Thursday, April 19, 2018

क्या ख़ता हुई...


मैं हरबार सोचता हूँ कि‌ आखिर क्या ख़ता हुई ,
मुनासिब तो नहीं है आप का ऐसे खफा होना
नहीं हँसना अगर आया तो रोने से ही क्या होना
हजारों लोग हम जैसे सिसकते जो दिलों में ही
बुरा लगता नहीं है अब हमें इतना बुरा होना
अजब लाचार हैं हम, है अजब लाचारियाँ अपनी
किसी भी दर्द का होना नहीं मतलब दवा होना
सितारे रात भर रोते रहे अपने मुकद्दर पर
सरासर धाँधली है आसमाँ में चाँद का होना
हमें तकलीफ आखिर क्या, हमें नाराजगी क्यों हो
रहे छोटे हमेशा जो उन्हें क्यों हो बड़ा होना
नहीं पर्दा है उनके और हमाे बीच में कोई
अलग वे हों को क्योंकर हों, हमें क्यों हो जुदा होना ,!!

अंधेरा अच्छा लगता है


निर्वासन आत्मदाह,
से बेहतर
जीने की प्रबल चाह
ढहते हैं मूल्य अगर, ढहने दे!
ये तब की बातें हैं
जब अंधेरा से,
उजाला श्रेयस्कर ,
रक्त के रिश्ते से
दिल का रिश्ता बेहतर,
अब तो दिल कहता
मन को अंधकार में रहने दे !
अकूलाहट मे
शामिल हो
भीड़-भाड़ में अपने को खोज
मन को रोज  तिरस्कार सहने दे!!

मैं हारा नहीं हूँ


झर गया हूँ
पत्ते से कहता हूँ
पर टूटा तो नहीं हूँ!
टूट गया हूँ
पेड़ से कहता हूँ
पर उखड़ा तो नहीं हूँ!
उखड़ गया हूँ
जड़ से कहता हूँ
पर सूखा तो नहीं हूँ!
सूख गया हूँ
बीज से कहता हूँ
और चुप रहता हूँ!
इस नम अँधेरे में जन्मना है मुझे 
कहता हूँ अपने आप से
इस बार बीज की भांति!!

Friday, March 16, 2018

मैं दिल का किसान हूँ...

मैं दिल से आज भी किसान हूं। यह बात मुझे तब महसूस हुआ, जब मैं मुंबई में किसान मोर्चे को नजदीक और बारीक से देखा। 12 मार्च का दिन यूँ तो मुंबई के लिए बेहद ही खास है, क्योंकि 25 साल पहले इसी दिन मुंबई दहल उठी थी। लेकिन साल 2018 में इस 12 मार्च का दिन मेरे लिए खास रहा। आम दिन की तरह 11 मार्च को मैं रोजमर्रे के काम में व्यस्त था। यह तय था कि अगले दिन किसान मार्च मुंबई में पहुंचेगा, इसके लिए सारी तैयारियां भी हो चुकी थी। जगह जगह कैमरे और यूनिट में लगा दिए गए थे। लेकिन किसान रात में ही 11 मार्च को सोमैया ग्राउंड से आजाद मैदान की तरफ निकल पड़े। अब मेरे लिए चुनौती का समय था कि मैं अपने शिफ्ट को खत्म करके घर चला आउ या वहीं रुक जाऊं। जिम्मेदारी थी और उस जिम्मेदारी को निभाना भी था। जब किसान मुंबई के लोगों को सहूलियत को देखते हुए रात में ही निकल पड़े तो मैं भला कैसे अपने ऑफिस को छोड़कर घर चला आता। मैं भी वहीं रुक गया और रात करीब 1:00 बजे किसानों के साथ पैदल सफर पर निकल चला आजाद मैदान की तरफ।। तकरीबन 5:30 घंटे पैदल चलते रहे उस दौरान मैं आला पुलिस अधिकारी, महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और विशाल आदिवासी किसानों का हुजूम था। यह एक अलहदा अनुभव था। मुंबई में तकरीबन 22 किलोमीटर लगातार पैदल चलने का यह एक अनुभव था। मुंबई में कई तरह के बम ब्लास्ट हुए आतंकी हमले हुए बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई इन सब स्थितियों में मैंने पत्रकारिता की कलम को थामे रखा, तो तकरीबन 200 किलोमीटर का सफर तय करके आ रहे किसानों के लिए मैं अपनी कलम को विराम कैसे दे सकता था। मैं मौजूद रहा उनके बीच, उनके समस्याओं को सुना सोचा समझा और महसूस भी किया कि आखिर वह किस समस्याओं से जूझ रहे हैं। जंगल की जमीन को खेती लायक बनाते हैं लेकिन इस जमीन का मालिकाना हक उनके पास नहीं है। पथरीली जमीन पर हार तोड़ मेहनत कर उसे उर्वरा बनाते हैं लेकिन इस जमीन का मालिकाना हक उनके पास नहीं है। कहने को वह अन्नदाता है लेकिन सालों साल अकाल पड़ने सूखा होने या बाढ़ की स्थिति या होने पर उन्हें अनाज का एक दाना नसीब नहीं होता है क्योंकि उनके पास राशन कार्ड नहीं है। अपनी उपज की रक्षा वह वैसे करते हैं जैसे कोई मां अपने शिशु की रक्षा करती है , लेकिन फसल हो जाने पर बाजार में उनको उनकी लागत तक नहीं मिलती है। लिहाजा या तो सड़कों पर उन्हें फेंक ना होता है या यूं ही फसल सड़ जाती है। जिन नदियों का पानी उनके खेतों तक जाना चाहिए वह बड़े-बड़े मल्टीनेशनल कंपनियों तक जाता है कोक ,कोल्ड ड्रिंक्स और ऐसे पर बनाए जाते हैं कि नशे में लोग धुत्त हो जाते हैं अनाज का भरा पूरा खेत पानी के लिए तरसता रहता है। नेता मंत्री या कोई भी जो कि उनके मत पर यानी वोट पर सरकार में शामिल होता है या उनका प्रतिनिधित्व करता है उसे वेतन और पेंशन के रूप में लाखों रुपए मिलते हैं। इन अन्नदाताओं को वृद्धा पेंशन के रूप में महज ₹600 मिलते हैं जिससे इनकी गुजारा भी नहीं होती। बिजली का बिल इन्हें देख कर इनका सर चकराने लगता है कि आखिर यह अनाज उगाए या इस बिजली के बिल से अपना सर फोड़े। इस तरह की कई समस्याएं थी जिन्हें देखकर यह महसूस होता है कि हम जिन्हें अन्नदाता कहते हैं  वो कितनी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
              ‌‌‌‌ इन समस्याओं से रूबरू होते हुए जब मैं आजाद मैदान पहुंचा तो मुझे कोई थकान नहीं थी। दिल में यही था कि जिस तरह से महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया है कम से कम इन की बात माने सुनें और उनकी समस्याओं को दूर भी करें। लेकिन तब मुझे घोर आश्चर्य हुआ जब इन को मदद करने के नाम पर राजनीतिक दलों ने अपनी दुकान सजा ली। अपने-अपने पोस्टर और बैनर लगाकर टेबल सजा लिए, और इन्हीं कतार में लाकर खड़ा कर दिया कि आइए खाना ले जाइए और कुछ बिस्किट और पानी ले जाइए। अगर मदद ही करनी है तो उन्हें खाना देती और उनके पांव छूते क्यों कीजिए अन्नदाता आपके शहर में आए हैं उन्हें कतार में लगाकर हाथ पसारने पर मजबूर नहीं करना चाहिए था। वह दृश्य मुझे देखकर अचरज होने लगा कि आखिर ऐसे बुद्धिजीवी लोगों ने क्यों ऐसे किया इन भोले भाले किसानों और आदिवासियों को क्यों बे जा मूर्ख बना रहे हैं। तब और मुझे कोफ्त होने लगी जब इन राजनीतिक दलों ने मीडिया के सामने आकर यह कहना शुरू किया कि हमने उनकी मदद के लिए पानी दिया है बिस्किट दिया है खाने का सामान दिया है आप इसे मीडिया में दिखाइए मुझे कोफ्त होने लगी कि आखिर यह कौन सी मिट्टी के बने हैं कि इन्हें शर्म भी नहीं आ रही। तकरीबन 75 साल की उम्र में पैर में छाले हुए उस महिला को देखकर मुझे दिल कचोटने लगा कि वह किस उम्मीद से मुंबई में आई है और उसे क्या मिलेगा। उसी तरह से 10 साल के बच्चे को भी देख कर अजीब से मन में हलचल होने लगी कि वह मुंबई तो पहली बार आया है वह क्या देख रहा है। राजनीतिक दल महज एक वोट की तरह इन्हें देख रहे हैं इन्हें लुभाने की कोशिश कर रहे हैं अगली बार जरूर उन इलाकों में यह राजनीतिक दल पहुंचेंगे और वहां यह दिखाएंगे कि हमने आपकी मदद मुंबई में की थी। कौन सी मदद है किस तरह की मदद कर रहे हैं मदद की सबूत के तौर पर इनकी तस्वीरें रख रहे हैं अपने Twitter Facebook हर जगह इन लोगों की तस्वीरें वह टांग रहे हैं।
                खैर जब उनकी बातों को मैंने सुना कि हमने अपना दिल बड़ा किया मुंबई के किसी भी व्यक्ति को कष्ट नहीं होने दिया हम भले ही 15 घंटे चलकर आए इसके बाद बगैर आराम किए बगैर फिर चले तो मेरा भी दिल भर आया। सुबह तक मैं काम करते गया लेकिन मुझे कहीं कोई थकान महसूस नहीं हुई अगले पूरे दिन तक मैं काम कर सकता था, लेकिन बंधन था ऑफिस का मुझे लौट कर आना पड़ा।
                     ‌‌‌मैं यहां मैं यहां अपनी बात नहीं लिख रहा हूं मैं इंडियानामा के जरिए भारत के उस अन्नदाताओं से आपकी मुलाकात करा रहा हूं जिनकी सुध लेने वाले शायद ही सुध ले रहे हैं। उनका इस्तेमाल तो सब कोई कर रहा है लेकिन उनके बारे में सोचने वाले बेहद ही कुछ कम लोग हैं। शायद यह सरकार जरूर उनके बारे में सोचें और उनके लिए कुछ बेहतरीन फैसले ले जरूरी भी है क्योंकि अनाज आप फैक्ट्रियों में नहीं उगा सकते फैक्ट्रियों में किसी भी अनाज को आप नहीं बना सकते। अनाज के अवशेषों का आप इस्तेमाल फैक्ट्रियों में करते हैं लेकिन शुद्ध अनाज आप किसी भी मशीन के जरिए नहीं बना सकते। हरी सब्जियां कोई मशीन नहीं बना सकती। इन सारी चीजों को देखकर अगर मैं कहूं कि मैं भी किसान हूं तो इस बात पर मुझे फक्र महसूस होता है कि आखिर मेरी परवरिश जो हुई है देने के लिए ना कि लेने के लिए। दादी सही कहते थे कि बेटे हाथ सदा देने के लिए उठना चाहिए कभी भी हाथ लेने के लिए नहीं उठना चाहिए। अन्नदाता है देने वाले लेकिन बेचारे मजबूर होकर मुंबई में अपनी समस्याएं कहने आए कि कोई तो सुने।
आज तुम्हारे लिए कुछ पंक्तियां लिख दूं,
कौन जाने कल मेरी कलम चले ना चले?
परिस्थितियों की आपाधापी के इस दौर में मालूम नहीं,
मेरी कलम मेरे हाथ में रहे ना रहे....!


मन और अन्तर्मन एक साथ



मैं दरअसल आप सबों के मुखातिब होते रहा हूँ .. लेकिन आज कुछ अलग प्रयास हैं। प्रयास ये है कि मैं अपने विचार के साथ अपने अंन्तर्मन का विचार दोनों एक एक पंक्तियों में आपके सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ। इन दोनों विचारों में तारतम्य बेहद ही खास है कि जिससे ये अंतर ही नहीं महसूस होता है कि कौन से शब्द मेरे है और कौन से शब्द मेरे अन्तर्मन के। अब उन शब्दों को आपके सामने रखता हूँ।

ये दिल है कि बार बार कहता है ..
क्या कहता है..? 
ये बादल की रंगत, 
ये तितलियों की झिलमिलाहट, 
ईशारे करता है..
दूर क्षितिज के पीछे, 
चुपचाप कोई सपना पलता है ..!
ये सतरंगी बादलों पर बने इन्द्रधुष 
सा कोई अपना हर पाल आँखों में होता है, 
कभी सामने तो कभी ओझल होता है ..
बादलों का आना जाना हर पल होता है .., 
बूँदों का किस्मत धरती पर बरस कर 
सबकी प्यास मिटाकर घरती में खो जाना ही होता है ..।





Sunday, March 11, 2018

मैं भी किसान हूँ




जिस देश में नारा हो जय जवान जय किसान , वहाँ किसानों को सडक पर उतर कर अपना हक माँगना पडे, ये तो ऐसे ही लगता है कि भगवान को जय कहने वाले लोगों से भगवान खुद कह रहें हो कि तुमने मुझे सदियों से भूखा रखा है। दिल सोचने पर मजबूर होता है कि आखिर मैं भी तो किसान हूँ, क्या मेरे साथ भी किसी दिन इसी तरह का माहौल सामने आएगा। हालाकि खेत से मैं दूर इस महानगर में एक किसान से मजदूर हो गया हूँ, लेकिन दिल के कोने अंदरे में किसान की आतमा ही जग रही है। पिछले 10 साल से महाराष्ट्र के किसानों की हालत में बडे बारिकी से देख रहे हूँ आर समझ भी रहा हूँ। जितने किसानों ने आत्म हत्या की है उतने तो किसी महामारी में भी नहीं मरते। इनकी सुध लेने के लिए किसी के अंदर भावना जगी है इस बात पर संदेह ही हो रहा है।
                          इस मामले सॆ किनारा करने वाले ये जरूर कह सकते हैं कि ये किसी दल के जरिए प्रायोजित है इस लिए इस पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी नहीं है। लेकिन सोचिए जिस किसान का काम खेतों में अपने खून पसीने से सींचकर फसल उगाना है वो तकरीबन 200 किलोमीटर तक पैदल चला आ रहा है। पिछले सात दिनों से लगातार 30 हजार किसान महाराष्ट्र की राजधानी मुबई की ओर आ रहे हैं लेकिन सरकार की चुप्पी कह रही है कि इनके बारे में सोचने वाला शाय़द ही कोई व्यक्ति है। अपने कर्ज माफी , उपज की लागत का 50 प्रतिशत लाभ , नदियों को जोडने की माँग जिससे सिंचाई सुगम हो, स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिश पर अमल, जंगल जमीन पर खेती करने वालों को सहायता और सहुलियत , किसान सहायता राशि 600 रुपए से बढा कर 3000 रुपए करने की माँग करने वाले ये किसान कष्टदायक यात्रा कर कर आर्थिक राजधानी पर पहुच रहे हैं। लेकिन इनकी बात सुनने के लिए इक्का दुक्का नेता तो जरूर आ रहे हैं लेकिन किसी ने ये आश्वासन नहीं दिया कि आपकी सारी समस्या को दूर कर दिया जाएगा । नासिक से लेकर मुबई की काली स्याह सडके लाल झंडों से भर गईं लेकिन किसानों की समस्या का निदान निकालने के लिए आगे आने अपने लोग इस सोच में हैं कि कहीं अनकी सफेद पोशाक पर दाग ना लग जाए।
                       मेरे दिल का किसान यही कहता है कि जमाना बदल रहा है लेकिन हमारे लिए नहीं, उनके लिए जो छल और प्रपंच का इस्तेमाल करते रहते हैं और आगे बढने के लिए दूसरे को गला भी घोंट दें तो कम ही महसूस करते हैं। एक एक किसान का दर्द, उसके पैरों में उठे छाले, धूप से गर्म हुई सडकों पर चलते समय पांव का लडखऱडाते रहना., चलते चलते थक के प्यास से गले सूखना इन सबको अपने अंदर महसूस कर सकता हूँ।
महज एक दिन और शेष है शायद इन भाइयों, न्याय मिले और हँसी खुशी ये अपने अपने .. घर को लैट सके ...!
 के कवि किसान ..

बोओ, फिर जन मन में बोओ,
तुम ज्योति पंख नव बीज अमर,जग जीवन के अंकुर हँस हँसभू को हरीतिमा से दें भर।

पृथ्वी से खोद निराओ, कवि,मिथ्या विश्वासों के तृण खर,सींचो अमृतोपम वाणी कीधारा से मन, भव हो उर्वर।  


   




Saturday, March 10, 2018

भेद भाव कब तक...



पिछले दिनों एक बात देखी, समाज में असमानता कितनी है। इस बात को बड़ी शिद्दत से महसूस किया मैंने। अगर बात मध्यमवर्ग की होती या किसी खास वर्ग विशेष की होती तो बात इतनी खलती नहीं। यह बात उन के संदर्भ में थी जो देश के लिए गौरव और जी जान से अपनी शत प्रतिशत देने की कोशिश करते हैं। यहां पुरुष और महिलाओं का भेदभाव का साफ तौर पर दिखा। इसके बाद कई तर्क वितर्क दिए जा सकते हैं कहा यह जा सकता है कि जो भी मेहनताना तय किया गया वह अलग-अलग फॉर्मेट में खेलने से तय किया गया और चुकी महिलाओं का कई फॉर्मेट में हिस्सा लेना नहीं होता है इसलिए उनका मेहनताना कम है। अब आप समझ गए होंगे कि मैं किस विषय पर बात कर रहा हूं। दरअसल मैं बात कर रहा हूं बीसीसीआई के जरिए तय किए गए नए मानदंड के बारे में। बीसीसीआई के नए मानदंड तय किया है कि पुरुषों के लिएA+श्रेणी रहेगी जिसमें महज 5 खिलाड़ी हैं। कैप्टन विराट कोहली सहित इन के चार और खिलाड़ी हैं जो कि क्रिकेट के हर फॉर्मेट को खेलेंगे यानी 20 -20 , वनडे मैच और टेस्ट मैच भी खेलेंगे इनका मेहनताना 7 करोड़ रुपए सालाना है। उसी तरह से A ,B और C श्रेणी भी रखा गया है। जिन का अंतिम यानी सी श्रेणी का मेहनताना 1 करोड रूपए सालाना है।
       अब बात हाल ही में महिला दिवस पर बड़ी-बड़ी बातें लिखने और कहने वालों की भी सुन ले। भारतीय महिला क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए जिनकी श्रेणी A रखी गई है, जिसमें कैप्टन मिताली राज सहित तेज गेंदबाज झूलन भी हैं इनका मेहनताना महज 50 लाख रुपए सालाना रखा गया है। यानी पुरुषों के सबसे निचले श्रेणी से भी कम। इन लोगों ने हाल ही में देश का कीर्तिमान स्थापित किया है जो शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन इनके साथ पक्षपात का व्यवहार साफ दिखाता है कि अभी भी हमारी मानसिकता नहीं बदली है। इनके लिए किसी ने आवाज नहीं उठाई, सांसदों की अगर मासिक आय कम हो जाती है तो संसद में हंगामा मच जाता है लेकिन इनके लिए ना तो संसद में आवाज उठाना ही सड़कों पर किसी ने इनकी सुध भी ली है। हम कहते जरूर हैं कि हम महिलाओं को आगे लाएंगे महिलाओं के लिए सहूलियतें देंगे लेकिन कथनी और करनी में अंतर है। यह तो बात हो गई उस जगह की जहां सबकी निगाहें हैं जो सब उन्हें देखना चाहते है, कई लड़कियों और लड़कों के आदर्श होते हैं क्रिकेट खिलाड़ी लेकिन वहां भी सौतेला व्यवहार दिखी गया। अब उन जगह पर हम बात करें जहां घंटों काम के बोझ से लोग जूझते रहते हैं महिला और पुरुष भी लेकिन महिलाओं को क्या सहूलियत मिलती है। सबसे ज्यादा बलशाली महकमा, गृह मंत्रालय को ही माना जा सकता है। राज्य पुलिस बल में तैनात महिला पुलिसकर्मियों के हालात बेहतर नहीं हैं उनके कार्य स्थल पर ना तो उन्हें जरूरी सहूलियत मिलती है और ना ही उनके लिए कोई ऐसी व्यवस्थाएं रहती हैं जिससे वह अपने कार्य सुचारु रुप से कर सके। कार्य के दौरान विराम कर सकें ऐसी सहूलियत उनके लिए नहीं होती हैं। सरकारें इस पर सोचती क्यों यह आज भी मेरे मन में सवाल बार-बार कौन सा है। शायद आपके मन में भी यह विचार आता होगा लेकिन मैंने बड़े ही बारीकी और नजदीक से वह सारी चीजें देखी हैं जहां यह तकलीफें आज भी मौजूद है। कोई बहन कोई पत्नी कोई मां जरूर ही पुलिस में या उन वर्दीधारी सुरक्षाकर्मियों में रहते हैं लेकिन उनकी सहूलियतें नाम मात्र की सहूलियतों के नाम पर महज एक छलावा रहता है। उम्मीद है आप मेरी बातों से सहमत होंगे अगर सहमत हैं तो जरूर आप भी आवाज़ उठाए।एक आवाज से दो आवाज दो से तीन आवाज तीन से चार इसी तरह कड़ी से कड़ी जोड़ते रहे तब तक जब तक सरकारे सोते हुए से जाती नहीं।
  1. Team India (Senior Men)

(i)                 Introduction of a new category : A+
(ii)                New retainership fee structure

 Period
Grade A +
 Grade A
Grade B
 Grade C
Oct 2017 to Sept 2018
INR 7 Cr
INR 5 Cr
INR 3 Cr
INR 1 Cr

  1. Team India (Senior Women)

(i)                  Introduction of a new category : C

 Period
Grade A
 Grade B
Grade C
Oct 2017 to Sept 2018
INR 50 Lakhs
INR 30 Lakhs
INR 10 Lakhs