Wednesday, November 7, 2012
अभी हारा नहीं....
Wednesday, March 28, 2012
हर कोई एकाकी है...

हम जब आज में जीते हैं तो हमें ये भी ध्यान रखना चाहिए कि आखिर आने वाला दिन कैसा होगा,इस आज के साथ बदलते लोगों और बदलते परिवेस को भी समझना बेहद जरुरी है। जिसे हम समझते और देखते भी हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ बातें बरबस हमें अपनी तरफ खींच लेती हैं, और याद दिलाती हैं कि आखिर कुछ तो है जो असहज है। सटीक बैठती हैं ये पंक्तियाँ इस कसमकस के लिए,.....
ख़ून में लथ-पथ हो गये साये भी अश्जार के
कितने गहरे वार थे ख़ुशबू की तलवार के
इक लम्बी चुप के सिवा बस्ती में क्या रह गया
कब से हम पर बन्द हैं दरवाज़े इज़हार के
आओ उठो कुछ करें सहरा की जानिब चलें
बैठे-बैठे थक गये साये में दिलदार के
रास्ते सूने हो गये दीवाने घर को गये
ज़ालिम लम्बी रात की तारीकी से हार के
बिल्कुल बंज़र हो गई धरती दिल के दश्त की
रुख़सत कब के हो गये मौसम सारे प्यार के।
Tuesday, March 27, 2012
बदलते दिन के साथ बदलती रंगत....,

मुझे याद है कि जब हम कहीं किसी दूसरे शहर में जाते थे, और वहाँ के बदले हुए माहौल का देखते तो खुद को भी उसी माहौल में ढालने के लिए उसी रंगत में हो जाते थे। आज का माहौल भी कुछ अजीब लग रहा है लेकिन इस रंगत में खुद को बदलने का ना तो दिल करता है, और ना ही आत्मा। लोगों का दबाव इस तरह से कि जल्द से जल्द बदल कर, अपने आप को स्वार्थी लोंगों के हवाले कर दें। हर बार आरोपों की बौझार दूसरों पर करना आसान होता है कि सामने वाला व्यक्ति स्वार्थी है। लेकिन लोग अपने गिरेबां नहीं देखते कि अगर सामने वाले व्यक्ति ने आपसे ना तो कुछ लिया और ना ही कभी कुछ मांगा तो स्वार्थी कैसा, उल्टे आपकी आमानत उसी स्थिती में वापस लौटा दिया तो स्वार्थी कैसा। लेकिन भाई यहाँ ना तो आरोप लगाने का कुछ मूल्य चुकाना पडता है और ना ही कुछ खर्च करना पडता है। बस बिना परवाह किया और बगैर सच के पडताल किए बस आरोप लगाते रहें। हर कोई सच भी मान लेगा क्योकि यही तकाजा है अगर आपके आस पास झूठ का ताना बाना इस तरीके से बुना जाए कि सच के सारे अंश ही उस ताने और बाने के बीच फंस जाए ना तो किसी को दिखाई दे और ना ही अपने वजूद को ही दिखा पाए तो झूठ ही सच मान लिया जाता है। यही आज की रंगत है कोई ना तो उस ताने और बाने के बीच दबे सच को देखेगा और ना ही तलाशने की कोशिश करेगा। निश्चय ही आप इस पक्ष पर भी जोर देंगे कि तब सच किस मजबूरी में ताने बाने में फँसा है, क्यों नहीं सबों के सामने आता है। मुझे लगता शायद वो इस अंदेशे में है कि अगर वो सामने आया तो झूठ की परतें तो खुल जाएगी लेकिन जिस रेशमी किमखाब को बनाने में उसने मेहनत की है उस रेशमी किमखाम में ही पेबंद लग जाएगा ना तो वो सजाने का काम आएगा और ना ही किसी और काम में एक बेकार की भाँति अलग कर दिया जाएगा। सच इस बात को भी सोचता होगा कि शायद उसकी बलि देकर के झूठ का कल्याण हो जाए तो कोई बात नहीं अगले जन्म में शायद उसे न्याय मिल पाए। ये मेरा मानना है क्योकि मैनें दोनों पक्षों का एक तटस्थ की भांति देख रहा हूँ। शायद आपकी नजर में कुछ और हो।
ये उदाहरण देने का मेरा मकसद था कि अगर कोई किसी के जरिए दबाया जा रहा है तो हमारा धर्म बनता है कि सही और गलत का फैसला करते समय दोनों पक्षों को देखा और सुना जाए और सही निर्णय सुनाया जाए। कई लोग कहते हैं ऐसा नहीं है कि भला आदमी सही निर्णय ले सकता है, क्योकि वो कभी कभी मोह में भी पडता है। जिससे उसके न्याय करने की प्रवृति भी संदेह के घेरे मे आती है। मैं मानता हूँ कि भला व्यक्ति किसी के मोह में कभी कभी पड सकता है। लेकिन फिर भी वो दोनों की बातें सुनता है, निर्णय भी तर्क संगत बताता है, लेकिन बदले हुए रंग में जब बुरा व्यक्ति साने आता है तो वो ना तो उसके निर्णय को मानने के तैयार है, और ना ही उसके विचारों से सहमत तो भला व्यक्ति क्या करेगा। बुरा व्यक्ति तो हर समय छल प्रपंच ही रचता रहेगा तो भले व्यक्ति में भी उसे बुराई ही दिखाई देगी। ऐसे कई वाकये मैने अपने सामने भी देखें हैं, और आज ऐसा ही एक उदाहरण देख कर मुझे हँसी आती है कि जो लोग कभी खरी खरी बाते कहने का दंभ भरते थे, वो कितने मिथ्याभाषी हैं, हमेशा से अपने झूठ को सच बनाने के लिए किसी के पूरे जीवन की पूँजी भलमानसियत और सच पर य़भी आक्षेप लगाने से बाज नहीं आते। सबसे बडी बात है कि अपनी इस बात कहने के लिए वो तर्क देते हैं कि क्या करें वो परिस्थिती के कारण विवश हैं, लेकिन ये कदापि नहीं सोचते कि परिस्थिती बनाई तो किसने बनाई है। कभी भी उन्होने इन परिस्थितियों को सामान्य बनाने की कोशिश की। कोशिश लगातार उस भले व्यक्ति की तरफ से किया जाता रहा उसपर भी उलाहना ये कि ये तो केवल दिखावा है या उन्हें चिढाने के लिए ये बातें हो रही हैं। लेकिन अगर आप उस अपने भारत भूमि के उस संत और बिच्छू की कहानी को याद करें तो आप स्वत: कहेंगे कि नहीं भले व्यक्ति ने अपना कर्तव्य अपने आचरण के मुताबिक ही निभाया। लेकिन सच को भी झूठ बताने वाले कहाँ इन बातों को समझेंगे वो तो अपनी ही धुन में रहेंगे कि किसी तरह से कुछ ऐंठा जाए, आखिर बदले हुए रंगत के लोगों के लिए पैसा ही तो सब कुछ है। सही में इंडियानामा में मैं इस विषय पर बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन संकोच करता हूँ कि कहीं लोग ये ना समझ बैठे कि मैं अपनी भडास निकल रहा हूँ। ऐसा मेरा कदापि मकसद नहीं है। मैं तो केवल कुछ लोगों की बातों को आपके सामने रखने की चेष्टा कर रहा हूँ, शायद इससे किसी को लाभ मिले। देखे कब और कहाँ ये बातें काम करती हैं.....।
अँधेरे अकेले घर में
अँधेरी अकेली रात ।
तुम्हीं से लुक-छिप कर
आज न जाने कितने दिन बाद
तुम से मेरी मुलाक़ात ।
और इस अकेले सन्नाटे में
उठती है रह-रह कर
एक टीस-सी अकस्मात
कि कहने को तुम्हें इस
इतने घने अकेले में
मेरे पास कुछ भी नहीं है बात ।
बहुत दिनों बाद....स्वाभिमान की लडाई के मैदान में..

मैं काफी दिनों बाद आपके साथ हूँ, दरअसल खुद के स्वाभिमान की रक्षा के लिए धर्मयुद्ध में व्यस्त था। मेरे स्वाभिमान की लडाई का कुछ अंश आपके सामने रखूँगा और राय भी जानना चाहूँग। अगर आप घर लौटे और देखे कि सब कुछ बदला बदला हुआ है तो कुछ नया पना सा महसूस होता है। मेरे लिए मेरा काम का स्थान ही नयापन लिए हुए है, घर और मेरे पुराने शहर में मेरे लिए कुछ नहीं बदला है। बदला है तो लोगों का सोंच का नजरिए वो भी मेरे प्रति। जो भी हो विचारों की स्वतंत्रता तो सबको होनी ही चाहिए। मैं व्यवस्था के खिलाफ लडाई लडता हूँ और उसे जीत भी जाता हूँ। लेकिन अपने कहे जाने वाले लोगों के लगाए दाग को आज भी नहीं झटक पा रहा हूँ। क्योकि मेरा मानना है कि अगर सच्चाई मैं बता दूँ तो शायद मेरे उपर तोहमत लगाने वाले खुद शर्मसार हो जाए। मेरा कभी भी ऐसा विचार नहीं है कि किसी नुकसान पहुँचाउ या आरोप लगाउ, लेकिन क्या करु पत्रकार हूँ, हर काम में खोज बीन करने की आदत बन गई है। इसी खोजबीन ने कई सच्चाईयों को उजागर कर दी हैं। लोग के दोहरे चेहरे सामने आ गए हैं। लोगों की सच्चाई सामने आ गई है। अपने आप को स्वच्छ और धवल बताने वाले कीचड में कितने सने है वो सामने आ गया। मैंने तो मन बना बना लिया था कि इसे सामने ला कर लोगों के बेशर्म जुबान को बंद करुँगा। लेकिन मुझे उनके हालत पर तरस आ गया इसलिए तोहमत अपने उपर ही सह कर, मेरे उपर लगाए गए कई मनगढंत आरोपों को खुद अपने सामने सुनने के लिए अपने पुराने शहर भी गया। शहर में आने की सूचना भी दी लेकिन नतीजा फुस्स हो गया। लोग बात करने से दूर भागने लगे, शायद अपनी गलती से मुँह छुपाने का मन बनाया हो। आप भी कहेंगे कि मैं क्या कहने लगा हूँ...आखिर बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी......।
लोग कुछ भी कहें कि पैसा ही सबकुछ है, मैं नहीं मानता हूँ। पैसा से गुलाम खरीद सकते हैं,स्वाभिमान नहीं। आज इसी स्वाभिमान की लडाई मैं लड रहा हूँ। कुछ लोग जो आपकी जिन्दगी में बाद में आएंगे वो अगर धन पति होंगे तो यही समझेंगे कि अपनी धन की गरिमा से आपके स्वाभिमान सहित आत्मा को भी अपने वश में कर लेंगे। लेकिन जब हो नहीं सकेगा तो अपके उपर कोई भी आरोप लगाने से गुरेज नहीं करेंगे भले ही आरोप कितना ही शर्मनाक हो। जब लोग किसी भी कीमत पर अपने विचार लादना चाहते हैं तो शायद दूसरे को नीचा दिखाने के लिए उसपर हर तरह से वार करना नहीं चूकते। मेरे जीवन का लक्ष्य रहा है कि किसी से अहसान ना लो और हो सके तो लोगों की मदद कर दिया करे। इसे लक्ष्य के अनुरुप आचरण भी करता हूँ तो मेरे साथ कुछ समय से जुडे लोगों को लगता है कि मैं झक्खी(यही शब्द इस्तेमाल किया गया था) हूँ। ऐसे शब्द शायद ही किसी सभ्रांत घर के शब्द हों, लेकिन धनकुबेरों के यहाँ ऐसे शब्द आम चलन मे हैं। आपस में इस तरह की तेरी मेरी होती है कि सम्मान तो दूर भाषा से व्याभिचार होने का भी अहसास नहीं। हद तो तब हो जाती है जब अपने ही माता पिता को उपेक्षित सा जीवन बिताने पर मजबूर करने वाले लोग नीति ज्ञान देते है। आज कल चलन है कि अपना काम निकालने के लिए एकदम से मृदुभाषी बन जाइए और काम निकलते ही जिनके पैर छूते थे उन्हे आँखे दिखाने से भी परहेज ना करें। अगर सामने वाला स्वाभिमानी हो तो उसे आप कहें कि वो तो हाथी के दाँत की भांति है दिखाने के और साथ में खाने के और दांत रखता है। लेकिन लोग तो आज कल शर्म को शरबत बना कर पी रहे हैं। आरोप दूसरे पर लगाते हैं, और आरोप गलत होने पर कुछ नए आरोप लगाने की जुगत में रहते हैं। शायद ये बेशर्म जमाने का ही असर है। ईश्वर का शुक्र है कि मेरा साथ ऐसा नहीं है। मेरे उपर मेरे माता पिता के जरिए किया गया उपकार है कि इस तरह के आचरण से मैं बचा हूँ। शायद आप इन आचरणों के गलत मानें और इससे बचने की चेष्टा करें। लेकिन कुछ लोग इसे ही सही और उचित मानते हैं, और इसी में सम्मान समझते हैं। स्वाभिमान की रक्षा के लिए इतिहास के कई उदाहरण हमारे सामने हैं। कई लोग तो अपने खुद के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपनी पूरे परिवार से मोह भंग कर लिया था। आज शायद ही ऐसा कोई विरले कर पाए। मुझे आश्चर्य होता है कि रामचरित मानस के रचनाकर अपने परिवार से विमुख होकर कैसे सन्यास को निकल गए। मुझे तो भी कभी ऐसा लगता है कि भोगवादी संसार में जब लोगों का बेजा आक्षेप लगने लगता है और सच्चाई कुछ और सामने आने लगती है तो विरक्ति स्वाभाविक हो जाती है। शायद इतिहास पुरुषों के पीछे भी यही कारण रहा होगा। अभी हाल ही में मैने प्रेमचंद की लिखी एक कहानी कुछ कहानियाँ पढी जिसमें से कई कहानियों के पात्र अपने स्वाभिमान के रक्षा के लिए नाते संबंधियों को तक छोड देते हैं। ऐसी ही एक कहानी थी घरजमाई जिसमें हरीधन अपने स्वाभिमान की रक्षा में अधेड उम्र में सजग हुआ और बची हुई जिन्दगी सम्मान से गुजारा। सच्चाई ये है कि सम्मान रक्षा के लिए बेहद कष्ट उठाने होते हैं। लेकिन अगर सम्मान की रक्षा होती है तो सारे कष्ट केवल कुछ वक्त का फेर भर जान पडता है। भले ही स्वाभिमान की रक्षा गुलाम भारत में की गई हो या आज के आजाद भारत मे। अंग्रेजों के जरिए गुलाम बनाए जाने के दौर में गुलाम के दाग को हटाना ही स्वाभिमान रक्षा था। लेकिन आज के आजाद भारत के दौर में लोगों के जरिए संबंधों के जाल में फांस कर अपने गुरुर से गुलामी की जंजीर डालने वालों से मुक्ति साथ-साथ कई तरह के आरोपों के कलंक से छुटकारा ही स्वाभिमान की रक्षा बन गई है। आप भी कहेंगे कि कहीं ऐसा भी होता है कि कोई संबेधों के जरिए गुलाम बनता है। मैं तो कहता हूँ कि जरा गंभीरता से सोंचे तो हर पहलू आपको आइने में अक्स की तरफ साफ दिखेगा कि कौन किस तरह से गुलाम बनाता है। शायद इतिहास के वो दिन आपके जेहन में जरुर स्मरण हों जब एक देश से दूसरे देश से संबंध इसलिए बनाते थे कि संबंधों की प्रगाढता दिखा कर गुलाम बनाना आसान होगा। आज गुलाम बनाने का अंदाज कुछ तो मिलता जुलता है कुछ जमाने के साथ एकदम से आधुनिक हो गया है। मेरे विचार से कोशिश यही करें कि गुलामी की दासता ना स्वीकार करें कहीं आप अपने स्वाभिमान को ही ना खों दें, हर समय सचेत रहें, भले ही कोई आपका आत्मीय क्यों ना हो। चलें तो फिर से समेट ले अपने तरकस और तैयार हो जाइये समाज में अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए.....स्व अभिमान से बडा शायद अपना राष्ट्र हो सकता है जिसके लिए स्व अभिमान का त्याग करना हर किसी को गर्व होगा ना कि किसी के कदमों में बेंजा संसार के उलझनों के लिए।... अब तो सर उठा कर हम कहेंगे, और लोग अपनी निगाह से देँखें..
तहज़ीब के ख़िलाफ़ है जो लाये राह पर
अब शायरी वह है जो उभारे गुनाह पर
क्या पूछते हो मुझसे कि मैं खुश हूँ या मलूल
यह बात मुन्हसिर है तुम्हारी निगाह पर
Monday, November 21, 2011
देर लगी लेकिन निकल ही आया........,
शायद आप शीर्षक को देखकर कयास लगाते रहे लेकिन, हकीकत है कि आज मैं भूल गया वो सारी बातें जो मेरे साथ छल से किया गया था। मैं अब पूरे मानसिकतौर पर सर्मपित हूँ अपने कार्य के प्रति। लेकिन पिछले तीन सालों में जो मैंने झेला शायद ही कोई उसकी वेदना समझ पाएगा। खैर कोई बात नहीं आज से लगभग 40 साल पहले लिखी गई बातें मुझे सच जान पड रही हैं। वो बातें हैं.---
जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।इन्हें मैं बेहद नजदीक से देखता गया। तभी तो आज उबर सका अपनी उस नकारात्मक सोच से। मई महीने के बाद से अब तक गंगा में पता नहीं कितनी धाराओं ने अपनी मंजिल पा ली होगी। लेकिन मैं अपने पुराने विचारों को छे ही रहा था। मैं अपने उपर ब्रेक लगा चुका था। लेकिन अब नहीं जब प्रकृति भी बदलती है तो मैं क्य़ो भला एक ही विचार में बराबर रहूँ ,लिहाजा आज मैं अपने आर को बदल चुका हूँ,नई परिस्थिती के मुताबिक अपने आप को ढाल चुका हूँ।
चलो शुरुआत करता हूँ अपने पिछले काम से ही देश भर घूमता रहा तब जाकर खुद का सांत्वना मिली। अपने आप को तलाश पाया कि आखिर हम कहाँ हैं और किन हकीकतों से हमें रुबरु होना है। साथ दिया हमारे मित्रों ने बाहर निकाल उस अवसाद की कोठरी से जिसने मुझे रखा था। साथ में भ्रष्टाचार के खिलाफ सडे हुए अन्ना हजारे की मुहिम को भी नजदीक से देखने को मौका मिला। उससे भान हुआ कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी ऑफिस और बडे स्तरों पर नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर भी है। इसके खिलाफ उठ रहे हर आवाज़ को बलंद करना होगा तभी तो इसे मिटाने में कामयाबी मिल सकती है। मैने बेहद नजदीक से देखा कि आखिर लोग अन्ना हजारे को वली क्यों मानते हैं। मेरा खुद का मानना है कि अगर तर्क के आधार पर भी आप देखे तो एक अकेला आदमी ने खुद के लिए ना करके समाज के लिए बेहद काम किया है जो काबिले तारीफ है । जब मैं दूर सूदूर तक जाकर देखा कि आखिर प्रगति के पीथे और कौन कौन से कदम हो सकते हैं जो समाज सहित खुद मानस को भी आगे बढाए, मुझे तो यही समझ में आया कि अगर प्रयास सही दिशा में और अनवरत हो तो जैसे जल की शक्ति को बिजली में तब्दील करते हैं उसी तरह मानव शक्ति को प्रगति में तब्दील कर सकते हैं। साफ यही पंक्तियाँ हैं.....
इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ,
मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ,
जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ,
सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ,
कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए,
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ।
Sunday, June 19, 2011
सरकार की चुप्पी वो भी पत्रकारों के प्रति....

महाराष्ट्र सरकार पता नहीं क्यों चुप्पी साधे हुए है, सरेआम पत्रकार की हत्या होती है और कार्यवाही के नाम पर मजह लोगों से पूछताछ भर। लगभग दो सप्ताह गुजरने के बाद भी सरकार के तरफ से ठोस कार्यवाही सामने नहीं आ रही है। हर तरफ एक सन्नाटा ही पसरा हुआ है। इस सन्नाटे के पीछे भी अब कुछ ऐसी अवाज़ें उठनी लगी हैं जिन्हें जानकर लगता है कि आखिर आपसी गुटबाज़ी से लोग कब उपर उठेंगें। अपराध की रिपोर्टिंग करते थे जेडे, लेकिन कब अपराधियों के निशाने पर आ गए शायद उनको खुद भी पता नहीं था। समाज में हो रहे अपराध के बारें सरकार को बताना हम पत्रकारों का धर्म है,जिसके बदले में हम चाहते हैं सरकार इन अपराधियों पर नकेल कसे और आम शहरी को रहने का स्वस्थ सुन्दर माहौल दे। लेकिन यहाँ तो उल्टा ही हो रहा है, ना तो सरकार नकेल कसती है और ना ही आम शहरी अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहा है। आफत उन पत्रकारों पर मौत के रुप में गिरती है, सरकार इस पर व्यक्तिगत दुश्मनी का नाम देकर मामले को किसी कोने में दफ़न कर दे रही है। देर सबेर शायद जेडे के मामले में भी यही बात सुनने को मिले। लेकिन मैं अपने उन वरिष्ठ भाइयों से सवाल करता हूँ कि क्या उनकी चेतना कभी नहीं जगती कि आखिर सरकार के इस रवैये पर रोक लगाई जाए। सरकार की इस मंशा पर से सच्चाई का पर्दा उठाया जाए। ये सवाल केवल मेरा नहीं है, मेरे जैसे लाखों हजारों उन लोगों का है जो अब देख चुके हैं कि सरकार की साठगांठ किन लोगों से है। हर वो आम शहरी अब जानता है कि पिछले कई सालों में सत्ता में रहने वाले लोगों ने किन किन राहें से पैसे कमाए। जिसे उजागर करने में कितने ही जेडे जैसे लोग कुर्बान हो गए।
मुझे मुंबई आए हुए लगभग 15 साल तो हो ही गए लेकिन मैं सरकार कि इस तरह की निरंकुशता कभी नहीं देखी। ना तो अपराधियों को पकडती है और ना ही अपनी अक्षमता ही जाहिर करती है। जबकि मुंबई पुलिस की तुलना स्कॉटलैन्ड पुलिस से की जाती रही है। मुझे तो कहना नहीं चाहिए लेकिन लगता है कि मुंबई पुलिस को भी जंग लग गई है। उनके धमनियों में बहने वाला खून अब आम आदमी के बारे में नहीं सोंचता केवल राजनेताओं की चौकीदारी करने में ही उन्हे शायद गर्व महसूस होता है। यही लगभग दो साल पहले जब पाकिस्तानी आतंकी मुंबई पर हमला किए तो मुंबई पुलिस के जवानों ने अपनी लाश बिछा दी क्योकि उनके पास आतंकियों से लडने के साधन नहीं थे। तुकाराम ओम्बले के नाम से आप सभी परिचित होंगे एक साधारण से सिपाही ने कसाब की गोलियाँ खाकर भी निहत्थे ही उसी जकडे रहा, उस कसाब को हम आज मेहमान की तरह पाल रहे हैं।
खैर कसाब तो पाकिस्तान के जरिए आतंक फैलाने के मकसद से ही आया था, लेकिन क्या देश को खोखला करने वाले हमारे दुश्मन नही है। करोडों की अबादी वाले देश में क्या सरकार के इस निरंकुशता का कोई हल नहीं है। मैं पूछता हूँ कि, आम जनता कि लडाई हम लडते हैं तो आम जनता जेडे की हत्या पर क्यों चुप बैठी है। शायद हमें ही इस लडाई को आम जनता के बीच ले जाना होगा जिससे कोई और दूसरा पत्रकार इन दानवों की भेंट ना चढे। महज सांत्वना और श्रद्धांजली भर से काम नहीं चलेगा, सरकार से जवाब भी मांगना होगा.. मित्रो मेरी गुज़ारिश है कि हम अपने ही साथी के बलिदान को बर्बाद ना होने दें कलम की ताकत किसी तोप की ताकत से कम नहीं..... निराला जी कि कुछ पंक्तियाँ हैं जो सटीक बैठती हैं...
सह जाते हो
उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न,
हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न,
अन्तिम आशा के कानों में
स्पन्दित हम - सबके प्राणों में
अपने उर की तप्त व्यथाएँ,
क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँ
कह जाते हो
और जगत की ओर ताककर
Sunday, June 5, 2011
क्या यही लोकतंत्र है....

मैं कभी भी बाबा रामदेव का अंध भक्त नहीं रहा। लेकिन अगर तर्क के साथ पूरे वाकये को देखें तो बडा ही अजीब लगता है, कि क्या भारतीय सरकार एक साधारण से संत से डर गई है। कपिल सिब्बल के जरिए बाबा का करार नामा दिखाना तो कम से कम यही लगता है कि सरकार डर गई थी। जिसके बदले में पहले ही सोची समझी नीति के तहत रामदेव से सहमति पत्र लिखवाया गया । इस सहमती पत्र के बदौलत ही तो कांग्रेस सरकार ने रामदेव पर छीटा कसी की । अपनी छवि को धुमिल होता देख बाबा भी अपने रौद्र रुप को दिखाने में नहीं हिचके भले ही उन्हें खुद और उनके समर्थकों को लात घूसों का प्रहार झेलना पडा हो।
लेकिन सोचिए जरा कि आखिर रामदेव इस झमेले में कैसे पडे। बात दुरुस्त है कि कहावता है कि ताकत उसी के पास है जो या तो सत्ता में है या सत्ता के बेहद करीब। रामदेव भी ताकत चाहते थे शायद। लेकिन एक बात और कडवी सच्चाई है कि अगर ताकत चाहिए थी तो केवल योग ज्ञान से भी ताकत और पैसा कमा सकते थे। क्या जरुरत थी सरकार से उलझने की। कहीं ना कहीं तो जरुर भारते के प्रति दर्द है जो सालता रहा और इस रुप में सामने आया।
कई सवाल मेरे मन में उठते हैं आखिर कौन सी बात सरकार का खलने लगी जिससे बेसहारा और कमजोर महिलाओं पर लाठियों का प्रहार किया गया। युवा तो युवा बच्चों और बुजुर्गों को भी नहीं छोडा पुलिस ने।पुलिस और सरकार के दमन चक्र में सबको डाल कर पिस दिया गया, जैसे दिल्ली के रामलीला मैदान में जमा लोग इन्सान ना होकर जानवर से भी बदतर हैं। उनके साथ किए गए सलुक ऐसे कि लोकतंत्र भी शर्मशार होने लगे.... अभी बस इतना जल्द ही जल्द ही हमारी और आपकी पूरी बहस चालू होगी ।
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