Wednesday, December 31, 2008

विदा साल २००८....,


मित्रों काफी लम्बे अरसे के बाद आप लोगों से एक बार फिर मुखातिब हूँ, समय नहीं दे पाने के कारण आप से माफी माँगता हूँ। पिछले दिनों काफी कुछ घटा जिसपर लिखने का मन तड़प उठा लेकिन लिख नहीं सका ये मेरी गलती है,क्षमा करेंगे। साल 2008 अब अपने अंतिम संध्या के कागार पर है, साल 2009 का आगाज़ भी। खैर साल 2008 के अन्त में जो कडुवे अनुभव हुए अम्मीद है कि अगले साल वैसे अनुभव नहीं होंगे। इसी उम्मबद में मैं भी आपलोगों से इतने दिनों अब दूर नहीं रहूँगा। आखिर आप ही तो हमारी ताकत हैं जो इस लेखनी में भर देते हैं कि मैं बेबाक कुछ भी कह देता हूँ।

Wednesday, September 10, 2008

अब तो बस करो.....


साल 2007 से लेकर अब 2008 का सितम्बर माह आ गया है लेकिन, आपसी लडाई है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। लोग हैं कि एक दूसरे को मरने मारने से पीछे नहीं हट रहें हैं। हर बार केवल एक ही मुद्दा कि महाराष्ट्र में हो तो केवल और केवल मराठी ही बोलनी होगी। क्या ये देश का अभिन्न अंग नहीं है, मानता हूँ कि लोग कहेंगे कि जिस जगह प्रांत में रहते हो तो वहाँ का सम्मान तो करों। तो इसमें लोगों को हर्ज क्यों हो रही है। हर बार ये क्या कहना जरुरी होता है कि बाहर से आये लोग यहाँ का सम्मान नहीं करते। मेरे समझ से ये केवल और केवल मुद्दा राजनीतिक बनते जा रहा है। अपनी राजनैतिक रोटीयाँ सेकने के लिए लोग एक दूसरे के खिलाफत सहित मरने मारने पर उतारु हो रहे हैं। पिछले दिनों या यों कहें हर बार जब बंद और विरोध होते हैं तो ये सबसे पहले सरकारी सम्पतियों का निशाना बनाते हैं और उसको तबाह बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। तब कहाँ चली जाती है प्रदेश प्रेम कहाँ रह जाते हैं सम्मान करने के वादे। मैं खुद महाराष्ट्र का नहीं हूँ लेकिन मुझे गर्व है कि मैं देश के उस हिस्से में रहता हूँ जहाँ आजा़दी के बाद ढोरों प्रगति हुई है। इस प्रगति में केवल और केवल इसी प्रदेश के लोगों का हाथ नही है। सबों का सम्मिलित प्रयास है। यहाँ के हिमायती कह सकते हैं कि आप अपने प्रदेश वापस चले जाओं मैं चला जाउगा बेहिचक नहीं रुकूँगा लेकिन एक जवाब जरुर दे दें कि आखिर जो हिमायती है वो बता दें कि आजा़दी में उनका क्या योगदान रहा है। हम तो यह कह रहे हैं कि भले ही प्रयास किया या ना किया अपने प्रदेश के ।उन पहलुओं को भी हमने उन लोगों को बताया जो इस बार में जानकारी ही नहीं रखते थे। लेकिन आप में से कुछ ही लोग हैं जो अपनी संस्कृति के हर पहलू को बाहर से आये लोगों को अवगत कराते हैं।
जब आप अपनी संस्कृति में उनलोगों को समेटेगों नहीं तो वो हरबार अपने आप को उपेक्षित सा समझेंगे। जिससे मन में द्वेष फैलना वाजिब है। ऐसा नहीं है कि यही एक तरीका है ,सबसे इन राजनीति के रोटी सेकनेवालों पर पाबंदी लगाया जाए जिससे अपने आप ये खुद के खोल में ही दुबके रहें। जिससे उन्हें अपने मुँह की खानी पडे। ये शुरुआत से ही लक्षित है कि जिस काम को दबाव के साथ आप करवाना चाहते हैं, वो कभी भी नहीं होता है। आपस में ही मतभेद होने लगते हैं जिससे एक दूसरे पर भड़कना स्वाभाविक है लोग आपस में ही गुत्थम-गुत्था करते रहते हैं। हर बार एक मन में ग्लानि लगती है कि क्या यही वो कल्पनाएँ थी हमारे अपने पुरोधाओं के, ये सारी स्थिती को देखकर शर्म आती है। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि फिर से हम आपसी द्वेष के दौर में जी रहे हैं जहाँ केवल और केवल आपसी रंजिश ही हावी है ना कि आपस में कोई सदभावना है।
मैंने अपने मन का उद्गार आपको बताने की कोशिश की है हो सकता है कि आप इससे सहमत ना हो लेकिन ये बात जरूर है कि आप जब दूसरे को खुले दिल से स्वीकार नहीं करेंगे तो दूसरा आपको दिलखोल के कैसे स्वीकार करेगा। हमने तो कभी दिल के दरवाजे को बन्द नहीं रखा लेकिन ये बाते इतने झकझोर रहीं हैं कि ये क्या हो रहा है... अब भी ये बन्द तो करो राजनेताओं अपने लाभ के लिए हजारों लोखो लोगों को जलते हुए आग में झोकने के बाद भी दिल नहीं ठंढा नहीं हुआ... मीडिया भी तो बाज आए इनको लाभ पहुँचाने से.....।

Tuesday, September 9, 2008

हर बार कि तरह एक बार फिर बेबस......,


साल दर साल लोग भले ही प्रगति करते जाए लेकिन हर बार कि तरह प्रकृति के आगे वेबस हो ही जाते हैं। बचपन से सुनते आ रहें हैं कि मधेस इलाके की शोक है कोसी। कुवांरी नदी कही जानेवाली कोसी के रौद्र रुप को देखकर भय लगना स्वाभाविक लग रहा है। हरबार की भांति अब स्थिती नियंत्रण से बाहर निकलती जान पडती है। हलाकि सरकार के हिसाब से सलाना इससे निबटने के लिए लाखो रुपये भी सरकार खर्च करने से गुरेज नहीं करती है, लेकिन आज के हालात में सब बेमानी नज़र आते हैं। हम उन्हें पिछडा कहे या भ्रष्टाचार में गले तक डूबे हैं ये कहे कुछ स्पष्ट नहीं है। लेकिन हाँ इतना जरुर कह सकते हैं कि वर्तमान बिहार सरकार के नियत में ही खोट है, जिससे मदद के हाथ ना तो बढ रहें हैं और ना ही सही मायनों पर मदद ही मिल पा रही है। लोग कि स्थिती देख कर ना कि दया भाव उमड़ता है ब्लकि क्षोभ होता है कि यही सरकार है जो खुद को जनता का हम दर्द कहती है। लेकिन सतहीतौर पर काम करने में वो बेहद ही नाकारा साबित होते हैं। अपने ही लोंगों के सामने ऐसी बातों को सामने लाते हैं कि यह कहना बेहद मुश्किल हो जाता है कि ये क्या करना चाहते हैं सचमुच ये मदद करना चाहते हैं या मदद के नाम पर कोइ ढोंग। हकीकत में ये मदद से ये कोसो दूर हैं केवल और केवल बस छलावा ही करते रहते हैं।
ये कोई मामूली बात नहीं है,कि लगभग 30 लाख लोग और 200 किलोमीटर तक बाढ की विनाश लीला फैली पडी है। हरबार ये एक ना एक नया बहाना बडी आसानी बना डालते हैं। इस बार का बहाना है कि कोशी के बाँध में दरार आया नेपाल सरकार के अनदेखी के कारण से। मतलब साफ है कि अपनी करतूत को छुपाने के लिए ये लोग नेपाल सरकार के मत्थे सार दोष मढना चाहते हैं। इसबार फिर से अपने आप को पाक साफ साबित करने के होड़ में लगे हैं ये माहानुभाव। वैसे तो होना ये चाहिए कि इस मुसीबत की घडी में ये लोग एक दूसरे का हाथ बटाएँ लेकिन ये एक दूसरे को ही नीचा दिखने के फिराक में हैं। इसी बेबसी के दौरान मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिला जो खुद ही इस चक्की में पिस चुका था। अपने परिवार के अधिकांश लोगों को खो चुका वह व्यक्ति कभी एक दरवाजे पर दस्तक लगाता तो कभी दूसरे दरवाजे पर अपने अरदास लेकर के जाता। कहीं किसी अधिकारी का दिल पसीजे और कोई कार्यवाही हो कि जिन्दा ना हो सके तो कम से कम अपने रिश्तेदारों की लाशों को भी तो खोज निकाले जिससे उनके दाह संस्कार किया जा सके। हमने तो यह भली भांति देखा कि वो अफसर इन लाचार और बेबस लोंगों की बातों को सुनना तो दूर बात करने को तैयार नहीं। जब यह रवैया बरदाश्त नहीं हुआ तो कुछ कानूनी और ठोस कदम उठाने पडे जिससे उनकी सुनवाई हो सकी। हालात तब और सोचनीय हो जाते हैं जब इन लोगो को मदद करने के लिए तैयार दल बार बार नि:शुल्क अपनी सहायता के लिए तत्पर रहता है और ये कहते हैं कि इसके लिए कितने पैसे लेंगे। मदद के लिए तैयार लोग भी कभी ये सपने में नहीं सोच पाते हैं कि कोसी की इस रूद्र रुप से निपटने के लिए ऐसा भी होता है क्या? कुछ खबर ऐसी भी आयी कि मृतकों के शरीर को तलाश करने के लिए अधिकारियों ने उनके घरवालों से पैसे माँगे जो देने में समर्थ हुआ वो तो अपने घरवालों का दाह संस्कार कर पाया जो नहीं समर्थ रहा वो आज भी अपने लोगों के अंतिम संस्कार के लिए विभाग-विभाग का चक्कर लगा रहा है। ऐसा नहीं है कि लोगों ने मदद नहीं किया सबों ने खूब मदद किया। आप को शायद जानकर ये आश्चर्य हुआ होगा कि जहाँ इस प्रदेश के लोगों को नफरत की निगाह से देखा जाता है उन लोगों ने भी मदद किया भले ही वहाँ रहनेवाले लोग इसी प्रदेश के हैं। लेकिन एक बात भले ही मैं दबी जुबान से कहूँ लेकिन कहूँगा जरुर कि मदद के लिए सारे प्रदेश के लोग एक जुट होकर के नहीं आये,ये बात अगर किसी और प्रदेश में होती तो सभी बढ चढ करके आते।.. जरा आप भी अपने दिल से सोचिए क्या वो देश का एक हिस्सा नहीं है...क्या उनलोगों को मदद नहीं चाहिए ..रोडे अटकानेवालों को सबक नही सिखाना चाहिए...अफसर क्या जाने लोगों की आप बीती...

Friday, September 5, 2008

आज लिखने का मन करता है.......


कुछ दिनों पहले मैंने सोच ही लिया था कि अब फिर कभी इंडियानामा में कुछ भी नहीं लिखूँगा। लेकिन आस पास इतना कुछ घट चुका कि अब अगर मैं रुकता हूँ तो अपने इंडियानामा के नाम को सार्थक नहीं कर पा रहा हूँ। गुजरात से लेकर के कश्मीर तक जल रहा है। गुजरात में सैकड़ो किस तरह से अनाथ हुए ये सभी जानते हैं। हम और आप भले ही इन बातों को भूल जाएँ लेकिन जिन पे ये बीती है उसको लोग कैसे भूल सकते हैं। आतताइयों की रुह भी नहीं काँपती इन नीरीह लोगों के साथ ऐसी हरकते करते हुए। हालात तो ये तक हो गये कि लोगों के हस्पतालों में ले जाती एम्बेलून्सों पर भी बम का निशाना लगाया। कुछ उत्साही यगये लोगों को बचाने तो वो भी किसी आतंकी के शिकार बन गये। ये तो बातें उस प्रदेश की है जहाँ हर कोई अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहा था जो भी आता वहाँ को रोजगार और शासन की व्यवस्था की प्रशंसा किये बगैर नहीं जाता लेकिन अचानक से हुए इस हादसे ने वहाँ से लोगों के पलायन करने पर मजबूर कर दिया।
हम यों कह सकते हैं कि साल की शुरुआत ही कुछ ऐसी शर्मनाक रही जिसे याद करने पर शुद को भी शर्म आती है। आरक्षण का भूत एक बार फिर जगा और लोगों को बांटता गया। हर किसी के हाथ में कलम कम हथियार ज्यादा दिखने लगो। गुजरों की करतूत ने सरकार सहित देश को लगभग एक हजार करोड़ का नुकसान पहुँचाया। ऐसा नहीं कि आरक्षण मिल जाने से रातों रात उनकी तरक्की हो गयी। वहीं वो भूल गये कि हजार करोड का नुकसान पहुँचाने के बाद उनकी वसूली सरकार उन्हीं से करेगी,भले ही उसका रुप कोई और हो। अभी वो आग बुझी ही नहीं थी कि अपने नेताओं की संसद की करतूत ने हमें कहीं का नहीं छोडा। क्या सरकार को बचाने के लिए कोई ऐसा भपी कर सकता है ? जानवरों की मंडी की तरह बोलिया लगने लगी। बेशर्मी की हद पार करता तब दिखी जब तथा कथित नेता ने ये कहना शुरु किया कि लोग मेरे यहाँ खुद कहने आये थे कि देखिये मैं बिकने को तैयार हूँ आप खरीदेगें क्या। जैसे तैसे यह मामला धीमा पडा कि अहमदाबाद में आतंकियों की करतूत एक और जख्म दे गया। गुजरात के जख्मों पर अभी मरहम लगे नहीं थे कि कश्मीर की हरकत ने और शर्म से अपना सर झुका दिया। एक बार दान में दे जाने के बाद फिर से जमीन लेने की हरकत ने अपने ही इतिहास को झुठला दिया। हमारी बातों को कोई अन्यथा मतलब आप लोग ना निकालें। मैं केवल इस खून खराबे से अपने लोंगों को बचाना चाहता हूँ, ना कि प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहा हूँ। हर बार जाति और धर्म के नाम पर लोगों को बाँटने का काम किया जाता रहा है। हद तो तब होगयी कि जब राजनितिक पार्टियों ने चक्का जाम की घोषणा कर दी। इस चक्का जाम ने कितनों की जान ली ये गिनना तो मुश्किल है। हर जाम ने सैकडो को संकटमें डाल दिया। बेवजह लोगों के कारोबार में नुकसान सहित अनेकों परेशानियों से रुबरु होना पडा। लम्बे अन्तराल से मेरे मन में ये विचार कौंध रहे थे जिससे मजबूर होकर के मैंने फिर से अपने बातों का आपके सामने रखने का फैसला किया है। अब सवाल उठता है कि क्या हम इतने कमजोर हो गये हैं कि हरकोई आता जाता हम पर हमले करता जाएगा और हमारी रीढ को कमजोर करता जाएगा ? जागो मेरे दोस्तों जागों नाकाम करों इन दहशत गर्दों के इरादों को और इन मौका परस्त राजनेताओं को खदेड़ डालो अपनी इस मेहनत से बनाई गयी धरती से जिसे हम वसुन्धरा कहते हैं।

Tuesday, July 15, 2008

दुखवा का से कहूँ......


अपनी इस परिस्थिती से कैसे रुबरु होउ कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हर बार अपने जीवन का होना बडा ही निरर्थक लगता है। पिछले दिनों से यही धारणा मुझे अपने घेरे में ले लिया है। इस अवसाद से निकलने का कोई रास्ता नहीं निकल रहा है। लग रहा है कि सब कुछ छूट गया बेहद पीछे और पीछे। हर संभव अपने आप को बटोटरने की कोशिश करता हूँ।लेकिन समुद्र के गर्त में समाते हुए सब डूबता लग रहा है। अब लिखने का साहस नहीं मिल रहा है। लिखूँगा फिर कभी जब यह असह्य पीडा......... विदा मित्रों.......।

Wednesday, July 9, 2008

चलो सजाओ दुकान आ गया राजनीति का मौसम



बाजार में हल्ला मचा कि गई अब कांग्रेस सरकार, वाम पंथियो ने अपना समर्थन वापस ले लिया। लगी सड़क पर सरकारी गाडियाँ तेज गति से दौडने, कोई नेता अपना गठजोड़ बैठा रहा है तो कोई अपनी फिराक में है कि इसबार तो समर्थन करने पर कुछ पारितोषिक के रुप में मंत्री पद मिल ही जाएगा। तो पिछले चुनाव में हारे राजनेता अपनी बारी के इन्तजार में हैं और चुनाव क्षेत्र में कूद पडे कि इसबार तो हरा कर के ही दम लेंगे और खोई हुई अपनी पगडी की लाज वापस लायेंगे। तो बाहुबली नेता अपने चमचों को इकट्ठा करने लेगे और चुनाव जीतने की जुगत भिडाने लगे। लेकिन किसी ने उस जनता कि सुध लेनी नहीं चाही जिसके दम पर अपनी राजनीति की दुकान चलाने वाले राजनेता इतरा रहें हैं। सबसे ज्यादा दुकान तो चल निकली है मिडिया के नाम के बडे रिटेल के माफिक सोच समझकर गणित बैठाने वालों की। मिडिया के हर एक खोमचे पर राजनेता नामक ग्राहक बैठा जनता को अपने पैतरे से अवगत करा रहा है। आँखे तरेर कर यह दिखा रहा है कि विरोधी पक्ष का समूल ही नष्ट कर डालेगा। लेकिन अन्दर अन्दर पकती खिचडी कुछ और ही दिखा रही है। विरोधियों के साथ ही मिलकर राजनीति की गाडी आगे बढाने का अवसर ढूँढ रहा है।किसी भी कीमत पर सरकार को बचाने का प्रयास कर रहा है। अपनी असफलता को भी नहीं जाहिर करना चाहता है। जनता के सामने यह तर्क कि हम जनता पर फिर एक बार चुनाव का बोझ नहीं डालना चाहते हैं। लेकिन मन कि इच्छा है कि कहीं कुर्सी ना चली जाए। सरकार से समर्थन वापस लेने का वामपंथियों के कई तर्क हैं जो कुछ हद तक सही लगते दिख रहे हैं।
लेकिन एक बात समझ से बिल्कुल ही परे है कि आखिर इतने साल साथ-साथ चलने के बाद कौन सी मजबूरी आ गयी जिससे सरकार से कदम से कदम मिलाने वाले अपने ही कदम पीछे लेने लगे। बात एक हो तो कहें मँहगाई सुरसा की तरह मुँह बाये जा रही है सरकारी सहायता तो दूर, कहा गया कि यह कुछ दिनों तक ऐसे ही बनी रहेगी। उपर से न्यूक्लियर समझौता भी भारी रुकावट पैदा कर रहा है सुचारु रुप से सरकार चलाने के लिए। खैर ये तो मुद्दे हैं जिन्हें सुनाकर मैं आपका कीमती वक्त बरबाद नहीं करना चाहूँगा। लेकिन दुकानदारी कि बातें जरुर सुनाउगा। पार्टी कार्यालयों में बडे जोर शोर से रंग रोगन होने लगे। पर्दे लगने लगे गद्दे बदले जाने लगे। अपने चुनाव क्षेत्र से आने वाले लोगों की जो राजनेता कभी सुध नहीं लेते था अब उनकी सेवा टहल में रात के बारह बजे भी दिखाई देने लगे। उनकी खातिरदारी में कोई कमी ना रह जाए इसलिए खानेपीने का प्रबंध चौबीसों घन्टे रहे इसलिए नये खानसामे को बुलाकर एक अलहदा रसोइ का ही प्रबंध किया गया है। इन सबों के अलावा अपनी उपयोगिता बनाए रखने के लिए गाहे-ब-गाहे नए और पुराने मुद्दों की सहायता ली जा रही है। विरोधी खेमे और सत्ता के खेमे दोनों में चक्कर लगाना जारी रखा गया है। अपनी पहुँच का इस्तेमाल करके मिडिया में भी वक्तव्य दिये जाने लगे जिससे अपने आप को खबरों में बराबर बना दिखाया जाए। अब अपनी राजनीति की दुकान सजाकर बैठे लोग बडे व्यापारी दिखने लगे जिससे सारी इनकी कही बातें सच प्रतीत होने लगी। बोली भी लगने लगी, सरकार बचाने के लिए मंत्री पद आपका इन्तजार कर रहा है स्वीकार करों...........।

Tuesday, July 8, 2008

मैं कब हम होगा…. ?


एक सवाल मेरे जेहन में बराबर कौंधता रहता है कि मैं कभी हम में बदलेगा या नहीं। अपनी अपनी परिस्थितियाँ हैं कि किस तरह से एक दूसरे के करीब लोग लाते हैं। अगर अपनी बात करूँ तो कभी भी मैं में नहीं जीता क्योकि यह एक ऐसी परिस्थिती है जो अगर हावी हो गया तो अहम को दिलो दिमाग पर छाप डालता है। खुद की परिस्थितियों पर अगर विचार करू तो सारी बातें मेरी समझ में भी आ जाती है कि मैं भी मैं की भाषा बोलता हूँ। लेकिन जब से नाम इंडियानामा जुडा है तो धीरे धीरे मैं हम में बदलते जा रहा है। ना कोई जात रहा ना कोई धर्म और ना ही कोई प्रांत-प्रदेश सब समान दिखने लगे। ये बदलाव अनयास नहीं हुआ लगे सालों साल इसके पीछे। हरबार अपनी पहचान को भूलाकर नई दिशा पर चल निकला एक दूसरे से लोगों को जोडने के लिए तो विचारों में भी बदलाव लाया और फिर हम कि राह पर निकल पड़ा। लेकिन घर में आज भी मैं मै ही हूँ कारण यही है कि जिसको जिस भाषा में समझाना चाहिए उसी भाषा में समझाता हूँ। मेरा यही अभी तक मानना है लेकिन हो सकता है कि इस विचार को त्यागना पडेगा ना कि मेरे लिए बल्कि हर किसी को। इस तर्क के पीछे एक छोटा सा वाकया आपको बताता हूँ , वो यूँ है कि अपनी घूमन्तू प्रवृति के चलते कई बार ऐसी जगहों पर निकल पड़ता हूँ कि कहना मुश्किल होता है कि कहाँ आ गया हूँ। हुआ ऐसा ही घूमते घूमते बहुत दूर निकल आया था। गाँव की पगडंडियाँ थी लेकिन चेहरे और भाषा बिल्कुल ही अन्जाने थे। हर कोई अपरिचित की निगाहों से देख रहा था।लेकिन अचानक मेरे दिमाग में ये बिजली कौंधी कि मैं कैसे इनको अपने से जोडूँ।क्योकि इन लोगों का शोषण काफी लोगों ने किया है अब बारी है इनको इनकी स्थिती का भान कराने का। इसलिए सबसे पहले वहाँ घूमते बच्चों के बीच शहर से लाई टॉफियों का अम्बार लगा दिया और बगल के खेत में चला गया हल जोतते किसान के साथ मैं भी शरीक हो गया। तब क्या था सबकी चुप्पी टूटी और मैं, मैं से हम में बदल गया।
यही बात अगर आप दुहराये तो हो सकता है कि आपके बीच का भी मैं कहीं खो जाये और हम में बदल जाये। आज के परिवेश में जितना जल्द यह बदलाव हो वह एक मध्यम वर्गीय के लिए अच्छा है। मसलन लगभग 2 करोड अबादी वाले शहर में रहने को घर का सपना देखने वालों लाखो लोग आज भी अपना दम फूटपाथ पर तोड़ देते हैं। आखिर घर नसीब होता है तो, उसीको जो जितना ही जल्द मैं को छोड़कर हम को अपना लेता है। ठेठ में बोलूँ तो जिसने एक दूसरे का हाथ पकडा उसने अपने सर के उपर छत पाया। मतलब साफ सहकारिता ने ही मध्यम वर्ग को सहारा दिया। सैकड़ो कॉपरेटिव सोसाइटी ने इस महनगर में लोगों को शरण दी। जिसके बदौलत लोगों के सर पर छत है। ये इतिहास गवाह है चाहे वो प्राकृतिक प्रकोप हो या वो मानव के जरिये बनाई संकट उससे निज़ात मिला है समवेत स्वर से उठाये विरोध से ही। आर्थिक प्रगति में नई क्रांति लाकर के दूध की नदी बहा दी आनंन्द गाँव ने। अमूल नाम से नई पहचान ही दे दी। महाराष्ट्र के हर इलाके में चीनी मिलें इसका जीता जागता उदाहरण हैं। ये किसी एक ने नहीं किया है सैकड़ो हाथों ने मिलकर किया है। तब किसी एक के भडकाने पर क्यों एक दूसरे के हम दुश्मन बन जाते हैं यह बडी गंभीरता से सोचने वाली बात है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी के भडकाने पर मैं से अलग हट कर हरकोई हम के रुप में आगे बढे और डटकर उसका मुकाबला करे और मैं के रुप मे खडा भडकाने वाले दानव का नाश कर डाले..... जरा गंभीरता से सोचिए......।