Tuesday, March 27, 2012

बहुत दिनों बाद....स्वाभिमान की लडाई के मैदान में..


मैं काफी दिनों बाद आपके साथ हूँ, दरअसल खुद के स्वाभिमान की रक्षा के लिए धर्मयुद्ध में व्यस्त था। मेरे स्वाभिमान की लडाई का कुछ अंश आपके सामने रखूँगा और राय भी जानना चाहूँग। अगर आप घर लौटे और देखे कि सब कुछ बदला बदला हुआ है तो कुछ नया पना सा महसूस होता है। मेरे लिए मेरा काम का स्थान ही नयापन लिए हुए है, घर और मेरे पुराने शहर में मेरे लिए कुछ नहीं बदला है। बदला है तो लोगों का सोंच का नजरिए वो भी मेरे प्रति। जो भी हो विचारों की स्वतंत्रता तो सबको होनी ही चाहिए। मैं व्यवस्था के खिलाफ लडाई लडता हूँ और उसे जीत भी जाता हूँ। लेकिन अपने कहे जाने वाले लोगों के लगाए दाग को आज भी नहीं झटक पा रहा हूँ। क्योकि मेरा मानना है कि अगर सच्चाई मैं बता दूँ तो शायद मेरे उपर तोहमत लगाने वाले खुद शर्मसार हो जाए। मेरा कभी भी ऐसा विचार नहीं है कि किसी नुकसान पहुँचाउ या आरोप लगाउ, लेकिन क्या करु पत्रकार हूँ, हर काम में खोज बीन करने की आदत बन गई है। इसी खोजबीन ने कई सच्चाईयों को उजागर कर दी हैं। लोग के दोहरे चेहरे सामने आ गए हैं। लोगों की सच्चाई सामने आ गई है। अपने आप को स्वच्छ और धवल बताने वाले कीचड में कितने सने है वो सामने आ गया। मैंने तो मन बना बना लिया था कि इसे सामने ला कर लोगों के बेशर्म जुबान को बंद करुँगा। लेकिन मुझे उनके हालत पर तरस आ गया इसलिए तोहमत अपने उपर ही सह कर, मेरे उपर लगाए गए कई मनगढंत आरोपों को खुद अपने सामने सुनने के लिए अपने पुराने शहर भी गया। शहर में आने की सूचना भी दी लेकिन नतीजा फुस्स हो गया। लोग बात करने से दूर भागने लगे, शायद अपनी गलती से मुँह छुपाने का मन बनाया हो। आप भी कहेंगे कि मैं क्या कहने लगा हूँ...आखिर बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी......।
लोग कुछ भी कहें कि पैसा ही सबकुछ है, मैं नहीं मानता हूँ। पैसा से गुलाम खरीद सकते हैं,स्वाभिमान नहीं। आज इसी स्वाभिमान की लडाई मैं लड रहा हूँ। कुछ लोग जो आपकी जिन्दगी में बाद में आएंगे वो अगर धन पति होंगे तो यही समझेंगे कि अपनी धन की गरिमा से आपके स्वाभिमान सहित आत्मा को भी अपने वश में कर लेंगे। लेकिन जब हो नहीं सकेगा तो अपके उपर कोई भी आरोप लगाने से गुरेज नहीं करेंगे भले ही आरोप कितना ही शर्मनाक हो। जब लोग किसी भी कीमत पर अपने विचार लादना चाहते हैं तो शायद दूसरे को नीचा दिखाने के लिए उसपर हर तरह से वार करना नहीं चूकते। मेरे जीवन का लक्ष्य रहा है कि किसी से अहसान ना लो और हो सके तो लोगों की मदद कर दिया करे। इसे लक्ष्य के अनुरुप आचरण भी करता हूँ तो मेरे साथ कुछ समय से जुडे लोगों को लगता है कि मैं झक्खी(यही शब्द इस्तेमाल किया गया था) हूँ। ऐसे शब्द शायद ही किसी सभ्रांत घर के शब्द हों, लेकिन धनकुबेरों के यहाँ ऐसे शब्द आम चलन मे हैं। आपस में इस तरह की तेरी मेरी होती है कि सम्मान तो दूर भाषा से व्याभिचार होने का भी अहसास नहीं। हद तो तब हो जाती है जब अपने ही माता पिता को उपेक्षित सा जीवन बिताने पर मजबूर करने वाले लोग नीति ज्ञान देते है। आज कल चलन है कि अपना काम निकालने के लिए एकदम से मृदुभाषी बन जाइए और काम निकलते ही जिनके पैर छूते थे उन्हे आँखे दिखाने से भी परहेज ना करें। अगर सामने वाला स्वाभिमानी हो तो उसे आप कहें कि वो तो हाथी के दाँत की भांति है दिखाने के और साथ में खाने के और दांत रखता है। लेकिन लोग तो आज कल शर्म को शरबत बना कर पी रहे हैं। आरोप दूसरे पर लगाते हैं, और आरोप गलत होने पर कुछ नए आरोप लगाने की जुगत में रहते हैं। शायद ये बेशर्म जमाने का ही असर है। ईश्वर का शुक्र है कि मेरा साथ ऐसा नहीं है। मेरे उपर मेरे माता पिता के जरिए किया गया उपकार है कि इस तरह के आचरण से मैं बचा हूँ। शायद आप इन आचरणों के गलत मानें और इससे बचने की चेष्टा करें। लेकिन कुछ लोग इसे ही सही और उचित मानते हैं, और इसी में सम्मान समझते हैं। स्वाभिमान की रक्षा के लिए इतिहास के कई उदाहरण हमारे सामने हैं। कई लोग तो अपने खुद के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपनी पूरे परिवार से मोह भंग कर लिया था। आज शायद ही ऐसा कोई विरले कर पाए। मुझे आश्चर्य होता है कि रामचरित मानस के रचनाकर अपने परिवार से विमुख होकर कैसे सन्यास को निकल गए। मुझे तो भी कभी ऐसा लगता है कि भोगवादी संसार में जब लोगों का बेजा आक्षेप लगने लगता है और सच्चाई कुछ और सामने आने लगती है तो विरक्ति स्वाभाविक हो जाती है। शायद इतिहास पुरुषों के पीछे भी यही कारण रहा होगा। अभी हाल ही में मैने प्रेमचंद की लिखी एक कहानी कुछ कहानियाँ पढी जिसमें से कई कहानियों के पात्र अपने स्वाभिमान के रक्षा के लिए नाते संबंधियों को तक छोड देते हैं। ऐसी ही एक कहानी थी घरजमाई जिसमें हरीधन अपने स्वाभिमान की रक्षा में अधेड उम्र में सजग हुआ और बची हुई जिन्दगी सम्मान से गुजारा। सच्चाई ये है कि सम्मान रक्षा के लिए बेहद कष्ट उठाने होते हैं। लेकिन अगर सम्मान की रक्षा होती है तो सारे कष्ट केवल कुछ वक्त का फेर भर जान पडता है। भले ही स्वाभिमान की रक्षा गुलाम भारत में की गई हो या आज के आजाद भारत मे। अंग्रेजों के जरिए गुलाम बनाए जाने के दौर में गुलाम के दाग को हटाना ही स्वाभिमान रक्षा था। लेकिन आज के आजाद भारत के दौर में लोगों के जरिए संबंधों के जाल में फांस कर अपने गुरुर से गुलामी की जंजीर डालने वालों से मुक्ति साथ-साथ कई तरह के आरोपों के कलंक से छुटकारा ही स्वाभिमान की रक्षा बन गई है। आप भी कहेंगे कि कहीं ऐसा भी होता है कि कोई संबेधों के जरिए गुलाम बनता है। मैं तो कहता हूँ कि जरा गंभीरता से सोंचे तो हर पहलू आपको आइने में अक्स की तरफ साफ दिखेगा कि कौन किस तरह से गुलाम बनाता है। शायद इतिहास के वो दिन आपके जेहन में जरुर स्मरण हों जब एक देश से दूसरे देश से संबंध इसलिए बनाते थे कि संबंधों की प्रगाढता दिखा कर गुलाम बनाना आसान होगा। आज गुलाम बनाने का अंदाज कुछ तो मिलता जुलता है कुछ जमाने के साथ एकदम से आधुनिक हो गया है। मेरे विचार से कोशिश यही करें कि गुलामी की दासता ना स्वीकार करें कहीं आप अपने स्वाभिमान को ही ना खों दें, हर समय सचेत रहें, भले ही कोई आपका आत्मीय क्यों ना हो। चलें तो फिर से समेट ले अपने तरकस और तैयार हो जाइये समाज में अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए.....स्व अभिमान से बडा शायद अपना राष्ट्र हो सकता है जिसके लिए स्व अभिमान का त्याग करना हर किसी को गर्व होगा ना कि किसी के कदमों में बेंजा संसार के उलझनों के लिए।... अब तो सर उठा कर हम कहेंगे, और लोग अपनी निगाह से देँखें..
तहज़ीब के ख़िलाफ़ है जो लाये राह पर
अब शायरी वह है जो उभारे गुनाह पर
क्या पूछते हो मुझसे कि मैं खुश हूँ या मलूल
यह बात मुन्हसिर है तुम्हारी निगाह पर

Monday, November 21, 2011

देर लगी लेकिन निकल ही आया........,


शायद आप शीर्षक को देखकर कयास लगाते रहे लेकिन, हकीकत है कि आज मैं भूल गया वो सारी बातें जो मेरे साथ छल से किया गया था। मैं अब पूरे मानसिकतौर पर सर्मपित हूँ अपने कार्य के प्रति। लेकिन पिछले तीन सालों में जो मैंने झेला शायद ही कोई उसकी वेदना समझ पाएगा। खैर कोई बात नहीं आज से लगभग 40 साल पहले लिखी गई बातें मुझे सच जान पड रही हैं। वो बातें हैं.---
जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।
इन्हें मैं बेहद नजदीक से देखता गया। तभी तो आज उबर सका अपनी उस नकारात्मक सोच से। मई महीने के बाद से अब तक गंगा में पता नहीं कितनी धाराओं ने अपनी मंजिल पा ली होगी। लेकिन मैं अपने पुराने विचारों को छे ही रहा था। मैं अपने उपर ब्रेक लगा चुका था। लेकिन अब नहीं जब प्रकृति भी बदलती है तो मैं क्य़ो भला एक ही विचार में बराबर रहूँ ,लिहाजा आज मैं अपने आर को बदल चुका हूँ,नई परिस्थिती के मुताबिक अपने आप को ढाल चुका हूँ।
चलो शुरुआत करता हूँ अपने पिछले काम से ही देश भर घूमता रहा तब जाकर खुद का सांत्वना मिली। अपने आप को तलाश पाया कि आखिर हम कहाँ हैं और किन हकीकतों से हमें रुबरु होना है। साथ दिया हमारे मित्रों ने बाहर निकाल उस अवसाद की कोठरी से जिसने मुझे रखा था। साथ में भ्रष्टाचार के खिलाफ सडे हुए अन्ना हजारे की मुहिम को भी नजदीक से देखने को मौका मिला। उससे भान हुआ कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी ऑफिस और बडे स्तरों पर नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर भी है। इसके खिलाफ उठ रहे हर आवाज़ को बलंद करना होगा तभी तो इसे मिटाने में कामयाबी मिल सकती है। मैने बेहद नजदीक से देखा कि आखिर लोग अन्ना हजारे को वली क्यों मानते हैं। मेरा खुद का मानना है कि अगर तर्क के आधार पर भी आप देखे तो एक अकेला आदमी ने खुद के लिए ना करके समाज के लिए बेहद काम किया है जो काबिले तारीफ है । जब मैं दूर सूदूर तक जाकर देखा कि आखिर प्रगति के पीथे और कौन कौन से कदम हो सकते हैं जो समाज सहित खुद मानस को भी आगे बढाए, मुझे तो यही समझ में आया कि अगर प्रयास सही दिशा में और अनवरत हो तो जैसे जल की शक्ति को बिजली में तब्दील करते हैं उसी तरह मानव शक्ति को प्रगति में तब्दील कर सकते हैं। साफ यही पंक्तियाँ हैं.....
इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ,
मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ,
जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ,
सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ,
कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए,
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ।

Sunday, June 19, 2011

सरकार की चुप्पी वो भी पत्रकारों के प्रति....


महाराष्ट्र सरकार पता नहीं क्यों चुप्पी साधे हुए है, सरेआम पत्रकार की हत्या होती है और कार्यवाही के नाम पर मजह लोगों से पूछताछ भर। लगभग दो सप्ताह गुजरने के बाद भी सरकार के तरफ से ठोस कार्यवाही सामने नहीं आ रही है। हर तरफ एक सन्नाटा ही पसरा हुआ है। इस सन्नाटे के पीछे भी अब कुछ ऐसी अवाज़ें उठनी लगी हैं जिन्हें जानकर लगता है कि आखिर आपसी गुटबाज़ी से लोग कब उपर उठेंगें। अपराध की रिपोर्टिंग करते थे जेडे, लेकिन कब अपराधियों के निशाने पर आ गए शायद उनको खुद भी पता नहीं था। समाज में हो रहे अपराध के बारें सरकार को बताना हम पत्रकारों का धर्म है,जिसके बदले में हम चाहते हैं सरकार इन अपराधियों पर नकेल कसे और आम शहरी को रहने का स्वस्थ सुन्दर माहौल दे। लेकिन यहाँ तो उल्टा ही हो रहा है, ना तो सरकार नकेल कसती है और ना ही आम शहरी अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहा है। आफत उन पत्रकारों पर मौत के रुप में गिरती है, सरकार इस पर व्यक्तिगत दुश्मनी का नाम देकर मामले को किसी कोने में दफ़न कर दे रही है। देर सबेर शायद जेडे के मामले में भी यही बात सुनने को मिले। लेकिन मैं अपने उन वरिष्ठ भाइयों से सवाल करता हूँ कि क्या उनकी चेतना कभी नहीं जगती कि आखिर सरकार के इस रवैये पर रोक लगाई जाए। सरकार की इस मंशा पर से सच्चाई का पर्दा उठाया जाए। ये सवाल केवल मेरा नहीं है, मेरे जैसे लाखों हजारों उन लोगों का है जो अब देख चुके हैं कि सरकार की साठगांठ किन लोगों से है। हर वो आम शहरी अब जानता है कि पिछले कई सालों में सत्ता में रहने वाले लोगों ने किन किन राहें से पैसे कमाए। जिसे उजागर करने में कितने ही जेडे जैसे लोग कुर्बान हो गए।
मुझे मुंबई आए हुए लगभग 15 साल तो हो ही गए लेकिन मैं सरकार कि इस तरह की निरंकुशता कभी नहीं देखी। ना तो अपराधियों को पकडती है और ना ही अपनी अक्षमता ही जाहिर करती है। जबकि मुंबई पुलिस की तुलना स्कॉटलैन्ड पुलिस से की जाती रही है। मुझे तो कहना नहीं चाहिए लेकिन लगता है कि मुंबई पुलिस को भी जंग लग गई है। उनके धमनियों में बहने वाला खून अब आम आदमी के बारे में नहीं सोंचता केवल राजनेताओं की चौकीदारी करने में ही उन्हे शायद गर्व महसूस होता है। यही लगभग दो साल पहले जब पाकिस्तानी आतंकी मुंबई पर हमला किए तो मुंबई पुलिस के जवानों ने अपनी लाश बिछा दी क्योकि उनके पास आतंकियों से लडने के साधन नहीं थे। तुकाराम ओम्बले के नाम से आप सभी परिचित होंगे एक साधारण से सिपाही ने कसाब की गोलियाँ खाकर भी निहत्थे ही उसी जकडे रहा, उस कसाब को हम आज मेहमान की तरह पाल रहे हैं।
खैर कसाब तो पाकिस्तान के जरिए आतंक फैलाने के मकसद से ही आया था, लेकिन क्या देश को खोखला करने वाले हमारे दुश्मन नही है। करोडों की अबादी वाले देश में क्या सरकार के इस निरंकुशता का कोई हल नहीं है। मैं पूछता हूँ कि, आम जनता कि लडाई हम लडते हैं तो आम जनता जेडे की हत्या पर क्यों चुप बैठी है। शायद हमें ही इस लडाई को आम जनता के बीच ले जाना होगा जिससे कोई और दूसरा पत्रकार इन दानवों की भेंट ना चढे। महज सांत्वना और श्रद्धांजली भर से काम नहीं चलेगा, सरकार से जवाब भी मांगना होगा.. मित्रो मेरी गुज़ारिश है कि हम अपने ही साथी के बलिदान को बर्बाद ना होने दें कलम की ताकत किसी तोप की ताकत से कम नहीं..... निराला जी कि कुछ पंक्तियाँ हैं जो सटीक बैठती हैं...
सह जाते हो
उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न,
हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न,
अन्तिम आशा के कानों में
स्पन्दित हम - सबके प्राणों में
अपने उर की तप्त व्यथाएँ,
क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँ
कह जाते हो
और जगत की ओर ताककर

Sunday, June 5, 2011

क्या यही लोकतंत्र है....


मैं कभी भी बाबा रामदेव का अंध भक्त नहीं रहा। लेकिन अगर तर्क के साथ पूरे वाकये को देखें तो बडा ही अजीब लगता है, कि क्या भारतीय सरकार एक साधारण से संत से डर गई है। कपिल सिब्बल के जरिए बाबा का करार नामा दिखाना तो कम से कम यही लगता है कि सरकार डर गई थी। जिसके बदले में पहले ही सोची समझी नीति के तहत रामदेव से सहमति पत्र लिखवाया गया । इस सहमती पत्र के बदौलत ही तो कांग्रेस सरकार ने रामदेव पर छीटा कसी की । अपनी छवि को धुमिल होता देख बाबा भी अपने रौद्र रुप को दिखाने में नहीं हिचके भले ही उन्हें खुद और उनके समर्थकों को लात घूसों का प्रहार झेलना पडा हो।
लेकिन सोचिए जरा कि आखिर रामदेव इस झमेले में कैसे पडे। बात दुरुस्त है कि कहावता है कि ताकत उसी के पास है जो या तो सत्ता में है या सत्ता के बेहद करीब। रामदेव भी ताकत चाहते थे शायद। लेकिन एक बात और कडवी सच्चाई है कि अगर ताकत चाहिए थी तो केवल योग ज्ञान से भी ताकत और पैसा कमा सकते थे। क्या जरुरत थी सरकार से उलझने की। कहीं ना कहीं तो जरुर भारते के प्रति दर्द है जो सालता रहा और इस रुप में सामने आया।
कई सवाल मेरे मन में उठते हैं आखिर कौन सी बात सरकार का खलने लगी जिससे बेसहारा और कमजोर महिलाओं पर लाठियों का प्रहार किया गया। युवा तो युवा बच्चों और बुजुर्गों को भी नहीं छोडा पुलिस ने।पुलिस और सरकार के दमन चक्र में सबको डाल कर पिस दिया गया, जैसे दिल्ली के रामलीला मैदान में जमा लोग इन्सान ना होकर जानवर से भी बदतर हैं। उनके साथ किए गए सलुक ऐसे कि लोकतंत्र भी शर्मशार होने लगे.... अभी बस इतना जल्द ही जल्द ही हमारी और आपकी पूरी बहस चालू होगी ।

Tuesday, May 31, 2011

मेरी आदमीयत....


जमाना बदल रहा है, लोग विश्वास का दिखावा कर रहे हैं और पीठ पीछे धोखा कर रहे हैं। इसी विश्वास के नाम पर की जाने वाली ठगी का शिकार मैं भी हूँ।मेरे अपने और पुराने शहर में ही मेरे साथ छल किया गया। इस बदले ज़माने में ये बात मैं अब आम मानता हूँ। मुझे लगता है कि लोगों कि महत्वाकांक्षाएँ ही इतनी ज्यादा हैं कि किसी पर तोहमत लगा कर आगे बढने में कोई हिचकिचाहट नहीं है। अगर बस चले तो स्वार्थ के लिए दूसरे की हत्या करवाने से भी गुरेज नहीं कर सकते हैं। लेकिन ये खुद के जज्बें हैं कि इस वार को भी झेल कर अपना संतुलन नहीं खोता हूँ। अगर इन्हें शब्दों में बाँधे तो कुछ इस तरह निकल कर आ सकता है।

विश्वास की हथेली पर रखा गया धोखा
आत्मीयता के हवाले किया गया छल
फिर भी ज़िन्दा रहा आदमी की तरह,
बार-बार धोखे और छल से गुज़रकर।
ढकेला गया पहाड़ से नीचे बार-बार
बार-बार आग में डाला गया ज़िन्दा
डाला गया बार-बार समुद्र के तल में
निकला फिर भी सही और साबित
बचा रहा--- बचा रहा आदमीयत फिर भी।

Tuesday, May 17, 2011

मोहसिन कौन...


आज ज्यादा लिखने का ना तो मन कर रहा है और ना ही फुरसत ही है। डॉक्टर के पास जाना है , पिछले कई दिनों से उलझन में था, उससे निकले के कोशिश कर रहा हूँ। इस उलझन में मैं जब जब अनयास बैठा रहता हूँ, उस समय कई विचार घेरते रहते हैं। कई बार तो सोंचते सोंचते मन कई दिशाओं में घूमने लगता है जिसे देखकर जीवन से ही विरक्ति होने लगती है। लेकिन मेरी विरक्ति से किसी को फायदा भी जरुर होता है... मेरी इस अवस्था पर वो बेहद जश्न भी मनाते हैं....।फिर भी आपका साथ है जिससे एक बार फिर बिखरने से पहले ही जुड जाता हूँ और यायावरी शुरु हो जाती है....


देख कर आवाम यही कहता,
हर बार ही रहता कहीं ख्वाबों में,
तो कहीं किसी का मुन्तजिर रहता हूँ,
मैं कहता हूँ कि मैं कोई मोहसिन नहीं
मसलक को ख़्याल कर चलता हूँ,
और ये कवायद बेज़ा नहीं मेरे मुन्सिफ
अपने आप को भूलने की,
कोशिश हर बार करता हूँ।

Monday, May 16, 2011

अँधेरे से मुकाबला जारी...


अगर कोई जबरदस्ती कहे कि मैं आपका ही हूँ, और आपने मुझे छोड दिया है। तो ये बातें उसी तरह लगती हैं जैसे सोनिया गाँधी से नरेन्द्र मोदी कहे कि मैं तो कांग्रेस का ही हूँ और आपने मुझे छोड दिया है। जो खुलेआम आपकी इज्जत की धज्जियाँ उडा दे,सरेआम आपको गालियों से सराबोर कर दे वही आप से कहे कि मैने तो कुछ किया ही नहीं तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। मेरे साथ ये कई बार से हो रहा है, हर बार आरोप पर आरोप ही लग रहे हैं। चलो इसे भी सहते हैं। कहते हैं कि हमारे इसी भारत वर्ष में कृष्ण और शिशुपाल भी हुए थे। कृष्ण ने वचन दे रखा था कि एक लगातार शिशुपाल 100 गलतियाँ लगातार करेगा तभी उसे सजा देगें वरना नहीं। लेकिन गलतियाँ पूरी होने के बाद शिशुपाल मारा भी गया। मैं ना तो कृष्ण हूँ ना ही कभी कोई ऐसा व्यवहार करने की तमन्ना रखता हूँ। लेकिन हाँ ये जरुर है कि हिसाब किताब जरुर रख रहा हूँ। क्या पता कभी इंडियानामा में कुछ नया लिखने को मिल जाए आज कल मैं इंडियानामा में समाज के उस स्वरुप को दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ, जो सीधा लोगों से जुडा है। उस कडी में मैं रहूँ या कोई और रहे। लेकिन हकीकत यही है कि बदलते दौर में बगैर अपनी गलतियों को देखते हुए आरोप लगाना आसान हो गया है। मैं मानता हूँ अगर मैं किसी पर आरोप लगा रहा हूँ तो कम से कम आचरण तो ऐसा करुँगा कि मुझे दोषी नहीं ठहराया जा सके। लेकिन ऐसा नहीं है। पिछले ब्लॉग में मैने लिखा ही है कि पंडित सोई जो गाल बजावा अक्षरस: सही है। हल्ला मचाओ किसी की सूनो नहीं अपनी मन गढंत बातें घूम-घूम कर कहो हर तरह का क्षद्म उपयोग में लाओ जिससे लोग तुम्हारी झूठी बातों को भी सच मानने लगे। यही है आज कल अपने आप को काबिल साबित करने के तरीके।
अब लिजिए ना पिछले ही दिन बंगाल सहित बाकी राज्यों में चुनाव हुए। उन चुनावों में क्या जीत कर आने वाले दूध के धुले हुए, हैं मेरे ख्याल से तो बिल्कुल नहीं। ममता बनर्जी हो जयललिता दोनों ही अपने लोगों के सामने जाहिर किए गए उसूल से विपरीत हैं। 1991 में जयललिता के यहाँ गए जाँच दल ने गहने कपडे सहित पैसे और मँहगी साडियों के खान को ही सामने लाया। वहीं ममता बनर्जी तो कहतीं कि वो हवाई चप्पल और सूती साडी ही पहनी हैं, लेकिन चुनाव के दौरान प्राइवेट जेट और हैलीकॉप्टर की सेवा लेने में हिचकी तक नहीं। आखिर पार्टी के पास इतना पैसा आया कहा से। इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
ये बडे लोग और राजनेता हैं किसी आम इन्सान के बारे में बात करें। मेरा एक मित्र है जो आजकल अपने परिवार से अलगा एकाकी रह रहा है उसके मुताबिक उसके परिवार के सदस्य उसका साथ इसलिए छोड दिया क्योकि वो गलत है। लेकिन मैने जिस तरह के साक्ष्य और सबूत देखे उसमें यही लगता है कि गलत वो नहीं ब्लकि उसके परिवारवाले हैं। लेकिन लोगों ने उसके बारे घूम घूम कर ऐसा कुप्रचार किया जिससे कई बार तो उसके हिम्मत टूटते हुए मैने देखा। फिर मैने उसे ढाढस बँधाया और कहा कि मानव हो कभी भी हिम्मत नहीं हारो । ये तुम जानते हो और तुम्हारा ईश्वर जानता है कि तुम कितने सच्चे हो, इसलिए कभी ये मत सोचो कि इन्साफ नहीं मिलेगा। जरुर मिलेगा ये तो तुम्हारी परीक्षा की घडी है कि तुम विकट परिस्थितियों में कैसा आचरण रख रहे हो। कुछ दिनों के बाद धीरे धीरे जीवन सामान्य होने की कगार की तरफ बढने लगा।
इस बात से मुथे यही कहना है कि कष्ट उसे बहुत हुआ क्योकि गलत बाते उसे ना तो जीने देती थी और ना ही मरने क्योकि कलंक लेकर ना तो जीया जा सकता है और ना ही मरा। ईश्वर दुशमन को भी इस परिस्थिती में ना जाले। लेकिन सामनेवाले बडे चैन से जीवने के मजे जी रहे थे। मुझे तो लगता है कि ऐसे आरोप लगाने वाले और आरचरण करने वालों के पीछे कोई ऐसी मानसिकता होती होगी जिससे उनके अहं की संतुष्टी मिलती होगी कि हाँ वो श्रेष्ठ हैं। मैं तो केवल यही कहूँगा......
पी जा हर अपमान और कुछ चारा भी तो नहीं !
तूने स्वाभीमान से जीना चाहा यही ग़लत था
कहाँ पक्ष में तेरे किसी समझ वाले का मत था
केवल तेरे ही अधरों पर कड़वा स्वाद नहीं है
सबके अहंकार टूटे हैं,वो अपवाद नहीं है
ग़लत परिस्थिति ग़लत समय में ग़लत देश में होकर
क्या कर लेगा तू अपने हाथों में कील चुभोकर
चाहे लाख बार सिर पटको दर्द नहीं कम होगा
नहीं आज ही, कल भी जीने का यह ही क्रम होगा
माथे से हर शिकन पोंछ दे, आँखों से हर आँसू
पूरी बाज़ी देख अभी तू हारा भी तो नहीं।