Tuesday, December 15, 2009

दर्द बाँटने से कम होता है लेकिन किससे.....


एक दर्द है जिसे मुझे बाँटने का मन करता है लेकिन समझ में नहीं आता है कि किसके साथ बाटू। ले देकर के आप को ही बोर करने का साहस करता हूँ। आप आगे बढने से पहले जरूर पूछेगें कि आखिर है क्या जिससे ऐसी दर्द उपज गयी। तो भाई इस दर्द का रिश्ता दिल दिमाग दोनों से है, या यूँ कहें कि शुरुआत दिल से होकर अब दिमाग पर पूरी तरह हावी हो गया है। हुआ यूँ कि शहर शहर भटकने के बाद मुम्बई तो मैं आ गया लेकिन शहर मुझे किसी तरह से पसंद नहीं था। लेकिन दोस्त मिलते गये धीरे-धीरे मन लगता गया। अब तो हालत ये है कि कहीं बाहर जाता हूँ तो जल्द वापस लौटने का मन करने लगता है। लोग भले कुछ कहें लेकिन यहाँ के विशाल समुद्र में हर कुछ समा जाता है। लेकिन इस समुद्र ने भी मेरा दर्द सुनने और अपने में समाने से इन्कार कर दिया। आखिर खुद का दर्द है तो निपटना भी खुद ही होगा।
दर्द है, मानव का मानव पर विश्वास का उठ जाना। मैं मानता हूँ कि हरे कोई एक समान है। कोई जाति हो, धर्म हो, या कोई भाषा-भाषी मैं अलग नहीं मानता। लेकिन मुम्बई में आकर लगा भाषा और क्षेत्र के आधार पर लोग एक दूसरे को अलग समझते हैं ,अब इस दर्द को कहूँ तो किससे। मुझे लगा कि यह महानगर है और लोगों की सोच छोटी कैसी। पता चला कि राजनीति को चमकाने के लिए लोग एक दूसरे के खिलाफ ही भडकाने लगे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को वो बाँट सके। रही सही कसर आपसी जलन पूरी कर देती है कि लोग एक दूसरे से नफरत करने लगते हैं। रही बात मुम्बई तो मुझे नहीं लगता कि कभी भी इसका मिज़ाज ऐसा रहा है। लोगों के विचारों को और भी आगे बढाने वाले लोग यहाँ रहते हैं खास कर के फिल्म से जुडे लोग यहाँ हैं तो नहीं लगता कि इस दर्द की पौध यहाँ ज्यादा दिनों तक रह सकेगी।
राजनेताओं की राजनीति से लोग भी सकते में आ जाते हैं कि कल तक एक दूसरे के करीब रहने वाले लोग अचानक से दूर कैसे हो गये। लगता है कि यही बटवारा की राजनीति है। हम और आप लडते रहें और राजनेता अपने पैसे को बढाने में मस्त रहे। यही तो वो भी चाहते हैं कि उनकी नाकामी पर भी पर्दा पडा रहे कोई उनके ओर उँगली भी ना उठा पाए। अगर वक्त रहते हम संभल पाए तो ठीक ना तो रही सही मेल मिलाप का एक सिलसिला भी जाएगा। एक दूसरे के दुश्मन ही सामने नजर आएँगे कोई भी एक दूसरे का चेहरा भी नहीं देखेगा। अगर इस दर्द को मैं आपके सामने रखूँ तो हो सकतो है कि आप भी यही कहेंगे कि ये दर्द तो मेरा है। इस दर्द से हम सब कमोबेश पीडित हैं इस दर्द को आप और हम देख रहें हैं जो देखते हुए भी नहीं देखना ताहतें उसे हम राजनेता कहते हैं। जिस हम ही चुनकर अपना प्रतिनिधित्व देते देश चलाने के लिए। इनके झाँसे से आपको भी निकलना होगा और हमें भी नहीं तो कहीं हम आज़ाद भरत के गुलाम ना बन जाएँ... सवाल वहीं है कि इस दर्द को बाँटे तो किससे.. जो गुलाम बनाने को उतारु है उससे या उससे जिसे अभी ये दर्द दवा लगती है लेकिन वो भी बँटवारे की राजनीति का शिकार होगा और उसे भी यह दर्द उपहार में मिलेगा........।

Tuesday, November 24, 2009

साल भर बाद फिर वही यादें .....


साल भर बाद अचानक से काम करते करते एक फोन आया तो वो सारी यादें ताजी हो गयी। मैं इतने दिनों से इंडियानामा से दूर रहने के बाद एक बार फिर जुडने की कोशिश कर रहा हूँ। आप से दूर रहकर सब कुछ बेमानी लग रहा है। इस लिए वहीं बातें एक बार फिर आप के साथ बाँट कर रहा हूँ।
ये किसी ने मुझे दिया है आप भी देखें......
http://www.chhapas.com/AamneSamne.aspx?ID=445
26/11 को मुंबई पर हुए हमले को भला कौन भूल सकता है। काला इतिहास बन चुका है वो हमला। पुलिसकर्मियों और सुरक्षाकर्मियों की शहादत के साथ ही आतंकवादियों की गोलियों से हुई करीब दो सौ लोगों की मौत हर भारतीय और खुद को इंसान समझने वाले लोगों के दिल में दर्द के रूप में अंकित हो चुकी है। अब जबकि इस हमले को सालभर हो चुका है,उस घटना को अपनी खुली आंखों से कैद करने वाले संवाददाताओं के जेहन में अभी वो पल रुलाती है। आतंकवादियों की जघन्य और अमानवीय कुकृत्य सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम इंसान हैं या फिर इंसान के रूप में कुछ और। उस खौफनाक और दरिंदगी भरी घटना पर पल-पल निगाह रखने वाले ज़ी न्यूज़,मुंबई के संवाददाता राजीव रंजन सिंह से बात की हमारे मुंबई संवाददाता रजनीश कांत ने। पेश है बातचीत के मुख्य अंश-
कैसे थे आपके लिए वो पल,जब हर क्षण खतरनाक से और खतरनाक होता जा रहा था? किस रूप में याद करना चाहेंगे,उन पलों को?
राजीव रंजन-वो पल आज भी आँखों के सामने हैं,एक क्षण को लगा कि ये कुछ लोगों का आपसी गैंगवार है। लेकिन समय गुजरने के साथ ही साथ खतरे बढने लगे। आतंक का तांडव पूरे शहर में पसरने लगा। तब लगा कि ये आतंकी हमला है जो कि पूरे शहर को तबाह करने पर तुला है। गोलियाँ और ताज होटल से चीखते लोगों को देख कर लगा कि हमारी सुरक्षा में सेंध लग चुकी है। हम कितने बेबस बन चुके हैं,इसका भी आभास हुआ कि कोई हमारे घर में ही आकर हमें तबाह कर रहा है। जीवन का एक अलहदा अनुभव था। रिपोर्टिंग के लिहाज से सटीक खबरें देने की भरपूर कोशिश रही। मुम्बई के लिए एक काला पन्ना के रुप में आज भी वो वक्त याद किया जाएगा।

जब आपको इस घटना को कवर करने के लिए कहा गया था,तो क्या कभी आपको ऐसा लगा था कि आतंकवादियों के साथ ये लड़ाई इतनी लंबी खींच सकती है? पूरे तीन दिन लगे केवल दस लोगों को नियंत्रित करने में, आखिर कहां चूक हुई थी हमसे? एक रिपोर्टर के रूप में आपका आकलन क्या रहा?
राजीव रंजन-निष्पक्ष रुप से अगर सारे मामले को किनारे से देखें, तो गलती हमारी सुरक्षा तंत्रों की ही हमें लगती हैं,क्योंकि जिस कदर इन आतंकियों का मुम्बई में प्रवेश हुआ और इन्होंने पूरे मुम्बई को अपनी गिरफ्त में ले लिया,इसमें हमारी सुरक्षा तंत्रों की कमजोरी झलकती है। शुरुआती दौर में तो ये नहीं लगता था कि लडाई इतनी लम्बी खींच जाएगी,लेकिन ज्यों-ज्यों पता चलता गया कि उनके पास हथियारों का जखीरा है,और शहर के कई हिस्सों में वे बम भी लगा चुके हैं,साथ ही अलग-अलग इलाकों में फैल चुके हैं तो लडाई खिचती गई।
एक बात और इस पूरे मामले में हमारी ही सुरक्षा एजेन्सियों के बीच समन्वय की कमी झलकी। साथ ही ये भी लगा कि दो साल पहले ही हुए रेल धमाकों से भी इन्होने कुछ नहीं सीख ली और ना ही ये कभी तैयार दिखे इस तरह के हमलों के लिए।

जब आप हमलास्थल पर थे,तो आतंकवादियों की कोई भी एक गोली आपके सीने को छलनी कर सकती थी,क्या कोई ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण पल आपके सामने भी आया था?
राजीव रंजन-भाई बिल्कुल आप ने इस बात को पूछ कर मुझे उस पल और उसी जगह पर ही ले गए। रात का पहला पहर यानी लगभग साढे दस बजे का समय था। सीएसटी रेलवे स्टेशन के इलाके में लगभग चालीस मिनट तक रहने के बाद और सारी रिपोर्टिंग करने के बाद गेटवे की तरफ ताज होटल के पास मैं पहुँचा। ताज होटल पहुँचते ही गोलियों की आवाज और होटल से आती 'बचाओ-बचाओ' की आवाज, ने मुझे रिपोर्टिंग के लिहाज सा बरबस एक वॉक थ्रू करने पर मजबूर किया। वॉक थ्रू के दौरान ही एक ग्रेनेड मुझ से लगभग 35 से 45 कदम की दूरी पर यानी ताज टावर के गेट पर गिरा। थोडा मैं सहमा जरुर लेकिन वॉक थ्रू जारी रखा। फिर उस टेप को लेकर ओवी वैन की तरफ जाने लगा पुलिस ने मना किया कि गेटवे के पार्क की तरफ से नहीं जाने को,लेकिन मैं बढता गया। बाद में पता चला कि मैं पाँच किलो के आरडीएक्स के उपर से गुजर गया। इसके बाद ओवी वैन गेटवे पर ना पाकर उसे खोजने ताज के पिछले बरामदे से जाने की कोशिश करने लगा।
अचानक से ताज महल होटल के पीछे तीसरे मंजिल पर कोई बार बार खिडकी पर आता जाता दिखाई दिया। एक रिपोर्टर होने की वजह से मैं रुक कर देखने लगा अचानक से एक व्यक्ति खिड़की पर आकर रुका तबतक मैं अपना हैन्डीकैम से शूट करने लगे तभी उस व्यक्ति ने अपनी राइफल से गोली चला दी। राइफल देख कर मैं स्तब्ध रह गया जो होना है वह होकर ही रहेगा यही सोचा। गोली मेरी दाहिने तरफ से तीन से चार फुट की दूरी से जाकर पीछे दीवार में धँस गयी। दीवार के पीछे सुरक्षा में खडे सिक्यूरिटी ने भरपूर खरीखोटी मुझे सुनाई कहा कि इससे हादसा हो सकता है आप लोग क्यों नहीं समझते,मैं उसकी बात मान कर वहाँ से निकल गया। ये पल बिल्कुल मेरे साथ के रहे।

हमले के समय पुलिसवालों और सुरक्षाकर्मियों की मन:स्थिति क्या रही होगी? जनता का दबाव,मीडिया का दबाव,सरकार का दबाव,नेताओं का दबाव,बंधक बनाए गए लोगों के रिश्तेदारों की आंसूओं और इन सबसे ऊपर आतंकवादियों की गोलियों की आशंका...कैसे संभाल रहे होंगे वे लोग, इन सब चीजों को एक साथ...
राजीव रंजन-हकीकत है, उस समय का वो पल सबों के सामने थे। सबसे ज्यादा दबाव सुरक्षा एजेन्सियों के उपर ही था। ज्यादा से ज्यादा लोगों को बचाने की कोशिश थी। लोगों को मारे जाने से और भी उन पर दबाव बढता जा रहा था। साथ ही पुलिस के बडे़-बड़े अधिकारियों के शहीद होने से उनके तो कमांडर ही नहीं रहे, कुछ देर तक ऐसा भी लगा। करकरे, सालस्कर और कामटे जैसे लोगों के नहीं रहने से थोड़ी देर के लिए पुलिस प्रशासन सदमे में आ गया। लेकिन घरों पर लौट गए पुलिस और सुरक्षा एजेन्सियों के जवान भी सादे वर्दी में ही चले आने से एक दूसरे का हौसला बढता गया। उनके ऊपर खुद के रिश्तेदारों की भावनाओं का दबाव भी था लेकिन इन सबों को किनारा करके मुकाबले को तैनात रहे पुलिस और सुरक्षा के लोग।
यहाँ तक एनएसजी भी अपनी साथी संदीप उन्नी कृष्णन और गजेन्द्र सिंह के मौत के बावजूद भी उन्होने हिम्मत ना हारी ना ही कहीं कमजोर पडे। एक दूसरे को संबल देकर भरपूर मुकाबला उन्होंने किया जो कि सलाम करने लायक है।

हमले के दौरान हरेक न्यूज चैनलों के रिपोर्टरों पर ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव खबर लाने का दबाव था,क्या आपके ऊपर भी इस तरह का कोई दबाव था? ऐसे संवेदनशील मामलों में न्यूज चैनल की इस नीति के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
-जाहिर है खबरिया चैनलों पर दबाव था। क्योंकि जो ये पल थे उन पर हर किसी की नजर थी और हर कोई एक दूसरे से अलग और बढ़-चढ़ कर खबर दिखाने की कोशिश कर रहे थे। मैं भी कुछ देता गया,लेकिन मैं अपने अनुभव से यही सीख ले चुका था कि खबरें बेहद संतुलित हों। जब तक पूरी तरह से इन चीजों को जाँच ना लूँ उस खबर को बेवजह चलाने की कोशिश नहीं करता। मैं जब लाइव और फोनो दे रहा था तो ये जरूर ख्याल रखता था कि ना ही दर्शकों में दहशत फैले और ना ही सुरक्षा एजेन्सियों की कार्यवाही की बारीकी को ही बताता, क्योंकि तब तक ये पता चल चुका था कि आतंकियों का खबरों से फीड बैक मिल रही है।
हाँ जब एनएसजी के कमांडो हेलीकॉप्टर से नरीमन हाउस पहुँचे तो उसे सबसे पहले दिखाना जरुरी समझा और दिखाया क्योंकि आतंकियों को भी ये संदेश मिलता कि अब वो चारों तरफ से घिर चुके हैं। कुछ देर के बाद मैने अपने चैनल के लोगों से भी लाइव ना दिखाने का आग्रह किया, जिसे उन्होने भी स्वीकार भी कर लिया। इन संवेदनशील मामलों में ये जरुर होना चाहिए कि खबरें संतुलित हों, लोगों में ज्यादा दहशत फैलने से सुरक्षा एजेन्सियों पर दबाब ज्यादा हो जाता है जिससे सुरक्षा में लगे लोगों से चूक भी हो सकती है।

भगवान ना करे, ऐसी घटना दुबारा हो, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसे हमले की पुनरावृति होती है, तो ऐसी घटनाओं को कवर करने के दौरान आप नए रिपोर्टरों को क्या संदेश -देना चाहेंगे?
राजीव रंजन-इन परिस्थितियों में हमारे नए सहयोगियों को ये ख्याल रखना चाहिए कि पहले हर चीज की पुष्टि कर लें, फिर उन खबरों को आगे बढाएं। संतुलन बनाए रखें जिससे खबर बिखरे नहीं, सटीक रहे। ज्यादा उत्साह में गलत और दहशत नहीं फैलाने वाले खबरों को बाहर नहीं आने दे, ऐसी कोशिश रहनी चाहिए उनकी।

Friday, March 20, 2009

क्या खोया क्या पाया ....२


बन्दूक दिखी तो एकबार लगा कि कोई कमांडो होगा मैं भी टकटकी लगाने लगा, लेकिन अचानक मेरी तरफ आती गोली का अहसास हुआ, लगा कि अब हो गया खबरनवीसी का जय-जय श्री राम । गनीमत था कि गोली दूर से निकल कर पीछे की दीवार में जा लगी लेकिन दीवार के पीछे खडे महाराष्ट्र पुलिस का जवान गिर पडा। आखिर वो भी इन्सान था जो जीवन में शायद पहली बार आतंकी का सामना कर रहा होगा। अपनी खीज छुपाने के लिए मुझ पर ही बरस पडा कि मेरे चलते ही आतंकी ने गोली इस तरफ चलाई। खैर किसी तरह पहली रात बीत गई। लेकिन इस पहली ही रात ने लगभग 200 शहरीयों को अपनी काली साया के नीचे लील गया। विजय सालसकर, अशोक कामटे,हेमन्त करकरे जैसे लोग शहीद हो गये। तुकाराम ओम्बले ने जान की परवाह किये बिना एक आतंकी पर हमला किया आतंकी पकडा गया लेकिन तुकाराम नहीं रहा पीछे छोड गया अपनी तीन जवान बेटियाँ। हालात ऐसे थे जिसमें ड्यूटी के खत्म होने का सवाल ही नहीं था। सुबह के लगभग 12 बजे मोर्चा इधर हम रिपोर्टर जमाए हैं तो उधर आतंकी कत्लेआम मचा रहे थे।बमों की बौछार कर रहे थे। इन बातों को लिखना लग रहा कि बेमानी है क्योकि वो सारे वाकये आँखों के समाने से होकर के गुजरने लगते हैं। लगभग 40 एम्बुलेंस ताज होटल के सामने आती रही लेकिन हम केवल बेबस बनकर देखते रहे। खैर इन आतंकियों पर काबू करना बेहद जरुरी था। लिहाजा एनएसजी कमांडो और मारकोस दस्ता ने कमान अपने हाथ में लिया। रात जिस जगह पर हम सभी खडे थे सुबह होते-होते पता चला कि लगभग सात किलो का आरडीएक्स बम आतंकियों ने नहीं छिपा रखा है। जो बात में पता लगाकर डिफ्यूज किया गया। उस बेकार किये गये बम को भी देख कर अचंभा होता था कि रात भर हम लोग आस पास ही मँडराते रह अगर गलती से भी कहीं यह बम फटता तो ताज और 100 साल से भी ज्यादा पुरानी स्मारक गेटवे तो भूल में मिल ही जाता लेकिन हमारे परख्च्चे भी नहीं मिलते।
हर कदम पर एक नई सीख थी, एक जीवन की सच्चाई दिखती थी। साथ ही अपनी सरकार पर खीज भी आती थी कि आखिर हमारी सरकार क्या कर रही थी और अभी क्य सो रही है कि लगभग 24 घंटे से उपर हो गये और एक भी आतंकी नहीं पकडा गया। मात्र 10 लोगों ने पूरे शहर को लगभग 60 घंटो तक बंधक बना कर ऱख लिया। लिहाज इसके लिए सरकार तो जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। लेकिन महाराष्ट्र और केन्द्र सरकार ने बलि चढा ही महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री आर.आर.पाटिल को। दिल का सच्चा आदमी बेमौत मारा गया उसकी कुर्सी इन्ही राजनेताओं ने हड़प ली ऐसा ही कहना अचित होगा। खैर ये तो दो दिनों की ही बात है अगले दिन मैं नरीमन हाउस पर था वहाँ जो कुछ आँखो के सामने देखा उसे देख कर तो आँखे झपक ही नहीं रही थीं।

क्या खोया क्या पाया....१,


ये मैं लिख रहा हूँ लेकिन बहुत दिनों के बाद कारण मेरे निजी थे। ऐसा भी नहीं था कि मैं लिख नहीं सकता था बस केवल और केवल आलस ही था, जिसके कारण लिख नहीं पाया था, इसके लिए थोडी आपसे आज़ादी चाहता हूँ। शुरुआत मैं करता हूँ साल 2008 के अंतिम महीनों में हुए घटनाओं से। नवम्बर का महीना कितना दुखद रहा हमारे लिए ये कहनेवाली कोई बात नहीं है। हर कदम पर आतंक का नाच हुआ जिसे देख कर आम शहरी दंग रह गया। लगभग दो दिनों तक ये मुट्ठी भर आतंकी पूरे शहर को अपने गिरफ्त में ले लिये। अधिकारियों ने तो अपनी जान की बगैर परवाह किये मुकाबला लिया। सैकडों बेगुनाहों की जान गयी, बात तो यह है कि आतंकियों के इस नापाक इरादे में चूक तो हम से भी हो ही गयी है। जिसको भूलना आसान नहीं है। लोग भले ही इसे कहें कि यह बस एक हादसा था जो बीत गया अब उसे भूला देना चाहिए, तो मेरे मानना है मेरे दोस्तों कि ये मेरे बस की बात नहीं भले ही वो मेरे देश में हुआ हो या किसी और देश में।
साल तो बीत गया लेकिन दर्द इतना बड़ा दे गया कि दिलो दिमाग पर छाप छोड गया। उस दौरान अपने आँखो देखी हालात को बताऊँ तो बडी ही विकट स्थिती थी। हर तरफ एक दहशत का माहौल बना हुआ था। जिसे देखने के बाद अपनी कमजोरी झलक रही थी। कारण जो भी हो भले ही हमारे या हमारे पुलिस और सेना के अधिकारियों के सामने ये मजबूरी हो कि आसपास के लोगों को बचाया जाए जिससे ज्यादा लोग आहत ना हों लेकिन इसका फायदा उठाया आतंकियों ने, अगर शब्दों में कहें तो नादिर शाह की तरह कत्लेआम मचा दिया था आतंकियों ने। हमारी ही आँखों के सामने लगभग सौ साल पुराना ताज महल होटल धू-धू करके जलते रहा। फायर ब्रिगेड के कर्मचारी हर संभव कोशिश में रहे कि मुम्बई की शान समझे जानेवाले इस पुरातन बिल्डिंग को आग की लपटों से बचाया जाए। इसके साथ कोशिश ये थी कि अंदर फसे लोगों की थाह ली जा सके, इसी बीच मैं भी फायर ब्रिगेड के लोगों के साथ हो लिया। कुछ कदम अंदर भी गया लेकिन फायर कर्मचारियों की नज़र में आ गया लिहाजा मुझे फिर से बाहर आना पडा। लेकिन इन्तज़ार में यही था कि किसी तरह से अन्दर जाऊ। मैं मदद के साथ साथ अपने खबरनवीसी का भी काम करना चाहता था। पिछले तरफ भागा कि कहीं वहाँ से कोई रास्ता मिले। तभी चौथे माले की खिड़की पर कोई दिखा, मुझे लगा कि ताज में रुका कोई मुसाफिर है रुक गया उसे देखने को अचानक खिडकी पर एक बन्दूक दिखी.... .
यही बाकया अगले भाग में ..

Wednesday, December 31, 2008

विदा साल २००८....,


मित्रों काफी लम्बे अरसे के बाद आप लोगों से एक बार फिर मुखातिब हूँ, समय नहीं दे पाने के कारण आप से माफी माँगता हूँ। पिछले दिनों काफी कुछ घटा जिसपर लिखने का मन तड़प उठा लेकिन लिख नहीं सका ये मेरी गलती है,क्षमा करेंगे। साल 2008 अब अपने अंतिम संध्या के कागार पर है, साल 2009 का आगाज़ भी। खैर साल 2008 के अन्त में जो कडुवे अनुभव हुए अम्मीद है कि अगले साल वैसे अनुभव नहीं होंगे। इसी उम्मबद में मैं भी आपलोगों से इतने दिनों अब दूर नहीं रहूँगा। आखिर आप ही तो हमारी ताकत हैं जो इस लेखनी में भर देते हैं कि मैं बेबाक कुछ भी कह देता हूँ।

Wednesday, September 10, 2008

अब तो बस करो.....


साल 2007 से लेकर अब 2008 का सितम्बर माह आ गया है लेकिन, आपसी लडाई है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। लोग हैं कि एक दूसरे को मरने मारने से पीछे नहीं हट रहें हैं। हर बार केवल एक ही मुद्दा कि महाराष्ट्र में हो तो केवल और केवल मराठी ही बोलनी होगी। क्या ये देश का अभिन्न अंग नहीं है, मानता हूँ कि लोग कहेंगे कि जिस जगह प्रांत में रहते हो तो वहाँ का सम्मान तो करों। तो इसमें लोगों को हर्ज क्यों हो रही है। हर बार ये क्या कहना जरुरी होता है कि बाहर से आये लोग यहाँ का सम्मान नहीं करते। मेरे समझ से ये केवल और केवल मुद्दा राजनीतिक बनते जा रहा है। अपनी राजनैतिक रोटीयाँ सेकने के लिए लोग एक दूसरे के खिलाफत सहित मरने मारने पर उतारु हो रहे हैं। पिछले दिनों या यों कहें हर बार जब बंद और विरोध होते हैं तो ये सबसे पहले सरकारी सम्पतियों का निशाना बनाते हैं और उसको तबाह बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। तब कहाँ चली जाती है प्रदेश प्रेम कहाँ रह जाते हैं सम्मान करने के वादे। मैं खुद महाराष्ट्र का नहीं हूँ लेकिन मुझे गर्व है कि मैं देश के उस हिस्से में रहता हूँ जहाँ आजा़दी के बाद ढोरों प्रगति हुई है। इस प्रगति में केवल और केवल इसी प्रदेश के लोगों का हाथ नही है। सबों का सम्मिलित प्रयास है। यहाँ के हिमायती कह सकते हैं कि आप अपने प्रदेश वापस चले जाओं मैं चला जाउगा बेहिचक नहीं रुकूँगा लेकिन एक जवाब जरुर दे दें कि आखिर जो हिमायती है वो बता दें कि आजा़दी में उनका क्या योगदान रहा है। हम तो यह कह रहे हैं कि भले ही प्रयास किया या ना किया अपने प्रदेश के ।उन पहलुओं को भी हमने उन लोगों को बताया जो इस बार में जानकारी ही नहीं रखते थे। लेकिन आप में से कुछ ही लोग हैं जो अपनी संस्कृति के हर पहलू को बाहर से आये लोगों को अवगत कराते हैं।
जब आप अपनी संस्कृति में उनलोगों को समेटेगों नहीं तो वो हरबार अपने आप को उपेक्षित सा समझेंगे। जिससे मन में द्वेष फैलना वाजिब है। ऐसा नहीं है कि यही एक तरीका है ,सबसे इन राजनीति के रोटी सेकनेवालों पर पाबंदी लगाया जाए जिससे अपने आप ये खुद के खोल में ही दुबके रहें। जिससे उन्हें अपने मुँह की खानी पडे। ये शुरुआत से ही लक्षित है कि जिस काम को दबाव के साथ आप करवाना चाहते हैं, वो कभी भी नहीं होता है। आपस में ही मतभेद होने लगते हैं जिससे एक दूसरे पर भड़कना स्वाभाविक है लोग आपस में ही गुत्थम-गुत्था करते रहते हैं। हर बार एक मन में ग्लानि लगती है कि क्या यही वो कल्पनाएँ थी हमारे अपने पुरोधाओं के, ये सारी स्थिती को देखकर शर्म आती है। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि फिर से हम आपसी द्वेष के दौर में जी रहे हैं जहाँ केवल और केवल आपसी रंजिश ही हावी है ना कि आपस में कोई सदभावना है।
मैंने अपने मन का उद्गार आपको बताने की कोशिश की है हो सकता है कि आप इससे सहमत ना हो लेकिन ये बात जरूर है कि आप जब दूसरे को खुले दिल से स्वीकार नहीं करेंगे तो दूसरा आपको दिलखोल के कैसे स्वीकार करेगा। हमने तो कभी दिल के दरवाजे को बन्द नहीं रखा लेकिन ये बाते इतने झकझोर रहीं हैं कि ये क्या हो रहा है... अब भी ये बन्द तो करो राजनेताओं अपने लाभ के लिए हजारों लोखो लोगों को जलते हुए आग में झोकने के बाद भी दिल नहीं ठंढा नहीं हुआ... मीडिया भी तो बाज आए इनको लाभ पहुँचाने से.....।

Tuesday, September 9, 2008

हर बार कि तरह एक बार फिर बेबस......,


साल दर साल लोग भले ही प्रगति करते जाए लेकिन हर बार कि तरह प्रकृति के आगे वेबस हो ही जाते हैं। बचपन से सुनते आ रहें हैं कि मधेस इलाके की शोक है कोसी। कुवांरी नदी कही जानेवाली कोसी के रौद्र रुप को देखकर भय लगना स्वाभाविक लग रहा है। हरबार की भांति अब स्थिती नियंत्रण से बाहर निकलती जान पडती है। हलाकि सरकार के हिसाब से सलाना इससे निबटने के लिए लाखो रुपये भी सरकार खर्च करने से गुरेज नहीं करती है, लेकिन आज के हालात में सब बेमानी नज़र आते हैं। हम उन्हें पिछडा कहे या भ्रष्टाचार में गले तक डूबे हैं ये कहे कुछ स्पष्ट नहीं है। लेकिन हाँ इतना जरुर कह सकते हैं कि वर्तमान बिहार सरकार के नियत में ही खोट है, जिससे मदद के हाथ ना तो बढ रहें हैं और ना ही सही मायनों पर मदद ही मिल पा रही है। लोग कि स्थिती देख कर ना कि दया भाव उमड़ता है ब्लकि क्षोभ होता है कि यही सरकार है जो खुद को जनता का हम दर्द कहती है। लेकिन सतहीतौर पर काम करने में वो बेहद ही नाकारा साबित होते हैं। अपने ही लोंगों के सामने ऐसी बातों को सामने लाते हैं कि यह कहना बेहद मुश्किल हो जाता है कि ये क्या करना चाहते हैं सचमुच ये मदद करना चाहते हैं या मदद के नाम पर कोइ ढोंग। हकीकत में ये मदद से ये कोसो दूर हैं केवल और केवल बस छलावा ही करते रहते हैं।
ये कोई मामूली बात नहीं है,कि लगभग 30 लाख लोग और 200 किलोमीटर तक बाढ की विनाश लीला फैली पडी है। हरबार ये एक ना एक नया बहाना बडी आसानी बना डालते हैं। इस बार का बहाना है कि कोशी के बाँध में दरार आया नेपाल सरकार के अनदेखी के कारण से। मतलब साफ है कि अपनी करतूत को छुपाने के लिए ये लोग नेपाल सरकार के मत्थे सार दोष मढना चाहते हैं। इसबार फिर से अपने आप को पाक साफ साबित करने के होड़ में लगे हैं ये माहानुभाव। वैसे तो होना ये चाहिए कि इस मुसीबत की घडी में ये लोग एक दूसरे का हाथ बटाएँ लेकिन ये एक दूसरे को ही नीचा दिखने के फिराक में हैं। इसी बेबसी के दौरान मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिला जो खुद ही इस चक्की में पिस चुका था। अपने परिवार के अधिकांश लोगों को खो चुका वह व्यक्ति कभी एक दरवाजे पर दस्तक लगाता तो कभी दूसरे दरवाजे पर अपने अरदास लेकर के जाता। कहीं किसी अधिकारी का दिल पसीजे और कोई कार्यवाही हो कि जिन्दा ना हो सके तो कम से कम अपने रिश्तेदारों की लाशों को भी तो खोज निकाले जिससे उनके दाह संस्कार किया जा सके। हमने तो यह भली भांति देखा कि वो अफसर इन लाचार और बेबस लोंगों की बातों को सुनना तो दूर बात करने को तैयार नहीं। जब यह रवैया बरदाश्त नहीं हुआ तो कुछ कानूनी और ठोस कदम उठाने पडे जिससे उनकी सुनवाई हो सकी। हालात तब और सोचनीय हो जाते हैं जब इन लोगो को मदद करने के लिए तैयार दल बार बार नि:शुल्क अपनी सहायता के लिए तत्पर रहता है और ये कहते हैं कि इसके लिए कितने पैसे लेंगे। मदद के लिए तैयार लोग भी कभी ये सपने में नहीं सोच पाते हैं कि कोसी की इस रूद्र रुप से निपटने के लिए ऐसा भी होता है क्या? कुछ खबर ऐसी भी आयी कि मृतकों के शरीर को तलाश करने के लिए अधिकारियों ने उनके घरवालों से पैसे माँगे जो देने में समर्थ हुआ वो तो अपने घरवालों का दाह संस्कार कर पाया जो नहीं समर्थ रहा वो आज भी अपने लोगों के अंतिम संस्कार के लिए विभाग-विभाग का चक्कर लगा रहा है। ऐसा नहीं है कि लोगों ने मदद नहीं किया सबों ने खूब मदद किया। आप को शायद जानकर ये आश्चर्य हुआ होगा कि जहाँ इस प्रदेश के लोगों को नफरत की निगाह से देखा जाता है उन लोगों ने भी मदद किया भले ही वहाँ रहनेवाले लोग इसी प्रदेश के हैं। लेकिन एक बात भले ही मैं दबी जुबान से कहूँ लेकिन कहूँगा जरुर कि मदद के लिए सारे प्रदेश के लोग एक जुट होकर के नहीं आये,ये बात अगर किसी और प्रदेश में होती तो सभी बढ चढ करके आते।.. जरा आप भी अपने दिल से सोचिए क्या वो देश का एक हिस्सा नहीं है...क्या उनलोगों को मदद नहीं चाहिए ..रोडे अटकानेवालों को सबक नही सिखाना चाहिए...अफसर क्या जाने लोगों की आप बीती...