Tuesday, July 15, 2008

दुखवा का से कहूँ......


अपनी इस परिस्थिती से कैसे रुबरु होउ कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हर बार अपने जीवन का होना बडा ही निरर्थक लगता है। पिछले दिनों से यही धारणा मुझे अपने घेरे में ले लिया है। इस अवसाद से निकलने का कोई रास्ता नहीं निकल रहा है। लग रहा है कि सब कुछ छूट गया बेहद पीछे और पीछे। हर संभव अपने आप को बटोटरने की कोशिश करता हूँ।लेकिन समुद्र के गर्त में समाते हुए सब डूबता लग रहा है। अब लिखने का साहस नहीं मिल रहा है। लिखूँगा फिर कभी जब यह असह्य पीडा......... विदा मित्रों.......।

Wednesday, July 9, 2008

चलो सजाओ दुकान आ गया राजनीति का मौसम



बाजार में हल्ला मचा कि गई अब कांग्रेस सरकार, वाम पंथियो ने अपना समर्थन वापस ले लिया। लगी सड़क पर सरकारी गाडियाँ तेज गति से दौडने, कोई नेता अपना गठजोड़ बैठा रहा है तो कोई अपनी फिराक में है कि इसबार तो समर्थन करने पर कुछ पारितोषिक के रुप में मंत्री पद मिल ही जाएगा। तो पिछले चुनाव में हारे राजनेता अपनी बारी के इन्तजार में हैं और चुनाव क्षेत्र में कूद पडे कि इसबार तो हरा कर के ही दम लेंगे और खोई हुई अपनी पगडी की लाज वापस लायेंगे। तो बाहुबली नेता अपने चमचों को इकट्ठा करने लेगे और चुनाव जीतने की जुगत भिडाने लगे। लेकिन किसी ने उस जनता कि सुध लेनी नहीं चाही जिसके दम पर अपनी राजनीति की दुकान चलाने वाले राजनेता इतरा रहें हैं। सबसे ज्यादा दुकान तो चल निकली है मिडिया के नाम के बडे रिटेल के माफिक सोच समझकर गणित बैठाने वालों की। मिडिया के हर एक खोमचे पर राजनेता नामक ग्राहक बैठा जनता को अपने पैतरे से अवगत करा रहा है। आँखे तरेर कर यह दिखा रहा है कि विरोधी पक्ष का समूल ही नष्ट कर डालेगा। लेकिन अन्दर अन्दर पकती खिचडी कुछ और ही दिखा रही है। विरोधियों के साथ ही मिलकर राजनीति की गाडी आगे बढाने का अवसर ढूँढ रहा है।किसी भी कीमत पर सरकार को बचाने का प्रयास कर रहा है। अपनी असफलता को भी नहीं जाहिर करना चाहता है। जनता के सामने यह तर्क कि हम जनता पर फिर एक बार चुनाव का बोझ नहीं डालना चाहते हैं। लेकिन मन कि इच्छा है कि कहीं कुर्सी ना चली जाए। सरकार से समर्थन वापस लेने का वामपंथियों के कई तर्क हैं जो कुछ हद तक सही लगते दिख रहे हैं।
लेकिन एक बात समझ से बिल्कुल ही परे है कि आखिर इतने साल साथ-साथ चलने के बाद कौन सी मजबूरी आ गयी जिससे सरकार से कदम से कदम मिलाने वाले अपने ही कदम पीछे लेने लगे। बात एक हो तो कहें मँहगाई सुरसा की तरह मुँह बाये जा रही है सरकारी सहायता तो दूर, कहा गया कि यह कुछ दिनों तक ऐसे ही बनी रहेगी। उपर से न्यूक्लियर समझौता भी भारी रुकावट पैदा कर रहा है सुचारु रुप से सरकार चलाने के लिए। खैर ये तो मुद्दे हैं जिन्हें सुनाकर मैं आपका कीमती वक्त बरबाद नहीं करना चाहूँगा। लेकिन दुकानदारी कि बातें जरुर सुनाउगा। पार्टी कार्यालयों में बडे जोर शोर से रंग रोगन होने लगे। पर्दे लगने लगे गद्दे बदले जाने लगे। अपने चुनाव क्षेत्र से आने वाले लोगों की जो राजनेता कभी सुध नहीं लेते था अब उनकी सेवा टहल में रात के बारह बजे भी दिखाई देने लगे। उनकी खातिरदारी में कोई कमी ना रह जाए इसलिए खानेपीने का प्रबंध चौबीसों घन्टे रहे इसलिए नये खानसामे को बुलाकर एक अलहदा रसोइ का ही प्रबंध किया गया है। इन सबों के अलावा अपनी उपयोगिता बनाए रखने के लिए गाहे-ब-गाहे नए और पुराने मुद्दों की सहायता ली जा रही है। विरोधी खेमे और सत्ता के खेमे दोनों में चक्कर लगाना जारी रखा गया है। अपनी पहुँच का इस्तेमाल करके मिडिया में भी वक्तव्य दिये जाने लगे जिससे अपने आप को खबरों में बराबर बना दिखाया जाए। अब अपनी राजनीति की दुकान सजाकर बैठे लोग बडे व्यापारी दिखने लगे जिससे सारी इनकी कही बातें सच प्रतीत होने लगी। बोली भी लगने लगी, सरकार बचाने के लिए मंत्री पद आपका इन्तजार कर रहा है स्वीकार करों...........।

Tuesday, July 8, 2008

मैं कब हम होगा…. ?


एक सवाल मेरे जेहन में बराबर कौंधता रहता है कि मैं कभी हम में बदलेगा या नहीं। अपनी अपनी परिस्थितियाँ हैं कि किस तरह से एक दूसरे के करीब लोग लाते हैं। अगर अपनी बात करूँ तो कभी भी मैं में नहीं जीता क्योकि यह एक ऐसी परिस्थिती है जो अगर हावी हो गया तो अहम को दिलो दिमाग पर छाप डालता है। खुद की परिस्थितियों पर अगर विचार करू तो सारी बातें मेरी समझ में भी आ जाती है कि मैं भी मैं की भाषा बोलता हूँ। लेकिन जब से नाम इंडियानामा जुडा है तो धीरे धीरे मैं हम में बदलते जा रहा है। ना कोई जात रहा ना कोई धर्म और ना ही कोई प्रांत-प्रदेश सब समान दिखने लगे। ये बदलाव अनयास नहीं हुआ लगे सालों साल इसके पीछे। हरबार अपनी पहचान को भूलाकर नई दिशा पर चल निकला एक दूसरे से लोगों को जोडने के लिए तो विचारों में भी बदलाव लाया और फिर हम कि राह पर निकल पड़ा। लेकिन घर में आज भी मैं मै ही हूँ कारण यही है कि जिसको जिस भाषा में समझाना चाहिए उसी भाषा में समझाता हूँ। मेरा यही अभी तक मानना है लेकिन हो सकता है कि इस विचार को त्यागना पडेगा ना कि मेरे लिए बल्कि हर किसी को। इस तर्क के पीछे एक छोटा सा वाकया आपको बताता हूँ , वो यूँ है कि अपनी घूमन्तू प्रवृति के चलते कई बार ऐसी जगहों पर निकल पड़ता हूँ कि कहना मुश्किल होता है कि कहाँ आ गया हूँ। हुआ ऐसा ही घूमते घूमते बहुत दूर निकल आया था। गाँव की पगडंडियाँ थी लेकिन चेहरे और भाषा बिल्कुल ही अन्जाने थे। हर कोई अपरिचित की निगाहों से देख रहा था।लेकिन अचानक मेरे दिमाग में ये बिजली कौंधी कि मैं कैसे इनको अपने से जोडूँ।क्योकि इन लोगों का शोषण काफी लोगों ने किया है अब बारी है इनको इनकी स्थिती का भान कराने का। इसलिए सबसे पहले वहाँ घूमते बच्चों के बीच शहर से लाई टॉफियों का अम्बार लगा दिया और बगल के खेत में चला गया हल जोतते किसान के साथ मैं भी शरीक हो गया। तब क्या था सबकी चुप्पी टूटी और मैं, मैं से हम में बदल गया।
यही बात अगर आप दुहराये तो हो सकता है कि आपके बीच का भी मैं कहीं खो जाये और हम में बदल जाये। आज के परिवेश में जितना जल्द यह बदलाव हो वह एक मध्यम वर्गीय के लिए अच्छा है। मसलन लगभग 2 करोड अबादी वाले शहर में रहने को घर का सपना देखने वालों लाखो लोग आज भी अपना दम फूटपाथ पर तोड़ देते हैं। आखिर घर नसीब होता है तो, उसीको जो जितना ही जल्द मैं को छोड़कर हम को अपना लेता है। ठेठ में बोलूँ तो जिसने एक दूसरे का हाथ पकडा उसने अपने सर के उपर छत पाया। मतलब साफ सहकारिता ने ही मध्यम वर्ग को सहारा दिया। सैकड़ो कॉपरेटिव सोसाइटी ने इस महनगर में लोगों को शरण दी। जिसके बदौलत लोगों के सर पर छत है। ये इतिहास गवाह है चाहे वो प्राकृतिक प्रकोप हो या वो मानव के जरिये बनाई संकट उससे निज़ात मिला है समवेत स्वर से उठाये विरोध से ही। आर्थिक प्रगति में नई क्रांति लाकर के दूध की नदी बहा दी आनंन्द गाँव ने। अमूल नाम से नई पहचान ही दे दी। महाराष्ट्र के हर इलाके में चीनी मिलें इसका जीता जागता उदाहरण हैं। ये किसी एक ने नहीं किया है सैकड़ो हाथों ने मिलकर किया है। तब किसी एक के भडकाने पर क्यों एक दूसरे के हम दुश्मन बन जाते हैं यह बडी गंभीरता से सोचने वाली बात है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी के भडकाने पर मैं से अलग हट कर हरकोई हम के रुप में आगे बढे और डटकर उसका मुकाबला करे और मैं के रुप मे खडा भडकाने वाले दानव का नाश कर डाले..... जरा गंभीरता से सोचिए......।

Monday, July 7, 2008

मँहगाई की मार गरीब की हार


हाल फिलहाल की आर्थिक उथल पुथल ने आम जनता की परिस्थितियों को ऐसी जटिल कर दी है कि लगता ही नहीं कि वो कभी भरपेट खाना भी खाते थे। शहर में निकलो तो हर तरफ एक ही चर्चा कि मँहगाई ने कमर तोड़ कर रख दी है। लोग खाने के लिए तरस रहे हैं, अब अच्छे पकवान तो केवल सपनों में ही आने लगे हैं। हर किसी के जुबान पर सरकार के खोखले वादों की चर्चा रहती है, कि कब सरकार अपने इन झूठे वादों से बाज आयेगी। लेकिन ऐसा होता नहीं है । हमारे जैसे कई लोग सरकार को दोषी ठहराने से बाज़ नहीं आते,या एक अर्थ में आप ये भी कह सकते हैं कि सरकार को उसकी खामियों को दिखा डालते है। सरकार केवल बडे बडे वादे करती है लेकिन कभी भी देश के 60 फिसदी लोगों का ख्याल नहीं रखती है।लगभग 1.5 अरब अबादी वाले देश में गरीबी रेखा से नीचे जीनेवालों की संख्या भी कम नहीं है। अपने अपने साध को साधनेवालों की भी कमी नहीं है हर कोई अपनी ही धुन में रहता है कि कब कोई इस परिस्थिती में पीस जाये और समय की ताक में रहने वाला लाभ उठा जाए, कहा नहीं जा सकता है।सरकार है कि उसे कुर्सी बचाने से ही फुरसत नहीं है। हम और आप मँहगाई मँहगाई चिल्लाते रहे लेकिन सरकार ने इस चिल्लाने पर भी पाबंदी ये कह कर लगा दिया कि ये मँहगाई केवल हमारे ही देश में नहीं है बल्कि सारे देशों मे ये समस्या है जिससे सारा विश्व जूझ रहा है। और तो और ये भी कह गयी कि बढती मँहगाई कुछ दिनों तक और बरकरार रह सकती है। अब भला इसपर कोई सरकार को घेरे तो कैसे। हम और आप केवल अपनी किस्मत को रो सकते हैं कि हमने चुना तो किसे। अगर खास किसी प्रदेश की बात करें तो कोई अपवाद नहीं है हर जगह वही हालत हैं। जनता के रहनुमा अपनी तिजोरी भरने में लगे रहते हैं, अभी एक समस्या निपटी नहीं थी कि दूसरी ने आ घेरा। जहाँ मँहगाई से निपटने के तरीके ढूँढ ही रहे थे कि रही सही कसर बाढ की विभीषीका ने निकाल दी। अब दौर चला बाढ से निपटने की तैयारी होने लगी। सरकारें अपने बजट बनाने लगी कि कैसे इसका फायदा अपने खुद के घर भरने में उठाया जाए। महानगर सहित गाँव देहात के इलाकों में डिजास्टर मनैजमेंन्ट के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया गया। लेकिन जब सही वक्त बचाव के लिए आता है तो तो आसपास कोई नजर नहीं आता है लोग डूबते उतराते हैं लेकिन कोई हाथ आगे नहीं आता है, फिर शायद यही हो कि कोई आगे ना आये और लोग फिर से अपने पुराने परिस्थियों से जूझते रहें।
लेकिन शायद इस बार सरकारी तौर पर खूब मगरमच्छी आँसूओं का सैलाब दिखाई दे, क्योकि चुनाव जो नजदीक है। ताज को हथियाने के होड़ में हर कुछ करने को आतुर ये लोग ये नहीं भूलेंगे कि जनता सब जानती है। लेकिन मेरा मानना है कि जनता की यादाश्त बेहद कमजोर है हरबार अपने साथ किये गये छलावा को भूल जाती है, और जो सामने आता है उसी में अपने दुःखों को दूर करने का सामर्थ्य देखने लगती है। लेकिन हाथ में फिर मिलता है छलावा। जनता कि हालत उस बच्चे जैसी है जो रेत का घरौंदा समुद्र के किनारे बनता है और समुद्र की लहरें उस घरौंदे को मिटा देती है, बालक उसे फिर से बनाने कि लिए जूझता रहता है। लेकिन ये सरकार ऐसा नही करती घरौदा तो तोडती ही है सपने भी तोड़ डालती है सो जनमानष समेट लो अपने बल को कर डालो उपयोग अपने हक का........।

Monday, June 30, 2008

भारतीयता भूलते भारतीय...


हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे इंडियानामा में इस विषय पर भी लिखना पड़ सकता है कि भारत में ही भारतीयता से कोसो दूर जा चुके हैं धरती के लाल। लाख कोशिशों के बाद ना तो वो दर्जा मिल रहा है ना ही वो आधार जो कि एक सम्मान का जगह भी दिला सके। हाताश मन अपने आप में ही इन बातों का अर्थ ही ढूँढने लगता है कि क्या होगा। आखिर क्यों ये बातें हो रही हैं ? कहीं प्रयास की दिशा तो सही नहीं है, या मेरे प्रयास को लोग गलत समझ रहें हैं। हर किसी को यही समझाने की कोशिश करता हूँ कि पहले आप भारतीय हैं बाद में आप किसी प्रांत और कस्बे से जुडे हैं। आपकी पहचान भारतीय होने से है ना कि किसी प्रांत विशेष की बातें सबसे पहले आती है।
अब आखिर ये बातें उठती हैं तो इसके पीछे कारण क्या है कुछ बातें धुँधली सी नजर आने लगती है कि ये और कुछ नहीं केवल और केवल राजनीतिक सोंच है जिसे एक दूसरे पर हावी करने की मंशा होती है। ये हालात भले ही क्यों ना एक जगह की हो लेकिन यह बेहद आम बात है कि अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए लोग बराबर एक दूसरे के छाती पर पैर रखते हैं जिससे तकलीफ उन्हें कम उनको देखनेवालों को ज्यादा हो। आखिर आप कह सकते हैं कि मैं इन बातों को आपके सामने क्यों ला रहा हूँ। तो जाहिर है कि मेरा ध्येय है कि बहुजन हिताए और बहुजन सुखाए। लेकिन इस सारे गतिरोध में कौन हितकर्ता है और कौन दोषी ये तो कहना बेहद ही मुश्किल होगा कि और इसका मंजिल क्या और भी कठिन हैं। बचपन का एक द्वन्द है जिसे मैं आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ, हरबार एक चाहत होती है कि मैं अकेला क्यूँ रहूँ क्यों ना कोई साथी ढूँढू और उसके साथ अपने विचार की एक एक बारीकियों को खोल दूँ। लेकिन सामनेवाले का विचार देख कर सारे सपने चूर-चूर होते नजर आते हैं। हर बार खुद को मैं दोषी नहीं मान सकता कि आखिर क्यों ऐसा हो रहा है। जब साथ साथ दिन बिताए लोग ही खुद को किनारा करने लगे तो अपने आप को उपेक्षित सा समझना वाजिब है। आखिर क्यों सवाल बड़ा है, ये मेरे समझ से परे है। मन छोटा हो जाता है कि कहाँ तो सोचा था कि हर किसी के दिल से दिल को जोड़ दूँ लेकिन जब खुद को ही किनारा किया हुआ महसूस करता हूँ तो सारे काम काज ठप्प हो जाते हैं।
हमारे पुरखे बहुत पहले ही कह चुके हैं कि दिल से दिल को मिलाओ ना कि उपर ही उपर और अन्तरात्मा को भूल जाओ। पैसा कमाने से ज्यादा लोग कमाने पर तवज्जो दो लेकिन यहाँ तो हर कोई अपनी ही धुन में खो जाता है कि किसको फुरसत है आदमी पर ध्यान दे। बस चले तो उसे रौंद कर आगे बढ जाये बिसात ही कहाँ कि कोई चूँ भी कर दे।हम अपनी कमजोरी समझते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि सामनेवाला हमारी स्थिती पर ध्यान नहीं देता। हमेशा वो नजर गडाये ही रहते है अपनी तो स्थिती यही है कि कुछ ना होते हुए भी सब कुछ मान लेना पड़ता है कि सरासर मेरी ही गलती है। अब चुप बैठना उचित नहीं है, जितना जल्द हो सके लोगों को जगाना होगा कहीं देर ना हो जाये और आने वाली पीढी बहुजन हिताए के बदले निज़ स्वार्थ को ही सर्वोपरी माने.....मानव से मानव को जोडो....

Monday, June 9, 2008

क्या कोई पितृ घातक भी हो सकता है.......?


ऐसा हम आये दिन ही सुनते हैं, ये कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल उठता है उस बेटे के बारे में जो अपना जीवन ही परिवार और माता पिता के लिए छोड दिया वो कभी अपने आदरणीय पिता का घातक हो सकता है क्या ? इसका जवाब हमें नहीं मिला। लेकिन अगर गंभीरता से इसपर विचार करें तो सारी हकीकत समझ में आ जायेगी। पहले एक वाकया आपको बताता हूँ। बात कोई बहुत ही ज्यादा पुरानी नहीं है, यही कोई दो चार साल पहले की है। एक जानकार थे नाम था ब्रह्मदत्त राय अपने तीन पुत्रों में सबसे ज्यादा स्नेह था अपने दूसरे बेटे से।लेकिन एक-एक कर जब बेटे उनसे अलग होने लगे तो वो अपने आप को मरा हुआ समझने लगे। किसी को उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन जब दूसरा बेटा अलग होने लगा तो उन्होंने आग्रह किया कि बेटा छोड़कर जाने से पहले मेरा पिन्ड दान करके जाओ पता नहीं राम ना करे अगर कहीं लौट के ना आ सके तो कमसे कम मेरा, तुम पिन्ड दान तो कर ही चुके रहोगे । अब हम अगर बात करें पितृ घातक की तो लोगों ने ब्रह्मदत्त जी के दूसरे बेटे को ही माना क्योकि उसी में उनका स्नेह बसा था और उसी के जाने के बाद उन्होने प्राण त्याग दिये। ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था और यह सब कुछ अचानक सा हो गया। ज्यादा स्नेह दूसरे बेटे से होने के चलते सभी उसी को अपने पिता का प्राणघातक मानने लगे थे। सबों के जाने के बाद ब्रह्मदत्त जी पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन दूसरे बेटे के जाने के बाद तो सारी कायनात ही बदल गयी।
इस घटना ने तो खासकर मुझे तो मेरी अन्तरात्मा तक को झकझोर दिया। लेकिन बातों की गहरायी में गया तो मैं दोष किसको दूँ यह तो समझ से परे हो गया। दोनों ही एक दूसरे पर अपने-अपने प्राण न्योक्षावर करने को तैयार थे, लेकिन उनको घातक की संज्ञा देना मेरे दिमाग पर मनो बोझ सा लग रहा है। बात की गहराई में गया तो समाज में मौजूद घूटन सामने आ गया। सेवानिवृत होने के बाद ब्रह्मदत्त जी की जिन्दगी बिल्कुल ही कठिन हो गयी थी। पत्नी का देहांत होने से पहले ही टूट चुके थे। अब सामाजिक धारणाएँ उनके जीवन को और भी कष्ट दायक बना दी थीं। हालात यहाँ तक आ पहुँचे थे कि उन्होने कई बार घर की परेशानियों से तंग आकर के आत्म हत्या करने का भी प्रयास किया, लेकिन दूसरे बेटे के प्रयास ने उनको सारी कठिनाइयों से बाहर निकाला, तब से उससे और भी ज्यादा स्नेह बन गया। बेटे का बाहर निकलने का भी एक कारण बना घरेलू कलह, जिससे बहुत पहले अपने प्राणों को त्याग देने वाले व्यक्ति को इससे कोई मोह रहा ही नहीं और फिर इस दुनिया को छोड़ चला। ये सारी बातों मेरी आँखो के सामने चलचित्र की भाँति घूमती रहीं है जिससे मैं खुद को कभी भी व्यवस्थितसा नहीं महसूस कर पा रहा हूँ। हर बार ब्रह्मदत्त जी के दूसरे बेटे के बारे में सोंचता हूँ तो उसके प्रति हो रहे अन्याय को अपने उपर ही मानता हूँ। लेकिन मैं उस व्यक्ति को पितृघातक तो कतई ही नहीं मानता हूँ। क्या समाज अपना सोच नहीं बदल सकता ? जो मातृ और पितृ देवो भवो मानता था वो घातक कैसे गो सकता है , क्या पूरा परिवार जिम्मेवार नहीं है........?

जो देखा नहीं वो भी अपना लगे….


क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि जब किसी दूरदराज़ में बैठे व्यक्ति से बात करते हैं, तो लगता है कि उससे पहले भी मिल चुके हैं या यूँ कहें कि वर्षों से उसे जानते हैं। मेरे साथ तो यह हमेशा ही होता है। मैं शहर दर शहर तो शुरुआती दौर से ही भटकता से रहा हूँ। इसी घुम्मन्तु प्रवृति के चलते कई बार नये नये लोंगों से मिलता रहता हूँ। कई बार फोन पर भी बातें करता रहता हूँ। हर बार एक नया ही दोस्त बना लेता हूँ। अनेक दफ़ा तो यही लगता है कि जिस व्यक्ति से मैं बाते कर रहा हूँ उससे तो वर्षों पहले मिल चुका हूँ और वो तो जैसे मेरे बचपन का ही दोस्त है। मैं पहले ये गौर नहीं कर पाता था लेकिन साल 2007 से इन बातों पर गौर किया तो पता चला कि हू-ब-हू ये बाते सोलहो आने सच हैं। वाकया यूँ सामने आया कि काम के सिलसले में मेरे हेड ऑफिस से मिला ऑडर ने ऑडर देनेवाले के आवाज़ में ऐसा अधिकार जता दिया कि, मैं तो उसे वर्षों से जानता हूँ। उस आवाज़ में पता नहीं क्या ऐसी बात लगी कि मैं तो समझ गया कि भाई दसकों से बिछड़ा यही मेरा वो दोस्त है, जो कि बचपन में बनारस से तबादला होने की वजह से बिछड गया था। बार बार उससे बात करने का मन करने लगा। लेकिन नया कार्य क्षेत्र होने के वजह से ये संभव नहीं हो सका। खैर काम के आपा धापी में मैं वो सारी बातें भूल गया। रह गया याद तो केवल और केवल वह आदेश। आगे का किस्सा सुनाऊँगा फिर कभी क्यों कि उसी ने जीवन में एक अच्छे दोस्त की कमी को पूरा किया है। उसने हम से कुछ माँगा नहीं है बस दिया ही दिया है। और मैं अभागा उसे आज तक कुछ भी नहीं दे पाया हूँ।
खैर बात ये है कि जिसे आप देख भी नहीं पाते हैं वो भी आपको अपना लगने लगे तो कैसा लगता है। मेरे दिमाग से वो एक कडी होती है एक दूसरे से जोडने की। मस्तिसक के लाख कोशिकाओं में हलचल होने लगती है, तरंगे अपना काम और ही तेजी से करने लगती हैं। शायद ये केवल मेरा मानना हो लेकिन कल्पना किजिए कि जिसे आपने देखा तक नहीं वो अगर आप कोई काम बिगाड़ देता है तो आप उससे गुस्से के मारे आपे से बाहर हुए जाते हैं अगर वही व्यक्ति आपसे माफी माँग लेता है तो आपका सारा गुस्सा काफूर होकर के गायब हो जाता है। लेकिन कई बार आपकी इस भावना का गलत इस्तेमाल भी होता है। हाल ही में एक टेलीफोन कम्पनी ने इसी भावना को विज्ञापन के रुप में इस्तेमाल किया है। कोई महालिंगम साहब हैं जो इस भावना को रख कर एक सर्विस देने वाली कम्पनी में फोन करते हैं जहाँ लोग आवाज़ बदल कर उनसे बातें करते हैं बदले में फोन को सुननेवाले लोग टाकटाइम पाते हैं। ये बात तो विज्ञापन की है लेकिन अगर इसके सही मायनों में लिया जाए तो आज भी लोग टेलीफोन पर यही कहते मिल सकते हैं....देखा भले ही ना हो लेकिन तुम तो लगे प्यारा ।