदों की अगर मासिक आय कम हो जाती है तो संसद में हंगामा मच जाता है लेकिन इनके लिए ना तो संसद में आवाज उठाना ही सड़कों पर किसी ने इनकी सुध भी ली है। हम कहते जरूर हैं कि हम महिलाओं को आगे लाएंगे महिलाओं के लिए सहूलियतें देंगे लेकिन कथनी और करनी में अंतर है। यह तो बात हो गई उस जगह की जहां सबकी निगाहें हैं जो सब उन्हें देखना चाहते है, कई लड़कियों और लड़कों के आदर्श होते हैं क्रिकेट खिलाड़ी लेकिन वहां भी सौतेला व्यवहार दिखी गया। अब उन जगह पर हम बात करें जहां घंटों काम के बोझ से लोग जूझते रहते हैं महिला और पुरुष भी लेकिन महिलाओं को क्या सहूलियत मिलती है। सबसे ज्यादा बलशाली महकमा, गृह मंत्रालय को ही माना जा सकता है। राज्य पुलिस बल में तैनात महिला पुलिसकर्मियों के हालात बेहतर नहीं हैं उनके कार्य स्थल पर ना तो उन्हें जरूरी सहूलियत मिलती है और ना ही उनके लिए कोई ऐसी व्यवस्थाएं रहती हैं जिससे वह अपने कार्य सुचारु रुप से कर सके। कार्य के दौरान विराम कर सकें ऐसी सहूलियत उनके लिए नहीं होती हैं। सरकारें इस पर सोचती क्यों यह आज भी मेरे मन में सवाल बार-बार कौन सा है। शायद आपके मन में भी यह विचार आता होगा लेकिन मैंने बड़े ही बारीकी और नजदीक से वह सारी चीजें देखी हैं जहां यह तकलीफें आज भी मौजूद है। कोई बहन कोई पत्नी कोई मां जरूर ही पुलिस में या उन वर्दीधारी सुरक्षाकर्मियों में रहते हैं लेकिन उनकी सहूलियतें नाम मात्र की सहूलियतों के नाम पर महज एक छलावा रहता है। उम्मीद है आप मेरी बातों से सहमत होंगे अगर सहमत हैं तो जरूर आप भी आवाज़ उठाए।एक आवाज से दो आवाज दो से तीन आवाज तीन से चार इसी तरह कड़ी से कड़ी जोड़ते रहे तब तक जब तक सरकारे सोते हुए से जाती नहीं।
  1. Team India (Senior Men)

(i)                 Introduction of a new category : A+
(ii)                New retainership fee structure

 Period
Grade A +
 Grade A
Grade B
 Grade C
Oct 2017 to Sept 2018
INR 7 Cr
INR 5 Cr
INR 3 Cr
INR 1 Cr

  1. Team India (Senior Women)

(i)                  Introduction of a new category : C

 Period
Grade A
 Grade B
Grade C
Oct 2017 to Sept 2018
INR 50 Lakhs
INR 30 Lakhs
INR 10 Lakhs


Friday, March 9, 2018

बड़े नाजुक से रिश्ते...


आज सचमुच मुझे अपने पुराने दिन याद आ गए। शायद ही मैं आज का दिन भूल सकूंगा, यह संभव है कि मैं आज का दिन कभी भी जीवन में ना भूलूँ। पिछले 10 सालों में जिन उलझन से गुजरा हूं उसने एक नई सीख दी है। मुझे ना कहने की आदत डालनी चाहिए हम सभी को खुश नहीं रख सकते। मेरी यह कोशिश कि हर किसी को खुश रखने का यह असंभव जान पड़ता है। लेकिन अगर व्यवहार के तौर पर देखे हैं तो हर किसी को खुश रखा भी जा सकता है। लोगों में अगर भावनाएं जगें विश्वास जगें तो यह कहना संभव जान पड़ता है कि , एक व्यक्ति दूसरे के काम आ सकता है। खैर अब आगे दूसरी बात करते हैं,,।
                    अभी हाल फिलहाल की घटनाओं को अगर देखें खास करके खबरों को तो कई चीज अपने आप में ही गुत्थमगुत्था की तरह उलझे हुए नजर आते हैं। परोक्ष यानी जो बीत चुका है उसी के आधार पर यह नई घटनाएं सामने आ रही है। उसमें आर्थिक अपराध की हो या किसी पर आरोप लगाने की हो लेकिन यह सही है कि बीते हुए कल पर ही आज आधारित है। हम दिन-ब-दिन अलग होते जाते हैं बढ़ते जाते हैं बलवती होते जाते हैं लेकिन अगर हम अपनी रूढ़ियों को अपने जड़ को भूल जाएं तो शायद ही हम बलवान हो और आगे बढ़े। इसलिए जरूरी है कि सबसे पहले हम अपने मूल को कभी भी भूले नहीं। उसके साथ-साथ बढ़ते रहें, इससे अपने आप में एक गर्व महसूस होता है और ऐसा लगता है कि हम सब एक साथ ही जुड़े हुए हैं।
        आपको लगता होगा कि मैंने शुरुआत कहां से की और पहुंच कहां जा रहा हूं बीच में कहीं कोई तारतम्य दिख ही नहीं रहा है। यह सच है मैं लिखने की कोशिश कुछ और कर रहा हूं लिखता कुछ और जा रहा हूं क्योंकि मेरे दिमाग में कई ऐसी चीजें चल रही है जिसे मैं आपको बताऊं क्योंकि मैं आपसे बहुत दिनों से दूर रहा हूं। सब चीज धीरे-धीरे एक सीधी लकीर में आते जा रही है जल्द ही सारी चीजें सुलझ जाएंगी और फिर से आपको मैं सटीक और व्यवहारिक तौर पर वही चीज बताऊंगा जिसे आप सुनना चाहें या मैं आपको सीधे सीधे तौर पर बताना चाहूंगा। तो चलिए शुरुआत के लिए इसे ही मान लें और एक बार फिर से आपसे मुखातिब होते हुए श्री गणेश है यह.....!
.....
खामोशी बयां कर देती है सब कुछ, 
जब दिल का रिश्ता जुड़ जाता है किसी से...!



Wednesday, March 7, 2018

खामोशी...




रास्ते ख़ामोश हैं और मंज़िलें चुपचाप हैं,
मेरी ज़िन्दगी का मकसद, सच कहूं तो आप हैं,
आपके आने से पहले चल रही थी ज़िन्दगी .!
वो भला क्या ज़िन्दगी, जिसमें न शामिल आप हैं
ज़िन्दगी भर ख्वाब में चेहरा जो हम देखा करते ,,
वो न कोई और था, सपना भी मेरा आप हैं!!

Tuesday, March 6, 2018

हर दिन आप तक



झुग्गियों के खण्डहर
खुल के हँसे
आसमान पर
और फिर
खामोश !

Sunday, January 1, 2017

संकल्प

आम तौर पर साल के शुरूआत में हर कोई कुछ नया करने या नई सोंच को आगे बढाने के लिए प्रतिबद्ध होता है। मैं भी एक तरह से संकल्पित हूँ आप सबों से कि नए साल में जरूर कुछ ऐसा करूँगा जिससे आप सबों से दूर नहीं रहूँ। लिहाजा हर दिन आप सबों से मुखातिब रहूँगा जिससे आपके बीच में ही रह सकूँ ।।।

Thursday, June 16, 2016

जिम्मेदारी ऐसी थी कि .. सब भूल सा गया था..

अगर मैं के बजाय हम कहूँ तो कुछ नजदीकी ज्यादा जान पडेगा। दरअसल मैं अब केवल मैं नहीं रहा हम में बदल गया हूँ। मेंरे बिछडे मुझे मिल गए हैं। इन बिछडे लोगों की संख्या अब दिन ब दिन बढते ही जा रही है। इन बढते लोगों के चेहरे पर खुशी देख कर मुझे भी खुशी मिलती है।यही वजह है कि जब मैने जिम्मेदारी संभाली तो भूल गया कि आखिर कितनी रातों से नींद नहीं ले पाया था। लेकिन शुक्र है कि सब बेहद करीने से निपट गया। जैसे एक महायज्ञथा और उस यज्ञमें शरीक सभी अपने अपने विधाओं से लैस थे। उन विधाओं में कहीं कुछ मुख्य अध्याय छूट ना जाए इस लिए चहुओर नजर बनाए रखना जरूरी थी। इस लिए कुछ बातों को नजंरअंदाज कर दिया कि आखिर इस दौरन दिखता कैसे हूँ। मैं तो अपने आप को ही भूल गया था। सालों बाद ऐसा मौका आया था, एक शक्ति मिली थी। हालाकि कई मित्रों की कमी जरूर खली। लेकिन सब एक ही ओर सिमटता है...
असीम आकाश का निस्तार खुलापन,
अनजानी राहों में भटकते पंछी,
अपरिचित दिशाएँ खोजती हवाएँ,
बादलों के बनते बिगडते झुरमुट,
और इन सबको देखती आँखे
जो महसूस करती हैं-बिल्कुल निजी क्षण वह
पर कौन,कहाँ, किसे कितना कह पाता है!..

Wednesday, August 19, 2015

समझ में आ गया रहस्य ...

आपका साथ मुझे नया उत्साह देता है।लेकिन ये तभी संभव हो पाता है जब में आपके संपर्क में आता हूँ, लेकिन कई बार इस संपर्क से मैं अलग हो जाता हूँ , जिससे उत्साह तो छोडिए मैं जीवन की राह ही छोजने लगता हूँ। लेकिन तकरीबन दो साल बाद आपके सामने आया हूँ। इस बीच काफी बदलाव हुए । जिसे मैने लडते हुए सहा। क्योकि पिछले अनुभव इतने कडवे थे जिसे सहज स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहींथा। लेकिन पता नहीं कहाँ से शक्ति आ जाती है कि फिर से अपनी कमान संभाल लेता हूँ । ये सब संभव हो पाता है आप सबों के सहयोग से ही। जब मैं अपना बंलॉग लिखना शुरु किया था, उस समय अगर कहा जाए तो में एक अनाडी था, हालाकि अब भी कोई अगड्धत्त नहीं हूँ। अभी भी कई तीजेंमम ऐसी है, जिसे सीखने की कोशिश कर रहा हूँ।लगता है समय के साथ सीख भी जाउँगा, खैर में आप को कुछ बातें संक्षेप में बताने की कोशिश करता हूँ। विगत दिनों भारत के कई हिस्सों में सफर किया, बहुत कुछ सीखा। हाँ मित्रता का रहस्य जिसे मैने पिछले दिनों अधूरा छोडा था, उस रहस्य को समझ गया कि ये कितना अविस्मिरणीय बंधन है। इस बंधन में अगर सही तरीके सं बंध गए तो बँध गए वरना सब कुछ बेकार। मेरे पिता जी कहते थे, कि जीवन में बहुत लोग अलग अलग समय पर मिलते हैं लेकिन वो तुम्हारे मित्र नहीं हो सकते, परिचित और कुछ समय के लिए साथी जरूर हो सकते हैं। हमने अपने कॉलेज के दिनों में बहुत कम लोगों से दोस्ती की , समय की धारा में कई लोग अलग अलग राह पर निकल गए थे। लेकिन वक्त ने एक बार फिर पलटा खाया और सब मिल गए। अब सभी एक साथ मिल गए हैं तो इन्हें सहेजने के लिए हर प्रयास कर रहा हूँ। ये भी कोशिश कर रहा हूँ कि नए दोस्तों और पुराने दोस्तोंमें सामंजस्य बैठाया जाए, जिससे जीने का मजा और आए। मित्रता का रहस्य है विश्वास अगर अक दूसरे पर पूर्ण विश्वास है तो आप एक दूसरे के परम मित्र हैं। लेकिन जिसने मुझसे मित्रता का चाह रखी पिछले दिनों उसे मुझ पर विश्वास नहीं था। इसलिए बात अधूरी ही रह गई। कॉलेज के दिनोंमें बने मित्रों को आज भी मेरे उपर विश्वास है इस लिए पुरानी मित्रता अभी तक चली आ रही है और मेर ख्याल के वक्त का पलटा खाना शायद मुझे संकेत ही दे रहा है कि जिस पर विश्वास कर सबकुछ भूलाने की कोशिश कर रहे हो वह छलावा है। इसलिए पुराने मित्रों से हर राज साझा करने में कोई हर्ज नहीं और मैने हर राज को साझा किया। ...शेष जल्द ही आपके सामने लाउँगा...
    

Saturday, August 16, 2014

मित्रता के रहस्य ..

हमनें मित्रता की शुरूआत या इसे समझना तब शुरू किया जब इसे महसूस किया! कॉलेज में आने के बाद कई तरह के मित्र मिलें. लेकिन मैं अपने दिल की बातें बेहद ही अपने आप में निहीत रखा इसे कभी जाहिर नहीं किया. लेकिन अचानक से मेरे दोस्तों ने जब नई तकनीकि की सहारा लेकर मोबाईल ग्रुप शुरू किया तो हम सब एक दूसरे के करीब आए.मित्रता दिवस के अवसर पर एक दूसरे को बधाई देते हुए दोस्तों ने कई संदेश दिए मैं उनका संंकलन आपके सामने रख रहा हूँ जरा आप भी इसे देखें और अपने विचार से अवगत कराए..
1.
ईश्वर ने हमारे शरीर
की रचना कुछ इस प्रकार की है
कि ना तो हम अपनी पीठ
थपथपा सकते है और ना ही स्वयं
को लात मार सकते हैं
इसलिए हमारे जीवन में मित्र होना जरुरी है..
2.
खवाहिश  नही  मुझे  मशहुर  होने  की।
आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है।
अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे।
क्यों  की  जीसकी  जीतनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे।
 ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा  भी   कितना  अजीब  है,
शामें  कटती  नहीं,  और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं....!!
3
एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी,
जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं,
 और  हार  जाओ  तो  अपने  ही  पीछे  छोड़  जाते  हैं।.


हम क्या दिखाने की कोशिश करते हैं ?

ये बात मेरे समझ से परे है कि आखिर लोग अपने प्रोफाइल जो कि आज कल आम है, क्यों इस तरह से रखते हैं कि बेहद अटपटा सा लगे। शायद अपने आप को कुछ ज्यादा ही अग्रगामी समझते हों ।यहाँ मैं अग्रगामी शब्द का उपयोग कर रहा हूँ क्योकि ये शुद्ध हिन्दी है। जरा आप भी गौर करें इन तरह तरह के प्रफाइलों को ये एक नमूना है इसके बाद भी कई इस तरह के प्रफाइल सामने आए हैं। जैसे एक और सामने आया है थोडा इसे भी गौर से देखिए तो शायद आपको भी अटपटा लगे। दरअसल ये सारी बातें
कहीं ना कहीं से ली गई हैं। भले ही वो किसी के लेखन से, कवित्त से या उनके किसी गद्य के अंश से लिए गए हैं। लेकिन अपने इस अपनी बेफिक्री दिखाने की कोशिश है। क्योकि हजार घर घूमने के बाद भी किसी को चैन नहीं आता है। लेकिन क्यों चैन नहीं आता ये आज तक मैं समझ नहीं सका हूँ। केवल इन बातों को उपरी तौर पर देखा जाए तो समझ में नहीं आता लेकिन जब इसके परिदृश्य और पिछला अंश को देखा जाए तो
इनकी गूढता समझनी होगी। हाल फिलहाल में कई बार इस तरह के लिखावट की हँसी उडाई गई। लेकिन मैने तो निश्चय कर लिया है अब रुकना नहीं है, अनवरत लिखते रहना है।  चलते चलते एक और नमूना आपको दे जाउँ इसे भी देखे क्योकि ये कुछ अजीबो करीब लगेगा। ये नमूने मुझे एक बार फिर आप से मुखातिब होने का कारण दे गए। उम्मीद है कि इस तरह के कई मसले मुझे आप से जोडे रखेंगे ।...