Tuesday, July 8, 2008

मैं कब हम होगा…. ?


एक सवाल मेरे जेहन में बराबर कौंधता रहता है कि मैं कभी हम में बदलेगा या नहीं। अपनी अपनी परिस्थितियाँ हैं कि किस तरह से एक दूसरे के करीब लोग लाते हैं। अगर अपनी बात करूँ तो कभी भी मैं में नहीं जीता क्योकि यह एक ऐसी परिस्थिती है जो अगर हावी हो गया तो अहम को दिलो दिमाग पर छाप डालता है। खुद की परिस्थितियों पर अगर विचार करू तो सारी बातें मेरी समझ में भी आ जाती है कि मैं भी मैं की भाषा बोलता हूँ। लेकिन जब से नाम इंडियानामा जुडा है तो धीरे धीरे मैं हम में बदलते जा रहा है। ना कोई जात रहा ना कोई धर्म और ना ही कोई प्रांत-प्रदेश सब समान दिखने लगे। ये बदलाव अनयास नहीं हुआ लगे सालों साल इसके पीछे। हरबार अपनी पहचान को भूलाकर नई दिशा पर चल निकला एक दूसरे से लोगों को जोडने के लिए तो विचारों में भी बदलाव लाया और फिर हम कि राह पर निकल पड़ा। लेकिन घर में आज भी मैं मै ही हूँ कारण यही है कि जिसको जिस भाषा में समझाना चाहिए उसी भाषा में समझाता हूँ। मेरा यही अभी तक मानना है लेकिन हो सकता है कि इस विचार को त्यागना पडेगा ना कि मेरे लिए बल्कि हर किसी को। इस तर्क के पीछे एक छोटा सा वाकया आपको बताता हूँ , वो यूँ है कि अपनी घूमन्तू प्रवृति के चलते कई बार ऐसी जगहों पर निकल पड़ता हूँ कि कहना मुश्किल होता है कि कहाँ आ गया हूँ। हुआ ऐसा ही घूमते घूमते बहुत दूर निकल आया था। गाँव की पगडंडियाँ थी लेकिन चेहरे और भाषा बिल्कुल ही अन्जाने थे। हर कोई अपरिचित की निगाहों से देख रहा था।लेकिन अचानक मेरे दिमाग में ये बिजली कौंधी कि मैं कैसे इनको अपने से जोडूँ।क्योकि इन लोगों का शोषण काफी लोगों ने किया है अब बारी है इनको इनकी स्थिती का भान कराने का। इसलिए सबसे पहले वहाँ घूमते बच्चों के बीच शहर से लाई टॉफियों का अम्बार लगा दिया और बगल के खेत में चला गया हल जोतते किसान के साथ मैं भी शरीक हो गया। तब क्या था सबकी चुप्पी टूटी और मैं, मैं से हम में बदल गया।
यही बात अगर आप दुहराये तो हो सकता है कि आपके बीच का भी मैं कहीं खो जाये और हम में बदल जाये। आज के परिवेश में जितना जल्द यह बदलाव हो वह एक मध्यम वर्गीय के लिए अच्छा है। मसलन लगभग 2 करोड अबादी वाले शहर में रहने को घर का सपना देखने वालों लाखो लोग आज भी अपना दम फूटपाथ पर तोड़ देते हैं। आखिर घर नसीब होता है तो, उसीको जो जितना ही जल्द मैं को छोड़कर हम को अपना लेता है। ठेठ में बोलूँ तो जिसने एक दूसरे का हाथ पकडा उसने अपने सर के उपर छत पाया। मतलब साफ सहकारिता ने ही मध्यम वर्ग को सहारा दिया। सैकड़ो कॉपरेटिव सोसाइटी ने इस महनगर में लोगों को शरण दी। जिसके बदौलत लोगों के सर पर छत है। ये इतिहास गवाह है चाहे वो प्राकृतिक प्रकोप हो या वो मानव के जरिये बनाई संकट उससे निज़ात मिला है समवेत स्वर से उठाये विरोध से ही। आर्थिक प्रगति में नई क्रांति लाकर के दूध की नदी बहा दी आनंन्द गाँव ने। अमूल नाम से नई पहचान ही दे दी। महाराष्ट्र के हर इलाके में चीनी मिलें इसका जीता जागता उदाहरण हैं। ये किसी एक ने नहीं किया है सैकड़ो हाथों ने मिलकर किया है। तब किसी एक के भडकाने पर क्यों एक दूसरे के हम दुश्मन बन जाते हैं यह बडी गंभीरता से सोचने वाली बात है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी के भडकाने पर मैं से अलग हट कर हरकोई हम के रुप में आगे बढे और डटकर उसका मुकाबला करे और मैं के रुप मे खडा भडकाने वाले दानव का नाश कर डाले..... जरा गंभीरता से सोचिए......।

Monday, July 7, 2008

मँहगाई की मार गरीब की हार


हाल फिलहाल की आर्थिक उथल पुथल ने आम जनता की परिस्थितियों को ऐसी जटिल कर दी है कि लगता ही नहीं कि वो कभी भरपेट खाना भी खाते थे। शहर में निकलो तो हर तरफ एक ही चर्चा कि मँहगाई ने कमर तोड़ कर रख दी है। लोग खाने के लिए तरस रहे हैं, अब अच्छे पकवान तो केवल सपनों में ही आने लगे हैं। हर किसी के जुबान पर सरकार के खोखले वादों की चर्चा रहती है, कि कब सरकार अपने इन झूठे वादों से बाज आयेगी। लेकिन ऐसा होता नहीं है । हमारे जैसे कई लोग सरकार को दोषी ठहराने से बाज़ नहीं आते,या एक अर्थ में आप ये भी कह सकते हैं कि सरकार को उसकी खामियों को दिखा डालते है। सरकार केवल बडे बडे वादे करती है लेकिन कभी भी देश के 60 फिसदी लोगों का ख्याल नहीं रखती है।लगभग 1.5 अरब अबादी वाले देश में गरीबी रेखा से नीचे जीनेवालों की संख्या भी कम नहीं है। अपने अपने साध को साधनेवालों की भी कमी नहीं है हर कोई अपनी ही धुन में रहता है कि कब कोई इस परिस्थिती में पीस जाये और समय की ताक में रहने वाला लाभ उठा जाए, कहा नहीं जा सकता है।सरकार है कि उसे कुर्सी बचाने से ही फुरसत नहीं है। हम और आप मँहगाई मँहगाई चिल्लाते रहे लेकिन सरकार ने इस चिल्लाने पर भी पाबंदी ये कह कर लगा दिया कि ये मँहगाई केवल हमारे ही देश में नहीं है बल्कि सारे देशों मे ये समस्या है जिससे सारा विश्व जूझ रहा है। और तो और ये भी कह गयी कि बढती मँहगाई कुछ दिनों तक और बरकरार रह सकती है। अब भला इसपर कोई सरकार को घेरे तो कैसे। हम और आप केवल अपनी किस्मत को रो सकते हैं कि हमने चुना तो किसे। अगर खास किसी प्रदेश की बात करें तो कोई अपवाद नहीं है हर जगह वही हालत हैं। जनता के रहनुमा अपनी तिजोरी भरने में लगे रहते हैं, अभी एक समस्या निपटी नहीं थी कि दूसरी ने आ घेरा। जहाँ मँहगाई से निपटने के तरीके ढूँढ ही रहे थे कि रही सही कसर बाढ की विभीषीका ने निकाल दी। अब दौर चला बाढ से निपटने की तैयारी होने लगी। सरकारें अपने बजट बनाने लगी कि कैसे इसका फायदा अपने खुद के घर भरने में उठाया जाए। महानगर सहित गाँव देहात के इलाकों में डिजास्टर मनैजमेंन्ट के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया गया। लेकिन जब सही वक्त बचाव के लिए आता है तो तो आसपास कोई नजर नहीं आता है लोग डूबते उतराते हैं लेकिन कोई हाथ आगे नहीं आता है, फिर शायद यही हो कि कोई आगे ना आये और लोग फिर से अपने पुराने परिस्थियों से जूझते रहें।
लेकिन शायद इस बार सरकारी तौर पर खूब मगरमच्छी आँसूओं का सैलाब दिखाई दे, क्योकि चुनाव जो नजदीक है। ताज को हथियाने के होड़ में हर कुछ करने को आतुर ये लोग ये नहीं भूलेंगे कि जनता सब जानती है। लेकिन मेरा मानना है कि जनता की यादाश्त बेहद कमजोर है हरबार अपने साथ किये गये छलावा को भूल जाती है, और जो सामने आता है उसी में अपने दुःखों को दूर करने का सामर्थ्य देखने लगती है। लेकिन हाथ में फिर मिलता है छलावा। जनता कि हालत उस बच्चे जैसी है जो रेत का घरौंदा समुद्र के किनारे बनता है और समुद्र की लहरें उस घरौंदे को मिटा देती है, बालक उसे फिर से बनाने कि लिए जूझता रहता है। लेकिन ये सरकार ऐसा नही करती घरौदा तो तोडती ही है सपने भी तोड़ डालती है सो जनमानष समेट लो अपने बल को कर डालो उपयोग अपने हक का........।

Monday, June 30, 2008

भारतीयता भूलते भारतीय...


हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे इंडियानामा में इस विषय पर भी लिखना पड़ सकता है कि भारत में ही भारतीयता से कोसो दूर जा चुके हैं धरती के लाल। लाख कोशिशों के बाद ना तो वो दर्जा मिल रहा है ना ही वो आधार जो कि एक सम्मान का जगह भी दिला सके। हाताश मन अपने आप में ही इन बातों का अर्थ ही ढूँढने लगता है कि क्या होगा। आखिर क्यों ये बातें हो रही हैं ? कहीं प्रयास की दिशा तो सही नहीं है, या मेरे प्रयास को लोग गलत समझ रहें हैं। हर किसी को यही समझाने की कोशिश करता हूँ कि पहले आप भारतीय हैं बाद में आप किसी प्रांत और कस्बे से जुडे हैं। आपकी पहचान भारतीय होने से है ना कि किसी प्रांत विशेष की बातें सबसे पहले आती है।
अब आखिर ये बातें उठती हैं तो इसके पीछे कारण क्या है कुछ बातें धुँधली सी नजर आने लगती है कि ये और कुछ नहीं केवल और केवल राजनीतिक सोंच है जिसे एक दूसरे पर हावी करने की मंशा होती है। ये हालात भले ही क्यों ना एक जगह की हो लेकिन यह बेहद आम बात है कि अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए लोग बराबर एक दूसरे के छाती पर पैर रखते हैं जिससे तकलीफ उन्हें कम उनको देखनेवालों को ज्यादा हो। आखिर आप कह सकते हैं कि मैं इन बातों को आपके सामने क्यों ला रहा हूँ। तो जाहिर है कि मेरा ध्येय है कि बहुजन हिताए और बहुजन सुखाए। लेकिन इस सारे गतिरोध में कौन हितकर्ता है और कौन दोषी ये तो कहना बेहद ही मुश्किल होगा कि और इसका मंजिल क्या और भी कठिन हैं। बचपन का एक द्वन्द है जिसे मैं आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ, हरबार एक चाहत होती है कि मैं अकेला क्यूँ रहूँ क्यों ना कोई साथी ढूँढू और उसके साथ अपने विचार की एक एक बारीकियों को खोल दूँ। लेकिन सामनेवाले का विचार देख कर सारे सपने चूर-चूर होते नजर आते हैं। हर बार खुद को मैं दोषी नहीं मान सकता कि आखिर क्यों ऐसा हो रहा है। जब साथ साथ दिन बिताए लोग ही खुद को किनारा करने लगे तो अपने आप को उपेक्षित सा समझना वाजिब है। आखिर क्यों सवाल बड़ा है, ये मेरे समझ से परे है। मन छोटा हो जाता है कि कहाँ तो सोचा था कि हर किसी के दिल से दिल को जोड़ दूँ लेकिन जब खुद को ही किनारा किया हुआ महसूस करता हूँ तो सारे काम काज ठप्प हो जाते हैं।
हमारे पुरखे बहुत पहले ही कह चुके हैं कि दिल से दिल को मिलाओ ना कि उपर ही उपर और अन्तरात्मा को भूल जाओ। पैसा कमाने से ज्यादा लोग कमाने पर तवज्जो दो लेकिन यहाँ तो हर कोई अपनी ही धुन में खो जाता है कि किसको फुरसत है आदमी पर ध्यान दे। बस चले तो उसे रौंद कर आगे बढ जाये बिसात ही कहाँ कि कोई चूँ भी कर दे।हम अपनी कमजोरी समझते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि सामनेवाला हमारी स्थिती पर ध्यान नहीं देता। हमेशा वो नजर गडाये ही रहते है अपनी तो स्थिती यही है कि कुछ ना होते हुए भी सब कुछ मान लेना पड़ता है कि सरासर मेरी ही गलती है। अब चुप बैठना उचित नहीं है, जितना जल्द हो सके लोगों को जगाना होगा कहीं देर ना हो जाये और आने वाली पीढी बहुजन हिताए के बदले निज़ स्वार्थ को ही सर्वोपरी माने.....मानव से मानव को जोडो....

Monday, June 9, 2008

क्या कोई पितृ घातक भी हो सकता है.......?


ऐसा हम आये दिन ही सुनते हैं, ये कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल उठता है उस बेटे के बारे में जो अपना जीवन ही परिवार और माता पिता के लिए छोड दिया वो कभी अपने आदरणीय पिता का घातक हो सकता है क्या ? इसका जवाब हमें नहीं मिला। लेकिन अगर गंभीरता से इसपर विचार करें तो सारी हकीकत समझ में आ जायेगी। पहले एक वाकया आपको बताता हूँ। बात कोई बहुत ही ज्यादा पुरानी नहीं है, यही कोई दो चार साल पहले की है। एक जानकार थे नाम था ब्रह्मदत्त राय अपने तीन पुत्रों में सबसे ज्यादा स्नेह था अपने दूसरे बेटे से।लेकिन एक-एक कर जब बेटे उनसे अलग होने लगे तो वो अपने आप को मरा हुआ समझने लगे। किसी को उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन जब दूसरा बेटा अलग होने लगा तो उन्होंने आग्रह किया कि बेटा छोड़कर जाने से पहले मेरा पिन्ड दान करके जाओ पता नहीं राम ना करे अगर कहीं लौट के ना आ सके तो कमसे कम मेरा, तुम पिन्ड दान तो कर ही चुके रहोगे । अब हम अगर बात करें पितृ घातक की तो लोगों ने ब्रह्मदत्त जी के दूसरे बेटे को ही माना क्योकि उसी में उनका स्नेह बसा था और उसी के जाने के बाद उन्होने प्राण त्याग दिये। ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था और यह सब कुछ अचानक सा हो गया। ज्यादा स्नेह दूसरे बेटे से होने के चलते सभी उसी को अपने पिता का प्राणघातक मानने लगे थे। सबों के जाने के बाद ब्रह्मदत्त जी पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन दूसरे बेटे के जाने के बाद तो सारी कायनात ही बदल गयी।
इस घटना ने तो खासकर मुझे तो मेरी अन्तरात्मा तक को झकझोर दिया। लेकिन बातों की गहरायी में गया तो मैं दोष किसको दूँ यह तो समझ से परे हो गया। दोनों ही एक दूसरे पर अपने-अपने प्राण न्योक्षावर करने को तैयार थे, लेकिन उनको घातक की संज्ञा देना मेरे दिमाग पर मनो बोझ सा लग रहा है। बात की गहराई में गया तो समाज में मौजूद घूटन सामने आ गया। सेवानिवृत होने के बाद ब्रह्मदत्त जी की जिन्दगी बिल्कुल ही कठिन हो गयी थी। पत्नी का देहांत होने से पहले ही टूट चुके थे। अब सामाजिक धारणाएँ उनके जीवन को और भी कष्ट दायक बना दी थीं। हालात यहाँ तक आ पहुँचे थे कि उन्होने कई बार घर की परेशानियों से तंग आकर के आत्म हत्या करने का भी प्रयास किया, लेकिन दूसरे बेटे के प्रयास ने उनको सारी कठिनाइयों से बाहर निकाला, तब से उससे और भी ज्यादा स्नेह बन गया। बेटे का बाहर निकलने का भी एक कारण बना घरेलू कलह, जिससे बहुत पहले अपने प्राणों को त्याग देने वाले व्यक्ति को इससे कोई मोह रहा ही नहीं और फिर इस दुनिया को छोड़ चला। ये सारी बातों मेरी आँखो के सामने चलचित्र की भाँति घूमती रहीं है जिससे मैं खुद को कभी भी व्यवस्थितसा नहीं महसूस कर पा रहा हूँ। हर बार ब्रह्मदत्त जी के दूसरे बेटे के बारे में सोंचता हूँ तो उसके प्रति हो रहे अन्याय को अपने उपर ही मानता हूँ। लेकिन मैं उस व्यक्ति को पितृघातक तो कतई ही नहीं मानता हूँ। क्या समाज अपना सोच नहीं बदल सकता ? जो मातृ और पितृ देवो भवो मानता था वो घातक कैसे गो सकता है , क्या पूरा परिवार जिम्मेवार नहीं है........?

जो देखा नहीं वो भी अपना लगे….


क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि जब किसी दूरदराज़ में बैठे व्यक्ति से बात करते हैं, तो लगता है कि उससे पहले भी मिल चुके हैं या यूँ कहें कि वर्षों से उसे जानते हैं। मेरे साथ तो यह हमेशा ही होता है। मैं शहर दर शहर तो शुरुआती दौर से ही भटकता से रहा हूँ। इसी घुम्मन्तु प्रवृति के चलते कई बार नये नये लोंगों से मिलता रहता हूँ। कई बार फोन पर भी बातें करता रहता हूँ। हर बार एक नया ही दोस्त बना लेता हूँ। अनेक दफ़ा तो यही लगता है कि जिस व्यक्ति से मैं बाते कर रहा हूँ उससे तो वर्षों पहले मिल चुका हूँ और वो तो जैसे मेरे बचपन का ही दोस्त है। मैं पहले ये गौर नहीं कर पाता था लेकिन साल 2007 से इन बातों पर गौर किया तो पता चला कि हू-ब-हू ये बाते सोलहो आने सच हैं। वाकया यूँ सामने आया कि काम के सिलसले में मेरे हेड ऑफिस से मिला ऑडर ने ऑडर देनेवाले के आवाज़ में ऐसा अधिकार जता दिया कि, मैं तो उसे वर्षों से जानता हूँ। उस आवाज़ में पता नहीं क्या ऐसी बात लगी कि मैं तो समझ गया कि भाई दसकों से बिछड़ा यही मेरा वो दोस्त है, जो कि बचपन में बनारस से तबादला होने की वजह से बिछड गया था। बार बार उससे बात करने का मन करने लगा। लेकिन नया कार्य क्षेत्र होने के वजह से ये संभव नहीं हो सका। खैर काम के आपा धापी में मैं वो सारी बातें भूल गया। रह गया याद तो केवल और केवल वह आदेश। आगे का किस्सा सुनाऊँगा फिर कभी क्यों कि उसी ने जीवन में एक अच्छे दोस्त की कमी को पूरा किया है। उसने हम से कुछ माँगा नहीं है बस दिया ही दिया है। और मैं अभागा उसे आज तक कुछ भी नहीं दे पाया हूँ।
खैर बात ये है कि जिसे आप देख भी नहीं पाते हैं वो भी आपको अपना लगने लगे तो कैसा लगता है। मेरे दिमाग से वो एक कडी होती है एक दूसरे से जोडने की। मस्तिसक के लाख कोशिकाओं में हलचल होने लगती है, तरंगे अपना काम और ही तेजी से करने लगती हैं। शायद ये केवल मेरा मानना हो लेकिन कल्पना किजिए कि जिसे आपने देखा तक नहीं वो अगर आप कोई काम बिगाड़ देता है तो आप उससे गुस्से के मारे आपे से बाहर हुए जाते हैं अगर वही व्यक्ति आपसे माफी माँग लेता है तो आपका सारा गुस्सा काफूर होकर के गायब हो जाता है। लेकिन कई बार आपकी इस भावना का गलत इस्तेमाल भी होता है। हाल ही में एक टेलीफोन कम्पनी ने इसी भावना को विज्ञापन के रुप में इस्तेमाल किया है। कोई महालिंगम साहब हैं जो इस भावना को रख कर एक सर्विस देने वाली कम्पनी में फोन करते हैं जहाँ लोग आवाज़ बदल कर उनसे बातें करते हैं बदले में फोन को सुननेवाले लोग टाकटाइम पाते हैं। ये बात तो विज्ञापन की है लेकिन अगर इसके सही मायनों में लिया जाए तो आज भी लोग टेलीफोन पर यही कहते मिल सकते हैं....देखा भले ही ना हो लेकिन तुम तो लगे प्यारा ।

Monday, May 26, 2008

तेल का खेल.... कहीं कंगाल तो कहीं मालामाल...!


आपने कभी सोचा होगा कि तेल इतना असर डाल सकता है, हमारे रोज रोज के खर्चे पर। लेकिन ये हुआ, और अब तो हालात ये है कि तेल ने अपना असर न केवल एक क्षेत्र पर दिखाया है, बल्कि हर ओर बखूबी अपनी महत्ता को दिखा गया। हम और आप समझते हैं कि मँहगाई ने हमारी और आपके बजट को बिगाड़ कर रख दिया है लेकिन कुछ लोग या यूँ कहें तो बेहतर होगा कि कुछ देश को मालामाल कर रहे हैं। खास कर के अमेरीकी हो या तेल के कुँए कहे जाने वाले पश्चिम एशिया देश हों। इस खेल ने हर किसी को एक अलग तरीके से ही असर डाला है। हल्ला है कि क्रुड ऑयल की कीमत आने वाले दिनों में 200 डॉलर प्रति बैरल तक हो जाएगा। बात सच है आज से मात्र एक साल पहले इसी तेल की धार 70 से 85 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से आसानी से अपने देश में लाया जाता था लेकिन अब यह धार इस कीमत में केवल सपना मात्र रह गया है। मैं सोचा करता था कि ये क्रुड ऑयल मुआ क्या बला है जो कि हर किसी के थाली में से अच्छे पकवान तक गायब कर जा रहा है। जनाब यही वह बुनियाद की ईंट है जो दिखाई नहीं दे रहा है और मकान को मज़बूती दिये हुए है। अगर यह ईंट कमजोर निकली को मकान भरभरा कर गिर जाएगा। वही है मरदूत क्रुड ऑयल, अगर हमारे देश में यह बहुतायत में मिलती तो तेल निकालने वाले देशो के तरह हम भी इस प्रकृति के नायाब तोहफे का दोहन करते और भले कुछ और नहीं उपजाते लेकिन अपनी ही शर्तो पर दुनिया को रखते जब चाहे कीमतों में उछाल लाते और जब चाहे कीमतों में गिरावट लाते। अव मूल रुप से सवाल उठता है कि आखिर क्रुड ही क्यों असर डालता है। भाई जवाब साफ है कि हमारी सारी अर्थनीति अब निर्भर करती है इस तेल के कमाल पर। भले ही कपडे बनाने कि लिए उपयोगी पॉली फाइबर हो या दवाओं को बनने में लगने वाला पेन्सिलीन हो ये सभी क्रुड ऑयल से ही बनते हैं। जहाँ अब इतनी बातों पर निर्भरता बढ़ती जाती है ये क्रुड अपना क्रूर रुप क्यो भला ना दिखाये। एक तो अपनी स्थिती ऐसी है दूसरी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे राजनीतिक उठापटक और भी परेशान कर रहे हैं,जिससे हमारी ही जनता मँहगाई जैसे दानव से दो चार होते रहती है। ऐसी परिस्थितियों में जनता दोनों ही पातों में पीसती नजर आती है। हलाकि इसके बीच का रास्ता केवल और केवल सरकार ही निकाल सकती है। लेकिन सरकार तो अपनी ही मकड़जाल में उलझती नजर आ रही है। एक ओर कोई निदान नहीं निकलता दूसरी ओर अपनी ही मंत्रियों के गलत बयानी पर सफाई देती फिरती है। मंत्री हैं कि अपने लोगों के सामने शेखी बघारने से बाज नहीं आते हैं। जनता है कि यही सोचती है कि मंत्री जी ने बहुत ही बढिया कहा इससे तो विदेशीयों सहित हमारी विरोधी पक्ष को मुँह सील जाएगा। सील तो अपना मुँह भी जाता है। उसमें अनाज का एक कण भी समाने लायक जगह सरकार सहित मातहत नहीं छोडते। अब अगर अन्न का दाना भी ना समाये तो सरकार के विरोध में बोलने की भी शक्ति नहीं रहती है। जिसका नतीजा है कि बस सरकार का गुणगान करते हैं, या तो चुप ही रहते हैं। लेकिन अब बरदाश्त से बाहर है क्योकि चूल्हे भी अब जलना बन्द हो सकते हैं क्योकि आसमान छूती तेल की कीमत से अब रसोई में ताला लगाने की नौबत आ चुकी है।हम और आप भले ही चीख-चीख कर अपनी गुहार लगायें लेकिन कान में तेल डालकर सोई सरकार कभी भी नहीं जगेगी। अब तो जागो सरकारी ठेकेदारों.......

Thursday, May 22, 2008

सरकार के हुक्कमरान


अभी एक दर्दनाक हत्याकांड की बातों को लोग भूल भी नहीं पाये थे, कि नोयडा निठारी हत्याकांड के बाद फिर दहल उठा, आरूषी के हत्या से। हुक्कमरान सकते में हैं कि इस घोर पाप का सूत्रधार कौन है। हरबार लोग इस शर्मनाक अपराध के लिए कभी सरकार के निठ्ठल्लेपन को ,तो कभी अपने आप को कोसते रहते हैं। एक घर में दो हत्याएँ होती है और पुलिसिया तुर्रा ये कि वह दो दिन लगाती है इसको पता लगाने में कि पहली हत्या कब हुई। दूसरी हत्या का पता लगता है उस मृत शरीर को मिलने के बाद जिसे लोंगों ने बताया वह भी दो दिन बाद। अब सवाल यह है कि क्या पुलिस केवल और केवल दिखावा ही करती रह रही है। थाने से महज 50 फर्लांग पर दूर रहे मकान के बारे में क्या हो रहा है किसी पुलिसिया हुक्कमरान ने जानने की जहमत नहीं उठाई। ये तो बात हुई राजधानी के निकट रहे शहर के बारे में। अब थोड़ा बात सबसे विकसित और महनगरी मुम्बई की भी सुन लें। एक घर में व्यक्ति की हत्या करके उसके 300 टुकडे किये जाते हैं फिर उन टुकडों को बैग में बन्द करके कहीं और ले जाकर के जला दिया जाता है। सवाल उठता है कि मारनेवाले के हाथों में कहीं कम्पन नहीं हुई होगी। मानवता तो भले ना जगे क्या मांस के टुकडों को देखकर कहीं विचलित नहीं होगा। मांस भक्षण करने वाले भी एक साथ इतना मांस देखकर के घबरा जाते हैं। लेकिन ये बात ही कुछ और है। कहाँ मर गयी है मानवता, किसने खोयी है इस लिजलिजे समाज में जीवन को। मैं ऐसा नहीं कि कमजोर दिल का इन्सान हूँ लेकिन जब देखता हूँ इसतरह के घृणित कृत्य को तो सहम कर के रह जाता हूँ। अभी बात ज्यादा दिनों की नहीं है कि सडकों पर बेतहासा दौड़ती गाडियों ने कई मासूमों को रौंद दिया था ,ये तो सरेआम कत्ल ही है।
हमने भले ये बातें आपको सुनाई है, लेकिन ये बातें आपसे छुपी नहीं हैं। अपनी इन हरकतों से शर्मसार किया है पूरे देश को। पहली घटना में शक की सूईया घर सहित घर से जुडे लोंगो तक घूमती रही हैं। लेकिन दूसरी घटना ने शर्म और भावना की हर हद को पार कर दिया। पहले की प्रेमिका ने हत्या को अंज़ाम दे दिया। इनको आप क्या कहेंगे हो सकता है कि आप ये कहें कि कोई मजबूरी होगी। लेकिन 300 टुकडे करना कौन सी मजबूरी, ये बात कुछ पल्ले नहीं पड़ती। खैर कोई बात नहीं मैं आपको यह कह रहा था, कि पुलिस को कोई भय और डर नहीं इनलोगों को कि इतने रोंगटे खडे कर देनेवाले काम कर दिये। बचपन की एक घटना याद आगयी , घर के करीब ही पुलिस ने चार डाकूओं को मारा था, और उनके लाश के साथ थाने में फोटो खिचवाये थे। उस घटना में एक पुलिस का जवान भी शहीद दो गया था। लेकिन उसके बाद सालों साल तक इलाके से डाकूओं का तो सफाया ही हो गया था। लेकिन अब तो अगर लोगों की कही बातों पर विश्वास करु तो पुलिस के भेष में ये डाकू हो गये हैं। निठारी से लेकर के आरुषी तक घटनाएँ चीख चीख कर यही कह रही हैं। रही सही कसर बदले की आग ने पूरी कर दी। सचमुच यह कौन सी बदलाव है समझना बड़ा मुश्किल –माटी रौदे कुम्हार को वाली कहावत सही हो गयी है....।