Tuesday, April 19, 2011

जल रहा है जैतापूर ....


महाराष्ट्र की बेतरीन वादियों का प्रदेश रत्नागिरी जल रहा है। एक दूसरे के विरोधाभाष ने दुश्मनों सा व्यवहार करने पर मजबूर किया है। हर कोई एक दूसरे पर विश्वास करना तो दूर चाहता है कि किस तरह से इस हंगामें को और बढाए। इसके पीछे और कोई नहीं राजनीतिक पार्टियों की भरपूर राजनीति है। केन्द्र सरकार चाहती है कि इस इलाके में बदलाव की हवा के साथ-साथ विकास की गति तोज कर दी जाए लेकिन राजनीतिक पार्टियाँ चाहती हैं कि विकास हो भी तो उन्हीं के शर्तों पर विकास के लिए जो भी मसविदा तैयार किया जाए उसमें स्थानीय राजनीतिक पार्टियों को भी शामिल किया जाए जिससे वो अपनी राजनीतिक चमक को और ज्यादा हवा दे सके । जिससे रत्नागिरी के सीधे सादे लोगों पर हुकूमत करके अपना उल्लू सीधा किया करे...एक ही बात कह सकता हूँ..
आदमी आदमी को क्या देगा
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा
मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिब है
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा
ज़िन्दगी को क़रीब से देखो
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा
हमसे पूछो दोस्ती का सिला
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा
नफ़रत का ज़हर पी लिया "फ़ाकिर"
अब मसीहा भी क्या दवा देगा

Monday, April 18, 2011

अन्त कब होगा....


हमने कभी नहीं सोचा था कि कभी ये भी सोचना होगा कि अब सब कुछ खत्म कर दिया जाए। लेकिन पिछले कई दिनों से या यो कहें कि कई महीनों से लग रहा है कि अब समय आ गया है ये कहने का कि सबकुछ खत्म हो गया है। लेकिन इस उधेडबुन में हूँ कि कहने का तरीका कौन सा अपनाऊ। जल्द ही वो भी रास्ता मिल जाएगा और इसे भली भांति पूरा भी कर दिया जाएगा। लेकिन मैं तो चाहता हूँ कि इस दर्द को तब तक पालू जब तक ये जहर पांव से सीने पर नहीं चढ जाता है। गाहे बगाहे इसे कभी बढाता हूँ तो कभी यथावत रखने की कोशिश करता हूँ हाँ भूल कर भी कम करने की कोशिश नहीं करता हूँ....
यही कोशिश है......

लफ़्ज़ झूठे अदाकारियाँ ख़ूब थीं
हुक़्मरानों की अठखेलियाँ ख़ूब थीं
तूने पिंजरे में दीं मुझको आज़ादियाँ
ज़ीस्त ! तेरी मेहरबानियाँ खूब थीं
धूप के साथ करती रहीं दोस्ती
नासमझ बर्फ़ की सिल्लियाँ खूब थीं
मेरी आँखों के सपने चुराते रहे-
दोस्तों की हुनरमन्दियाँ ख़ूब थीं
बेतकल्लुफ़ कोई भी नहीं था वहाँ
हर किसी में शहरदारियाँ खूब थीं
जून में हमको शीशे के तम्बू मिले
बारिशों में फटी छतरियाँ ख़ूब थीं
हम छुपाते रहे अपने दिल के घाव को
इसलिए क्योकि आपकी हिकारत ख़ूब थीं .

Sunday, April 17, 2011

सांझ..


हर बार मन तो करता है कि ढेर सारी बातें लिखू लेकिन समय के अभाव और विचारों के संकुचन के लिए ऐसा हो नहीं पाता है। लेकिन मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं आपको इंडियानामा में अपने देश प्रदेश के हर छोटी बडी चीजों से रु-ब-रू करवाऊ। कोशिश करता हूँ पता नहीं सफल हो पा रहा हूँ या नहीं। अभी पिछले दिनों शाम के धुँधलके से पहले मैं मुंबई के नरीमन प्वाइन्ट पहुँचा। अतिशय भीड तो थी लेकिन मैं अपने आप में तन्हा था। कभी सूरज की समुद्र में डूबती किरणों को देखता कभी दूर समुद्र से अपने डेरे को लौटती नाव को देखता जो कि लहरों के थपडे से किनारो तो नहीं आ पाती। लकिन भरपूर प्रयास क बाद भी संभव नहीं लगता दिखता। हार का नाव और नाविक अपने आप को लहरों के हवाले छोड देते। मुझे ध्यान आया कि कुछ ऐसे ही मझधार में जिन्दगी भी फँसी रहती है......

दूर से आती नावों ने भी
गिरा दिये हैं अपने पाल
मल्लाहों के गान में शिखर सूर्य-से तपते
तार-स्वरों की लय में वो लपक नहीं बाक़ी
पानी में डूबे चप्पुओं में त्वरा नहीं
लहरें भी हो चली हैं ध्यान-मग्न
जाती धूप के साथ डूब चले हैं अँधेरे की परते में
मछेरों के जाल
किनारों पर ठहरी अनमनी नावों के मस्तूल
और दूर-दराज़ जहाँ-तहाँ चमकते हुए
फुनगियों के फूल
पक्षियों के ध्यान में भी उतर
आयी है,घोंसलों में तैरती-डूबी रात
चमक रहे हैं दूर,बहुत दूर
मन्दिरों के धुँधले होते कलश और त्रिशूल
और... कहीं-कहीं पानी और रेत-लहरों की लकीर
दूर पार हवा भी चुपचाप ठहरी है
मैं भी खड़ा हूँ;ठगा-सा
डूबती साँझ की गोद में.लहरों में साक्षात् घिरा
जा रहा हूँ आज, कल फिर आऊँगा शायद,
कोई राह निकल जाए जिन्दगी जीने की हठात्......

Monday, April 4, 2011

यमराज को संदेश....


मैं बराबर सोंचता हूँ कि हमारे आस पास जो भीड लगी है आखिर वो किस लिए लेकिन ये बात मेरी समझ से परे चला जाता है। कई बार इस मसले पर पिता जी से बहस भी हुआ है। पिता जी कहते हैं कि समाज है आर मनुष्य को समाज में रहना ही है इस लिए सारे लोकाचार को निभाना भी है और हर संभव हो तो इस भीज में भी रहना है।लेकिन इस भीज में रहते रहते हुए मुझे घुटन महसूस होती है क्योकि हर चेहरे के पीछे एक चेहरा थिपा नज़र आता है इसे मैं फिर कभी बताऊगा. एक शब्द में बोलू तो मैं इस रेल पेल से उकता गया हूँ... लगे हाथों मेरी इस उकताहट एक कविता रुप में निकल पडी पता नहीं आपको कैसे लगे।
मैं अपने आप में घुलकर हो गया बीमार था, यार-दोस्तों का हुजुम भी श्रद्धांजलि को तैयार था रोज़ अस्पताल आते हमें जीवित पा निराश लौटे जाते
एक दिन हमने खुद ही विचारा और अपने चौथे नेत्र से निहारा देखा चित्रगुप्त का लेखा
जीवन आउट ऑफ डेट हो गया है शायद यमराज लेट हो गया है या फिर उसकी नज़र फिसल गई और हमारी मौत की तारीख निकल गई यार-दोस्त हमारे न मरने पर रो रहे हैं इसके क्या-क्या कारण हो रहे हैं
किसी ने कहा यमराज का भैंसा बीमार हो गया होगा या यम ट्रेन में सवार हो गया होगा और ट्रेन हो गई होगी लेट आप करते रहिए अपने मरने का वेट हो सकता है एसीपी में खड़ी हो या किसी दूसरी पे चढ़ी हो और मौत बोनस पा गई हो आपसे पहले औरों की आ गई हो
जब कोई रास्ता नहीं दिखा तो हमने यम के पीए को लिखा सब यार-दोस्त हमें कंधा देने को रुके हैं कुछ तो हमारे मरने की छुट्टी भी कर चुके हैं और हम अभी तक नहीं मरे हैं सारे इस बात से डरे हैं कि भेद खुला तो क्या करेंगे हम नहीं मरे तो क्या खुद मरेंगे वरना बॉस को क्या कहेंगे
इतना लिखने पर भा कोई जवाब नहीं आया तो हमने फ़ोन घुमाया जब मिला फ़ोन तो यम के फोन ये आवाज़ आई थोडा... थोडा इंन्तज़ार का मज़ा लिजिए.. फिर एक कडक आवाज़ बोला... . .कौन? हमने कहा मृत्युशैय्या पर पड़े हैं मौत की लाइन में खड़े हैं प्राणों के प्यासे, जल्दी आ हमें जीवन से छुटकारा दिला
क्या हमारी मौत लाइन में नहीं है या यमदूतों की कमी है
फिर मेरे सवाल पर यमराज कडक आवाज़ में बोला...नहीं कमी तो नहीं है जितने भरती किए सब भारत की तक़दीर में हैं कुछ असम में हैं तो कुछ कश्मीर में हैं
जान लेना तो ईज़ी है पर क्या करूँ हरेक बिज़ी है
तुम्हें फ़ोन करने की ज़रूरत नहीं है अभी तो हमें भी मरने की फ़ुरसत नहीं है
मैं खुद शर्मिंदा हूँ मेरी भी मौत की तारीख निकल चुकी है और मैं अब भी अभी ज़िंदा हूँ।

Wednesday, March 30, 2011

खेल या युद्ध ....


कहते हैं कि खेल खेल होता है लेकिन क्रिकेट एक ऐसा खेल बन गया है केवल खेल भर नहीं रह गया है। खास कर यह खेल अगर भारत और पाकिस्तान के बीच हो तो और भी क्या कहने लोग बेतहाशा भागते रहते हैं। खैर मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ लेकिन कुछ ना कुछ तो सोचना चाहिए जरुर कि आखिर ये कब तक और कैसे संभव हो सकेगा कि खेल जंग के मैदान में तब्दिल होते रहेंगे। ये जरुर है कि हर देशवासी चाहता है कि खेल में विजय उसके देश के हिस्से में आए लेकिन अगर यही खेल भावना के रुप में रहे तो बेहतर है। भारत और पाकिस्तान के बीच मोहली में सेमीफाइनल का मैच के दौरान सारे देश में जैसे कर्फ्यू लग गया हो उस तरह का माहौल था। सडको से लोग नदारद थे। हर जगह एक ही चर्चा कि किसी तरह या मैच भारत ही जीते।लोग अपने काम छोड कर मैच देखने में व्यस्त थे। ऑफिस में खालीपन पसरा था। जूनून इतना कि बस कहिए मत... कुछ पंक्तियाँ नजर हैं आपके लिए.....
देखता क्रिकेट
एक आदमी
सूखी-सी डाल पर
तालियाँ बजाता है
एक-एक बॉल पर

मन में
स्टेडियम प्रवेश की
चाहत तो है
लेकिन हैसियत नहीं
इतनी ऊँचाई पर
भीड़-भाड़ गर्मी से
राहत तो है
लेकिन कैफ़ियत नहीं
भागा है काम से
नहीं गया
आज वह खटाल पर

दिखता है
ख़ास कुछ नहीं लेकिन
भीतर है
नन्हा-सा आसरा
इधर उठेगा
कोई छक्का तो
घूमेगा स्वतः कैमरा

पर्दे पर आने की
यह ख़्वाहिश
कितनी भारी आटे-दाल पर ।

Tuesday, March 29, 2011

कुछ तो लोग कहेंगे.....


हर बार मुझे यही सुनने को मिलता है, लेकिन इसके लिए केवल मैं ही जिम्मेदार हूँ ऐसा कहना मेरे विचार से गलत होगा। लेकिन चलो कुछ हो अब अगर तय है तो लोग कहें या सारी कायनात मेरे उपर गलत होने का आरोप लगाए इससे कुछ फर्क नहीं पडता। क्योकि एक खून किया हो या कत्लेआम किया हुआ अपराधी उसे फाँसी ही दी जाती है। लेकिन मेरे मामले में कुछ अजीब बाते है कि बिना वजह के मुझे आरोपी बना दिया गया, तो आखिर इस आरोप को और कितने दिन तक सहता रहूँ। मेरे साथ जो कुछ हुआ या हो रहा है उसके बाद तो लोग, समाज या रिश्तेदार कोई मायने नहीं रखते हैं।
बात आई गई नहीं रह गई है, यह तो मेरे दिलो दिमाग पर पूरी तरह से पैबस्त हो गई है कि अपने आप को सभ्रांत कहने वाले लोगों की हरकते कैसी है। जिसे देख कर शायद लोग कुछ नहीं कहेगे ऐसे सभ्रांत लोगों का मानना है। खैर मुझे इन बातों से क्या लेना देना क्यों मैं अपने दिमाग पर जोर डालूँ। हाँ लेकिन एक बात जरुर कहूँगा कि गलत करने वाले भी शायद चैन से नहीं रहेंगे। पिछले दो साल की अवधि में कितने बार अपमानित होना पडा इसे याद करके सिहरन होने लगती है। चलिए घाव भरने लगे है क्योकि अब राह निश्चित हो गई है तो चलना तो उसी पर है। आज लगभग एक साल होने को आ गए हैं, मैं शक्ल तक भूलने लगा हूँ, शायद मेरे लिए ये बेहतर है कि अपमान के घाव को जल्द भूल जाउँगा। लेकिन समय समय पर दिए जा रहे ताजे घाव फिर से हरे होने लगते हैं। दुख तब ज्यादा होता है जब उनलोगों को बात सुनाई जाती है जिन्हें इस पूरे मसले से कोई सरोकार नहीं है। चाह करके भी मैं कुछ नहीं कर पाता हूँ क्योकि मैं उस जगह से काफी दूर हूँ। चलो कोई बात नहीं जल्द ही सारी कोर कसर पूरी करुँगा, आवाज मेरे पास भी है बाते मैं भी सुनाने की कोशिश करँगा। हाँ लेकिन एक बात है कि मैं चाह कर भी स्खलित भाषा का प्रयोग नहीं कर पाउगा जो लोगों के जरिए बेधडक किए जा रहे हैं। कोशिश यही रहेगी की सम्मानित दायरे में ही रहकर अपनी बात को रख सकूँ।
फिर से मूल विषय पर आ रहा हूँ कि लोग क्या कहेंगे, तो मैं लोगों की चिन्ता तो जरूर करुँगा लेकिन पहले खुद के जीवन को भी तो देख लूँ। लोग अपने अपने मकसद और मतलब से तो बातें कहते ही रहेंगे र कहते ही रहते हैं लेकिन इन बातों की चिन्ता अगर फिर से करने लगूँ तो फिर एक बार और धोखा खा सकता हूँ। इस मसले पर कुछ पंक्तियाँ भी हैं....कोशिश कर रहा हूँ कि सार इन्हीं पंक्तियों में समाहित कर हूँ....
क्या कहेंगे लोग¸ कहने को बचा ही क्या?
यदि नहीं हमने¸ तो उनने भी रचा ही क्या?
उंगलियां हम पर उठाये–कहें तो कहते रहें वे¸
फिर भले ही पड़ौसों में रहें तो रहते रहे वे।
परखने में आज तक¸ उनको जंचा ही क्या?
हैं कि जब मुंह में जुबानें¸ चलेंगी ही।
कड़ाही चूल्हों–चढ़ी कुछ तलेंगी ही।
मुद्दतों से पेट में– उनके पचा ही क्या?
कहीं हल्दी¸ कहीं चंदन¸ कहीं कालिख¸
उतारू हैं ठोकने को दोस्त दुश्मन सभी नालिश
इशारों पर आज तक अपने नचा ही क्या?

Wednesday, March 9, 2011

घिर गया है अँधियारा...


मैं कई बार अपने आप को अलग रखता हूँ कि नकारात्मक विचार मुझ पर हावी ना हों लेकिन होते रहते हैं और तो और मुझे भी अपने घेरे में ले लेते हैं जिससे मैं काम से भी ज्यादा इस उघेडबुन में रह जाता हूँ कि मेरे जीवन में विफलताओं के सिवा और कुछ रखा ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि विफलताएँ शुरु से ही मेरे साथ हैं पिथले दो साल से विफलताएँ और नकारात्मक विचार मुझे घेरे रहे हैं। शायद मेरे मन में चल रहे उधेडबुन का नतीजा है। खैर इसी मसले पर मुझे कुछ याद आ रहै है जो आपके सामने है.....

जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।

तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।

सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !

इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।

मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को ।

तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जावे !