Wednesday, March 9, 2011

घिर गया है अँधियारा...


मैं कई बार अपने आप को अलग रखता हूँ कि नकारात्मक विचार मुझ पर हावी ना हों लेकिन होते रहते हैं और तो और मुझे भी अपने घेरे में ले लेते हैं जिससे मैं काम से भी ज्यादा इस उघेडबुन में रह जाता हूँ कि मेरे जीवन में विफलताओं के सिवा और कुछ रखा ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि विफलताएँ शुरु से ही मेरे साथ हैं पिथले दो साल से विफलताएँ और नकारात्मक विचार मुझे घेरे रहे हैं। शायद मेरे मन में चल रहे उधेडबुन का नतीजा है। खैर इसी मसले पर मुझे कुछ याद आ रहै है जो आपके सामने है.....

जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।

तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।

सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !

इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।

मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को ।

तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जावे !

Tuesday, January 25, 2011

साँझ का तारा...


मैं हर बार घर जाते समय सदैव देखता रहता हूँ कि साँझ का तारा हमेशा सर उँचा करके खडा रहता है। भले ही रात का अँधियारा रहे या दुधिया चाँदनी लेकिन साँझ का तारा अपने जलवे बिखेरता है ही। देखने में एक सामान्य तारे की तरह दिखने वाला हर बार मेरा सहचर बनता है। इंडियानामा में मैं इसे शामिल कर चूका हूँ कि इंडियानामा ना केवल देश और प्रदेश भर का है ये तो पूरे विश्व भर में फैला है..इस पर कुछ तुकबंदी की है.. क्योकि मैं कवि कदापि नहीं हूँ....
पश्चिम की दिशा से निकला चटकीला तारा
देखने में था अकेला, कहते हैं इसे साँझ का तारा,
नई उम्मीदें नई उर्जा बिखेरता करता नई शक्ति का संचार
चाँद की दमकती रौशनी भी रह जाती केवल सफेद गोला,
रात के चारों पहर तक
दमकता राह दिखाता साँझ का तारा,
दूधिया चांदनी रात हो, या काली घनेरी रात
अपनी रौशनी हर किसी पे बिखेरता चाहे वीरा हो या नीरा,
लाखो करोडों के हेरफेर से दूर
उतराता,खिलखिलाता अपनी ही चमक से भरपूर
इस तारे को मैं निहारता छोड अपनी चाहतों को दूर-दूर,
लेकिन अपने ही लोग हैं कि इस तारे को निहारते देख करते हैं
मुझी पर वार पर वार

एक कुलबुलाहट


ये कैसी कुलबुलाहट है कि मानती ही नहीं लोग आते हैं जाते हैं लेकिन अपनी अकुलाहट मानती नहीं। सच हम बोलना चाहते हैं लेकिन इस सच का गला घोटने से लोग परहेज नहीं करते। लेकिन इन परेशानियों से सच्चाई से अलग भी तो नहीं हो सकते। सच्चाई के साथ लडने वाली हर लडाई में सच्चे का साथ लेने वाले की होती है। लकिन इस पथ पर चलने के लिए ढेरों कुर्बानियाँ भी देनी पडती है। हाल का मामला है मनमाड में डिप्टी कल्कटर को आग के हवाले करने का। डिप्टी कल्कटर को आग के हवाले कर दिया गया क्योकि वो सच के पक्षधर थे और कालाबाजारी करने वालों का राज खोलने वाले थे। महाराष्ट्र एक प्रगतिशील राज्य के रुप में जगजाहिर है लेकिन ऐसे राज्य में इस तरह की करतूत शर्मसार करती है हमें। पूरा आवाम राष्ट्र के गणतंत्र हगोने की वर्षगांठ मना रहा है तो एक परिवार शोक में डूबा बोगा क्योकि परिवार का एक सदस्य कालाबाजारियों से लडाई लडते-लडते शहीद हो गया। डिप्टी कलेक्टर यशवंत सोनावने का पूरा परिवार शोक में डूबा होगा। इस अमानीय कृत्य पर शर्म मुझे भी आने लगती है कि क्या पैसा इतना जरुरी है कि लोग एक दूसरे को मारने पर उतारु हो जाते हैं। यही है बुद्ध और कृष्ण की भूमी की महानता।

Monday, January 24, 2011

दासवाणी


Daaswani

ये एक श्रद्धांजली है मेरी तरफ से जोशी जी के लिए। आज एक उपमा मेरे सामने आई जो थी स्वर सूर्य कहा गया गया पंडित जी को जो एक दम सटीक है। सचमुच सुबह सुबह अगर पंडित जी को सुना जाए तो लगता है कि सूर्य का उदय उनकी अवाज से ही हो रहा है। अह लगता है स्वर के सूरज का अस्त हो गया है, आवाज है जिसके भरोसे याद करना ही बचा रह गया है।

Sunday, January 23, 2011

यादें....


मैं कोई अपनी कहानी नहीं लिख रहा हूँ। लेकिन ये बात आज आम होने लगी है क्योकि भाग दौड के जीवन में किसी के पास वक्त नहीं। हर किसी के पास वक्त की मशरुफियत सामने आने लगती है। कुछ लोग अपने आप में ही मशरुफ रहते हैं जिससे दूसरों के तरफ घ्यान ना जाए। पिछले दिनों मैं अपने बचपन बिताए शहर गया। वहाँ आज भी लोग गर्मजोशी से ही मिलते हैं। मुझे लगा शायद यही इंडियानामा की कहानी है जो एक दूसरे को बाँधे रहती है। पूरे बाकये को कुछ पंक्तियों में बाँधने का प्रयास किया.....पता नहीं कर पाया या नहीं.....

अब हर एक नजर से बेचैनी सी लगती है,
अब हर एक डगर कुछ जानी सी लगती है,
बात किया करता है, अब सूनापन मुझसे,
टूट रही हर सांस कहानी सी लगती है,
अब मेरी परछाई तक मुझसे अलग है,
अब तुम चाहे करो घृणा या तिरस्कार मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

Thursday, January 13, 2011

बडे दिनों के बाद दर्शन होंगे.....


अर्सा बीत गया अपने मित्रों से मिले हुए। एक रिवाज था हम लोगों के बीच मिलते ही कहते थे जय हो... , जब सुखविन्दर ने गाना गाया जय हो तो, सुखविन्दर से कम खुशी हमें भी नहीं हुई। किसकी खुशी ज्यादा थी कहना मुश्किल है। महज चार दिन की छुट्टियाँ हैं इन्हीं छुट्टियों में सब कुछ ठीक करना है। मिलना तो अपने मित्रों से हैं ही साथ में कुछ और निर्णय भी लेने हैं जो बेहद खास हैं...।
खैर ये बातें तो अब जीवन का एक हिस्सा बन गई है। लेकिन सबसे ज्यादा इन्तज़ार है कि पिता जी से मुलाकात होगी, माँ के बारे में एक बार इसी ब्लॉग में बता चुका हूँ। लेकिन इस बार पिता जी के दर्शन करने की इच्छा ज्यादा है और वो पूरी होगी। शायद इस बार गंगा के भी दर्शन हो जाए उत्कट इच्छा है जो शायद इस बार पूरी हो जाए....चलें फिर जल्द मुलाकात होती है।

Tuesday, January 11, 2011

कुछ नहीं बदला....


आज सारे देश में हाहाकार मचा है प्याज की कीमत को लेकर। आजादी के लगभग 60 साल से भी ज्यादा बीत चुके हैं। हम और आप इसे बडे ङूम धाम से मानाते हैं, लेकिन पिछल 60 सालों में कुछ भी नहीं बदला आज भी पैदावार खराब होने से ज्यादा जमाखोरी से ही तबाही मच रही है। प्याज के खेल ने तो ये साफ कर ही दिया है। आज से लगभग 50 साल पहले बाबा नागार्जुन की कवित की कुछ पंक्तियाँ यही याद दिलाती हैं।


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।