Tuesday, January 4, 2011

एक हकीकत



मैं हर बार कुछ अलग कहने की कोशिश करता हूँ लेकिन कह बैठता हूँ हकीकत एक हकीकत ये भी है....
कायनात के ख़ालिक़
देख तो मेरा चेहरा
आज मेरे होठों पर
कैसी मुस्कुराहट है
आज मेरी आँखों में
कैसी जगमगाहट है
मेरी मुस्कुराहट से
तुझको याद क्या आया
मेरी भीगी आँखों में
तुझको कुछ नज़र आया
इस हसीन लम्हे को
तू तो जानता होगा
इस समय की अज़मत को
तू तो मानता होगा
हाँ, तेरा गुमाँ सच्चा है
हाँ, कि आज मैंने भी
ज़िन्दगी जन्म दी है

Wednesday, December 8, 2010

माँ रेवा से माँ गंगा तक....


कुछ दिनों पहले ही मैं कुछ दिन पहले ही अपने पसंदीदी गानों को सुन रहा था। जिसमें इंडियन ओसियन का माँ रेवा जो कि मेरा पसंदीदा है वो भी सुनने को मिला सुनते ही अपने पावन भूमी बनारस की यादें तरोताज़ा हो गई। हर बार की तरह ये लगने लगा कि आखिर गंगा से इतनी दूर आ गये हैं फिर भी आज भी चिरपरिचित तस्वीरें आँखों के सामने घूमने लगती है। आखिर इसका कारँ यही है कि हम माँ जो कहते हैं, तो माँ से कितना भी दूर क्यों ना चले जाए भूलना तो संभव हो ही नहीं सकता। यही कारण है कि नदियाँ सचमुच माँ के समान होती हैं। इसलिए इनके नाम भी होते हैं, माँ रेवा या माँ गंगा । जमाने बदलते गए हैं, नदियों में प्रदुषण का दबदबा इतना बढ गया है कि नदियाँ कब गड्ढों में तब्बदील हो जाती हैं कहना बेहद मुश्किल है। सरकार अपनी लाचारी बताती रहती है लेकिन इसके पीछे कोई ठोस कदम नहीं उठाती है। हमेशा ही नियमें बनते हैं, बैठके होती हैं लेकिन कभी भी इस दिशा में काम नहीं होता है कि ये कहा जा सके कि हाँ सरकार ने माँ स्वरुपा नदियों को इज्जत बढाई।
मेरा ये लिखने का उद्देश्य ये नहीं था कि आपको ये बताऊ कि नदियों के क्या हालात हैं। मैं आपको बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि नदियों की पवित्रता और आपसी सौहार्द को खत्म करने के लिए अब कई तरह के हथ कंडे अपनाए जा रहे हैं। बनारस का बम धमाका एक उदाहरण है। इसे देख कर यही लगता है कि ये एक सोची समझी चाल है जिसे अंजाम दिया गया उन मानवता के नाम पर कलंक लगानेवालों के जरिए। बनारस की गंगा आरती को अगर कोई एक बार देखे तो जीवन में हर बार देखने की चाह लगी रहेगी ये मेरा दावा है। इसके पीछे कारण है कि गंगा का आकर्षण ही उस व्यक्ति को वहाँ तक खींच ले जाएगा। आँखों में वो अनुभूति तो कैद होती ही है, साथ में मानसिक संतोष भी पहुँचाती है जिसका वर्णन करना शब्दों के घेरे में नहीं है। सात दिसंबर को जो बनारस में हुआ उसने कई सवाल खडे कर दिए। गंगा जमुनी संस्कृति वाले शहर में इस तरह के घटना को अंजाम देने वालों का उद्देश्य यही होगा कि किसी तरह पूरे देश में सहयोग और आपसी बंधन के माहौल को बिगाडा जाए। कोशिश भरपूर रही लेकिन उनके कामयाबी को नाकामी में बदले का दायित्व हमारा है। थोडा संयम हमें बरतना होगा और इस मानवता के दुश्मनों को करारा जवाब देना होगा जिससे ये फिर ऐसा कदम उठाने की हिमाकत ना कर सके। मुंबई, अहमदाबाद,दिल्ली, वाराणसी को अभी भूले भी नहीं थे कि गंगा की नगरी में एक बार फिर वो दर्द दे दिया गया जो हमें अपनों को ही शर्मशार कर रहा है। इतने कडे प्रबंध के बाद फिर से ऐसी घटनाएँ यही जाहिर करती हैं कि सरकार भी कहीं ना कहीं लचर है जिससे बार बार ऐसी दिल दहलाने वाली घटनाएँ सामने आती हैं।
इस विचार का अन्त यही है कि माँ रेवा से लेकर माँ गंगा तक की भूमि आज सुरक्षित नहीं है। मनुज पुत्रों तुम चेतों और साथ में अपने उन लोगों को भी सुरक्षित करो जो तुम्हारे करीब हैं....

Sunday, December 5, 2010

हमारी लाचारी..


कल मेरे एक मित्र से बातचीत हो रही थी, बात कब हमारे देश की राजनीति तक पहुँच गई पता ही नहीं चला। लेकिन बातें दिलचस्प थी। अन्त में उन्होने कहा कि भाई अपनी बातचीत को विराम देते हैं और चार पंक्तियाँ भी उन्होने साझा की । वो पंक्तियाँ आपको भी मैं सुना रहा हूँ.....,
देखने में लगता हूँ बीमार,
हो सकता है आप भी मुझसे करें तकरार,,
लेकिन मेरा भी मन करता है करने को प्यार,
पर क्या करुँ मैं भी हूँ,
मनमोहन सरकार की तरह लाचार,
इन पेक्तियों में रहस्य बेहद गहरा है लेकिन इसे जाहिर करना उतना ही जोखिम भरा है जितना इसके नहीं जाहिर होने से । आपको केवल और केवल तुकबंदी लगे।...

Saturday, December 4, 2010

माँ रेवा...


Kandisa, हकीकत है नदियाँ हमारी लिए माँ से कम नहीं । लेकिन ना तो आज हम माँ को ही याद कर रहे और ना ही अपनी इन नदियों को लेकिन जरुरत है अपनी संस्कृति से जुड अपने आप का उत्थान करे साथ ही लोगों को इससे अवगत भी कराएँ। इसी प्रयास में मैने इंडियानामा में इंडिया के कोने कोने से कुछ संगीत आपको सुनाने की चेष्टा कर रहा हूँ ।आप अपने विचार जरुर बताएँगे...।

दुनिया हमारी कदम में.....



Hille Le

ये हमारी कदमों की आहट है, मैंने इसे अपने परिश्रम के काल से सुनते आ रहा हूँ आप भी इसे सुनिए शायद आपको पसंद आए... ये उन कर्मठ लोगों की दास्तां है जो हवा का रुख बदलने का दम रखते हैं.....।

Tuesday, November 30, 2010

आया बिहार झूम के....


अंधेरे के बाद रौशनी होती है ...ये कहावत बचपन से ही हर किसी को याद होगा। लेकिन चरितार्थ होते हर किसी ने नहीं देखा होगा। लेकिन ये चरितार्थ हुआ इस बार के बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान। हर बार कि तरह लग तो रहा था कि इस बार कहीं प्रगति फिर ना हार हार जाए बाहुबलियों के आगे। लिहाजा पूरा महकमा मुस्तैद था। लेकिन जनता के दिलों में जो आँधी चल रही थी उसके आगे बाहुबली तिनकों की भांति कब उडकर कहाँ चले गए ये किसी को ख़बर नहीं लग पायी। राज्य में सुशासन कायम हो ऐसी संभावनाएँ बन गई हैं। जाहिर है कि पिछली सरकार के गठन से पहले राज्य में पंद्रह सालों तक लोगों की भावनाओं के साथ आत्मा को रौंद दिया गया था। हर कोई यही चाहता था कि कब बिहार से बाहर जाए और अपने जीवन के जुगाड में लग जाए। पलायन और केवल पलायन यही सूनने को मिलता। जो बाहर जाते उनके जीवन भी कोई बहुत बेहतर नहीं होते थे। उन्हें भी कई उपेक्षाओं का शिकार होना पडता था। बेहतर जीवन करने की चाह में एक 10 फुट के घर में दस दस आदमी रहते हैं जीवन बद्दतर और बेहतर के बीट में झूलता रहता था। लोगों की चाह होती थी कि कब घर लौटे और अपने ज़मीन पर कुछ ऐसा करेंगे जिससे घर वालों का भी नाम हो और अपने जीवन को भी पटरी पर लाएंगे। लेकिन जीवन लगा जाता था चाह कभी पूरी नहीं हो पाती थी।
साल 2010 के चुनाव ने नई उम्मीद बाँध दी है,हर किसी को आशा की नई सुबह दिखती है कि अब बदलाव आएगा। कुछ बदलाव तो हुए तब एक लगा कि एक बार फिर से बेहतर माहौल बनेगा और लोगों के लिए कई मौके बनेंगे जिससे हर किसी को अपने अधिकार से जीने का हक मिलेगा।
इस दौरान कई लोग मिले जो इस बारें में साफ राय रखते हुए मिले कि अब सब संभावनाए बेहतर होंगी। होनी भी चाहिए आखिर सरकार जो पूरी तरह मेजोर्टी में जो आ रही है,सरकार की हाथ अब बेहतर तरीके मजबूत है तो क्यों ना माहौल बेहतर हो। अगर बेहतर नहीं होगा तो ये तो सरकार की ही कमजोरी कही जा सकती है। बडे दिनों के बाद बक्त मिला है कुछ बदलाव करने का समय केवल पाँच साल है, इसलिए मौजूदा सरकार को काम भई ऐसे करने होंगे जिससे लोग याद रखें और भरोसा भी। चुनाव के बाद तो लोगों का झूमना यही कहता है कि आया बिहार झूम के, शब्दों में कहें तो यही होगा कि …. पूरब से सूरज निकला फैला उजियारा जगभर, जगदगुरु बनेगा बिहार फैलेगा ज्ञान विश्वभर......।

Sunday, November 28, 2010

सईयां


Saiyyan बेहद सुरीला मुझे लगा पता नहीं आपको कैसा लगे......