Monday, September 13, 2010

एक बार फिर....

पिछले लगभग एक बर्ष से मैं आप से दूर रहा हूँ कुछ कारण थे इस आप बीती को मैंने शब्दों में बाँधा है जो कि अब एक किताब की शक्ल में बदल गई है। जल्द ही आपके सामने होगी मैं कोशिश करुँगा कि पहले आप के सामने ही लाऊ जल्द मिलूँगा आपसे। मैं अपने आप के साथ आप से भी ये प्रण लेता हूँ कि अब हमेशा आपके सानिध्य में रहूँगा दूर नहीं जाऊगा क्योकि बेहद तकलीफ झेल ली....

Sunday, March 7, 2010

माया ममता मोह जाल...


आपके सामने भी कई बार ये समस्या आई होगी कि किसी की भावनाएँ आपको कुछ करने ना करने के लिए उसका रही होंगी तो कभी रोक रही होंगी। या कोई इन बंधनों में बांधना चाहता होगा। मैं केवल और केवल माँ के साथ निस्वार्थ रुप से ममता के बंधन में जरुर हूँ। माँ भी मेरे साथ समान रुप से है। लेकिन आज कल समाज में और परिवेश मे इस तरह के अलग अलग बंधनों को बाँधने के लिए कई लोग तत्पर हैं जो दिखाने की कोशिश करते हैं कि मैं ही आप का हितैषी हूँ और आपका सबसे करीबी। गाहे बगाहे ज्ञान भी दे डालते हैं कि आप लोग अपने बुजुर्गों का ख्याल क्यों नहीं करते। लेकिन जब उनसे थोडा आग्रह ये उम्मीद करो तो उसी समय कहने लगते हैं कि मेरी तबीयत इतनी खराब है कि मैं तो बिस्तर से हिल ही नहीं सकता। ये हकीकत मुझे तब महसूस हुआ जब मेरे खुद के भतीजे की तबीयत ज्यादा खराब हुई। घटना होली के दूसरे दिन की है, अचानक से खराब हुए तबीयत को देख कर मैं भी घबरा गया। बदले हुए माहौल को देख कर अंदाज ही नहीं लगता था कि किया तो क्या किया जाए। लेकिन आनन फानन में डॉक्टर के पास ले गया और वहाँ भर्ती करा दिया। छोटे शहर का डॉक्टर डर के मारे इलाज में कोई कोताही नहीं बरतना चाह रहा था। हर संभव इलाज करके निश्चिन्त होना चाहता था। लेकिन क्लिनिक और हॉस्पिटल की अव्यवस्था को देखर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उपर से क्लिनिक का इन्चार्ज डींगे हाकने में ही व्यस्त, कि अव्यवस्था के बावजूद राज्य के गवर्नर उसके क्लिनिक के दर्शन के लिए झुमेल लगाते हैं। क्लिनिक की अव्यवस्था को देखकर जल्द से जल्द भतीजे को वहाँ से ठीक करा कर घर ले जाने की फिराक में हम लोग थे। लिहाजा हम उस बिगडे व्यवस्था से जूझ रहे थे साथ ही भतीजे को जल्द स्वस्थ्य कराने की कोशिश भी।
इसी भागमभाग के बीच लगातार लोगों के फोन आते रहे हॉस्पिटल आने के लिए। समझ से परे था कि एक बीमार बच्चे से लोग मिलकर क्या जाहिर करना चाहते हैं या उसके परिवार वालों को ये दिखाने की कोशिश की आपकी चिन्ता हमें भी है। मैं कहता हूँ कि अगर सही में उनको चिन्ता थी तो शायद परिवारवालों से मिलकर अपनी बातों जाहिर कर सकते थे, तो शायद वो बेहतर होता। बार बार मुझे जताने की कोशिश कुछ समझ में नहीं आया। लगता है उन्होने अपने उस विचार को थोपने की कोशिश की कि वो मेरे वास्तविक हितैषी हैं। अगर शुभचिन्तक हैं तो मनषा कर्मणा और वचन से एक रहें दिखावा करने की चेष्टा ना करें तो बेहतर होगा। मैं तो कभी दिखावा में ना रहा और ना ही रहूँगा। लेकिन लोगों का आरोप है कि मैं ही दिखावा करता हूँ। खैर जो भी हो एक नया अनुभव दे गया ये वाकया। इस वाकये पर बरबस यही कहने को मन करता है कि जहाँ नहीं चैना वहाँ नहीं रहना.....

हकीकत ऐसा भी.....


हकीकत है कि कोई अपना कहने का आज भरे समाज में खोजने पर ही मिलता है। हर कोई यही कहता है कि संभव तभी है जब आप अपने पास हर किसी को देखे खोजे और समझे कि कोई तो है जो आप के पीछे दीवार की तरह अडिग है और जीवन भर रहेगा। लेकिन ना तो ये कभी होगा और ना ही ये समाज होने देगा। हमने बहुत सोचा कि इस बार तो विचार बदलेगा कुछ बातें हकीकत बनेंगी, लेकिन चालाक लोमडी की तरह एक दूसरे से आगे निकलने की होड में लोग कभी भी ये नहीं भूलते कि मानवता भी कुछ चीज है जिसे बडे मजे से जिया जा सकता है। सबसे बडा आश्चर्य तब होता है जब लोग जानते हुए भी इन बातों को दुहराते हैं जिससे ना तो सरोकार है और ना ही सुनने और महसूस करने में ही अच्छा लगता है। आप भी कहेंगे कि कहाँ बेसिर पैर की हाकने लगा है, कहीं कि बातें कहीं और जोड रहा है क्या कहेगा और करेगा क्या कुछ समझ में नहीं आ रहा है तो भाई मैं आप को बता दू कि मेरे कुछ अपने विचार थे उन्हीं को शब्दों के रुप में आप के सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ। विचार कहने से ज्यादा सटीक होगा कि ये वो हकीकत है जो खुद पर गुजर चुकी हुई है, इसलिए इसे अनुभव के दायरे मे रखना ज्यादा बेहतर होगा। आप के साथ के वो पल तो कभी भी हम नहीं भूल सकते हैं जब आपने हमें संबल दिया। संबल ऐसा वैसा भी नहीं, जब मैंने पब्लिक में लिखने की शुरुआत की उसी समय आप लोगों ने हौसले बढाए जिससे मैं और भी उत्साहित हुआ और बढचढ कर लिखने लगा। आपलोगों के हौसले ने मेरे लिए एक नई शुरुआत की काम की जिससे हमें लगने लगा कि आप मेरे परिवार के हिस्से हैं। ये ब्लॉग लिखने के पीछे वही कारण है, जिसे आप से मैं बाँट रहा हूँ।
आज मैं अपने उसी शहर में हूँ जहाँ पला-बढा, पढाई की और ढेरों मस्तियाँ भी, लेकिन ये शहर आज मुझे अनजाना सा लगने लगा है। चेहरे जाने पहचाने से लगते हैं लेकिन भावशून्य हैं। हर कोई बेगाना सा लगने लगा है, वो गलियाँ जिनमें भगा दौड़ करके दिन बीत जाया करता था अब नहीं लगता है कि वहाँ कभी वो उधम कूद हो सकेगी। हर कोई किसी स्वार्थ सिद्धि की लालसा में लगा रहता है। इन सबके पीछे कारण देखता हूँ तो लगता है कि बदलते समाज के चलते लोगों का नजरिया बदल गया है। कुछ परिवेश की राजनीति भी इसके पीछे का कारण है। जिसको मैं भली भाँति देख रहा हूँ समझ रहा हूँ लेकिन माहौल ऐसा है कि चुप रहना बेहतर समझ रहा हूँ आखिर देखें कब तक सहनशीलता जवाब नहीं हे पाता है। जब जवाब दे देगा उसी दिन संग्राम नहीं रण होगा जो बहुत भीषण होगा....

Friday, January 1, 2010

द्वार खोलो नया साल आया है....


नए साल की ढेरों बधाइयाँ, आप सबों को हमारी तरफ से साल 2010 बेहद तरक्की के साथ आनंन्द बिखेरे..
नया बरस के हर पल हर क्षण आप सबों का अभिमान बने,
रोज सरोज मास मधु पाखि संवत् सर अभिमान बने...।
एक नए संकल्प के साथ कि नए साल में आप इंडियानामा के जरिये ढेर सारी बातें बताउँगा.. एक बंधन में आप सबों को बाँधूगा जो कि आप को इंडिया के हर कोने से परिचित कराए... विदा मित्रों...

Monday, December 28, 2009

यही है पथ....


हर कदम एक परीक्षा यही नियती है भले ही हमारी हो या आपकी, लेकिन सच्चाई यही है। ये परीक्षा आपने खुद के जीवन में कई बार दुहराई होगी। लेकिन आखिर में तन्हा ही दिखा होगा सारा आकाश। कभी तो खुद का जीवन ही पूरा का पूरा एक परीक्षा का मंच कहें या यो कहें, कदम कदम पर परीक्षा होने लगती है। लगता है कि तलवार की धार पर चल रहे हैं। कई बातें हैं जिनमें आगे बढने की होड़ हो या किसी और तरह का दबाब जिसमें लगता है कि तलवार पर चले चलें, भले ही खुद के पैर जख्मी हो जाए। जबतक साँस है तब तक तो चला ही जा सकता है। लोग भले ही सोंच सकते हैं इससे होगा क्या आखिर, ये तो बिल्कुल मूढ व्यक्ति है। मैं कहता हूँ कि ये तेरा, ये मेरा, ये मैं तभी तक है जब तक शरीर में जान और अहं है। जब यही नहीं रहेगा तो कौन किससे मेरा तेरा करता रहेगा। रही बात की आखिर इससे मिलेगा क्या । तो कुछ बातें होती हैं जिसमें घाटा नफा नहीं देखा जाता है केवल और केवल तम को जलाया जाता है। शरीर का तम जैसे जले जलना चाहिए यही एक मात्र उद्देश्य होना चाहिए। परीक्षाएँ तो कक्षाओं में पास बहुत ही की होगी आपने भी और हमने भी, लेकिन कुछ हैं कि चाहते हुए भी उन परीक्षाओं से बाहर नहीं आया जा सकता है, शायद इसे ही ज़िन्दगी की हकीकत कहते हैं.... दो विचार आपस में गुत्थम गुत्था कर रहे हैं...लगता है मैं विषय से विषयांतर हो रहा हूँ... आगे थोडा ही लिख रहा हूँ....
यह लडाई, जो कि अपने आप से मैने ठानी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढी है,
यह पहाडी, पांव क्या चढते,जो धमनियों के भरोसे चढी है,
सही हो या गलत है,
अब तो पथ यही है।

और कितना बाँटोगे....


1947 के बँटवारे का दर्द हम आज भी झेल रहे हैं। ज़मीनों के बँटवारे हो गए जिसने दिलों पर लकीर खींच दी। एक बार फिर इन दिलों को बाँटने का सिलसिला शुरु हो गया। कोई कहता है भाषा के आधार पर बाँट दो तो कोई कहता कि नहीं, क्षेत्रफल और दूरियाँ ज्यादा है इस लिए एक और राज्य दे दो। दहल उठा समाज, होने लगी मारा-मारी, एक दूसरे के ही खून के प्यासे हो गये लोग। हर कोई नफरत करने लगे एक दूसरे से। राजनेता अपने ही राजनीतिक रोटियाँ सेकने में लगे हैं। कोई ये नहीं सोंच रहा है कि सदियों से साथ-साथ रहते आये लोंगों को ही एक दूसरे के खिलाफ भडका रहे हैं तो कहीं आगे चलकर यही उल्टे उनके उपर ही न आन पडे। 28 भागों में तो पहले ही बँट गए हैं और भी बाँटने की भरपूर कवायद शुरु है। कहीं जात के आधार पर तो कहीं धर्म के आधार पर लोग अपने अलग राज्य की माँग करने लगे हैं। वो दिन दूर नहीं कि आने वाले दिनों में चार गाँव वाले मिलकर कहने लगेंगे कि हमें भी एक अलग राज्य दे दो। अगर बँटवारा का सिलसिला यही रहा तो सिंन्धु प्रदेश कहे जाने वाला राष्ट्र महज कुछ ही किलोमीटर में सीमित रह जाएगा।
फिलहाल तो ज़मीनों की ही बँटवारा हो रहा है, आने वाले दिनों में जिस तरह से बँटवारा पर राजनीति हो रही कोई एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भी जाने के लिए हमें सोंचना होगा। तब क्या होगा ये सोंच कर मैं तो चिन्तित होता हूँ, शायद आप भी सोंचने लगेंगें इसकी कल्पना मात्र से। अभी महज कुछ सालों की ही बात है, जिसमें उत्तरांचल को उत्तर प्रदेश से अलग किया गया और झारखंड को बिहार से, लेकिन अगर इन इलाकों में प्रगति की सोंचे तो दूर-दूर तक कोई नामों निशान नहीं है। हाँ ये जरुर है कि राजनेताओं ने कई बेनामी संपत्ति जरुर बना ली। गरीब और गरीब होते गए जबकि खद्दरधारी मोटे सेठ के रुप में बदलते गए। सरकार भी इस तरफ से आँखें मूँद ली है इसके पीछे भी अपने ही स्वार्थ हैं कि लोग लडते रहें जिससे उनकी खामियों पर पर्दा पडा रहे। हालाकि इन बातों को ना तो गंभीरता से देखी जा रही है ना ही सूनी जा रही है। इस बँटवारे का विरोध करने वालों की आवाजें गूँज तो कतई नहीं सरकार के सामने फुस्फुसाहट से भी कम ही अपनी उपस्थिति दाखिल करा पा रही हैं। जिन लोगों के विकास की बातों की गई थी आज भी उनके पास ना तो खाने के आनाज के दाने हैं और ना ही तन ढंकने के लिए कपडे। कोफ्त होती है कि हमारे ही चुने लोग हमें नोंच नोंच के मार रहें हैं। बदले तो किसे बस केवल इनका मुँह तकते रहना है और कहना है, जमीन बाँट रहे हो , दिलों को बाँट रहे हो, पानी को बाँट दिया अब क्या धमनियों में चलनेवाले रक्त को भी बाँट डालोगे.....

Sunday, December 27, 2009

धीरे धीरे सब गए...


आप से वादा किया था कि मैं जरुर आपके पास फिर आउँगा। तो लिजिए एक बार फिर आपके सामने मुखातिब हूँ। आपकी और हमारी बात अधूरी रह गयी थी। जी हाँ मैं भूला हुआ नहीं हूँ, आपसे वायदा किया था कि मैं आपको दूसरी कडी सुनाने को। जनाब अब ज्यादा समय नहीं लूँगा हाजिर है दूसरी कडी---
पके आधे बाल मेरे,
हुए निष्प्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मंद होती,
देख रहा हूँ आ रही,
मेरे दिवस की अवसान बेला।...
ये कहानी यही कहती है कि धीरे धीरे सभी जाएँगे। लोकिन जीतेगा वही जो समय से अपना रण ले हरा दे उसे। लेकिन इसके लिए अद्मय हिमत की जरुरत है उस साहस की जो शायद मुझ से निकल गया है क्योकि जब दिवस का अवसान सामने दिखाई देने लगता है तो हर बात साफ और स्पष्ट दिखनी खुरु हो जाती है। मेरे साथ ये बातें एक एक अक्षर तक साबित हो रही हैं।