Sunday, January 1, 2017

संकल्प

आम तौर पर साल के शुरूआत में हर कोई कुछ नया करने या नई सोंच को आगे बढाने के लिए प्रतिबद्ध होता है। मैं भी एक तरह से संकल्पित हूँ आप सबों से कि नए साल में जरूर कुछ ऐसा करूँगा जिससे आप सबों से दूर नहीं रहूँ। लिहाजा हर दिन आप सबों से मुखातिब रहूँगा जिससे आपके बीच में ही रह सकूँ ।।।

Thursday, June 16, 2016

जिम्मेदारी ऐसी थी कि .. सब भूल सा गया था..

अगर मैं के बजाय हम कहूँ तो कुछ नजदीकी ज्यादा जान पडेगा। दरअसल मैं अब केवल मैं नहीं रहा हम में बदल गया हूँ। मेंरे बिछडे मुझे मिल गए हैं। इन बिछडे लोगों की संख्या अब दिन ब दिन बढते ही जा रही है। इन बढते लोगों के चेहरे पर खुशी देख कर मुझे भी खुशी मिलती है।यही वजह है कि जब मैने जिम्मेदारी संभाली तो भूल गया कि आखिर कितनी रातों से नींद नहीं ले पाया था। लेकिन शुक्र है कि सब बेहद करीने से निपट गया। जैसे एक महायज्ञथा और उस यज्ञमें शरीक सभी अपने अपने विधाओं से लैस थे। उन विधाओं में कहीं कुछ मुख्य अध्याय छूट ना जाए इस लिए चहुओर नजर बनाए रखना जरूरी थी। इस लिए कुछ बातों को नजंरअंदाज कर दिया कि आखिर इस दौरन दिखता कैसे हूँ। मैं तो अपने आप को ही भूल गया था। सालों बाद ऐसा मौका आया था, एक शक्ति मिली थी। हालाकि कई मित्रों की कमी जरूर खली। लेकिन सब एक ही ओर सिमटता है...
असीम आकाश का निस्तार खुलापन,
अनजानी राहों में भटकते पंछी,
अपरिचित दिशाएँ खोजती हवाएँ,
बादलों के बनते बिगडते झुरमुट,
और इन सबको देखती आँखे
जो महसूस करती हैं-बिल्कुल निजी क्षण वह
पर कौन,कहाँ, किसे कितना कह पाता है!..

Wednesday, August 19, 2015

समझ में आ गया रहस्य ...

आपका साथ मुझे नया उत्साह देता है।लेकिन ये तभी संभव हो पाता है जब में आपके संपर्क में आता हूँ, लेकिन कई बार इस संपर्क से मैं अलग हो जाता हूँ , जिससे उत्साह तो छोडिए मैं जीवन की राह ही छोजने लगता हूँ। लेकिन तकरीबन दो साल बाद आपके सामने आया हूँ। इस बीच काफी बदलाव हुए । जिसे मैने लडते हुए सहा। क्योकि पिछले अनुभव इतने कडवे थे जिसे सहज स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहींथा। लेकिन पता नहीं कहाँ से शक्ति आ जाती है कि फिर से अपनी कमान संभाल लेता हूँ । ये सब संभव हो पाता है आप सबों के सहयोग से ही। जब मैं अपना बंलॉग लिखना शुरु किया था, उस समय अगर कहा जाए तो में एक अनाडी था, हालाकि अब भी कोई अगड्धत्त नहीं हूँ। अभी भी कई तीजेंमम ऐसी है, जिसे सीखने की कोशिश कर रहा हूँ।लगता है समय के साथ सीख भी जाउँगा, खैर में आप को कुछ बातें संक्षेप में बताने की कोशिश करता हूँ। विगत दिनों भारत के कई हिस्सों में सफर किया, बहुत कुछ सीखा। हाँ मित्रता का रहस्य जिसे मैने पिछले दिनों अधूरा छोडा था, उस रहस्य को समझ गया कि ये कितना अविस्मिरणीय बंधन है। इस बंधन में अगर सही तरीके सं बंध गए तो बँध गए वरना सब कुछ बेकार। मेरे पिता जी कहते थे, कि जीवन में बहुत लोग अलग अलग समय पर मिलते हैं लेकिन वो तुम्हारे मित्र नहीं हो सकते, परिचित और कुछ समय के लिए साथी जरूर हो सकते हैं। हमने अपने कॉलेज के दिनों में बहुत कम लोगों से दोस्ती की , समय की धारा में कई लोग अलग अलग राह पर निकल गए थे। लेकिन वक्त ने एक बार फिर पलटा खाया और सब मिल गए। अब सभी एक साथ मिल गए हैं तो इन्हें सहेजने के लिए हर प्रयास कर रहा हूँ। ये भी कोशिश कर रहा हूँ कि नए दोस्तों और पुराने दोस्तोंमें सामंजस्य बैठाया जाए, जिससे जीने का मजा और आए। मित्रता का रहस्य है विश्वास अगर अक दूसरे पर पूर्ण विश्वास है तो आप एक दूसरे के परम मित्र हैं। लेकिन जिसने मुझसे मित्रता का चाह रखी पिछले दिनों उसे मुझ पर विश्वास नहीं था। इसलिए बात अधूरी ही रह गई। कॉलेज के दिनोंमें बने मित्रों को आज भी मेरे उपर विश्वास है इस लिए पुरानी मित्रता अभी तक चली आ रही है और मेर ख्याल के वक्त का पलटा खाना शायद मुझे संकेत ही दे रहा है कि जिस पर विश्वास कर सबकुछ भूलाने की कोशिश कर रहे हो वह छलावा है। इसलिए पुराने मित्रों से हर राज साझा करने में कोई हर्ज नहीं और मैने हर राज को साझा किया। ...शेष जल्द ही आपके सामने लाउँगा...
    

Saturday, August 16, 2014

मित्रता के रहस्य ..

हमनें मित्रता की शुरूआत या इसे समझना तब शुरू किया जब इसे महसूस किया! कॉलेज में आने के बाद कई तरह के मित्र मिलें. लेकिन मैं अपने दिल की बातें बेहद ही अपने आप में निहीत रखा इसे कभी जाहिर नहीं किया. लेकिन अचानक से मेरे दोस्तों ने जब नई तकनीकि की सहारा लेकर मोबाईल ग्रुप शुरू किया तो हम सब एक दूसरे के करीब आए.मित्रता दिवस के अवसर पर एक दूसरे को बधाई देते हुए दोस्तों ने कई संदेश दिए मैं उनका संंकलन आपके सामने रख रहा हूँ जरा आप भी इसे देखें और अपने विचार से अवगत कराए..
1.
ईश्वर ने हमारे शरीर
की रचना कुछ इस प्रकार की है
कि ना तो हम अपनी पीठ
थपथपा सकते है और ना ही स्वयं
को लात मार सकते हैं
इसलिए हमारे जीवन में मित्र होना जरुरी है..
2.
खवाहिश  नही  मुझे  मशहुर  होने  की।
आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है।
अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे।
क्यों  की  जीसकी  जीतनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे।
 ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा  भी   कितना  अजीब  है,
शामें  कटती  नहीं,  और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं....!!
3
एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी,
जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं,
 और  हार  जाओ  तो  अपने  ही  पीछे  छोड़  जाते  हैं।.


हम क्या दिखाने की कोशिश करते हैं ?

ये बात मेरे समझ से परे है कि आखिर लोग अपने प्रोफाइल जो कि आज कल आम है, क्यों इस तरह से रखते हैं कि बेहद अटपटा सा लगे। शायद अपने आप को कुछ ज्यादा ही अग्रगामी समझते हों ।यहाँ मैं अग्रगामी शब्द का उपयोग कर रहा हूँ क्योकि ये शुद्ध हिन्दी है। जरा आप भी गौर करें इन तरह तरह के प्रफाइलों को ये एक नमूना है इसके बाद भी कई इस तरह के प्रफाइल सामने आए हैं। जैसे एक और सामने आया है थोडा इसे भी गौर से देखिए तो शायद आपको भी अटपटा लगे। दरअसल ये सारी बातें
कहीं ना कहीं से ली गई हैं। भले ही वो किसी के लेखन से, कवित्त से या उनके किसी गद्य के अंश से लिए गए हैं। लेकिन अपने इस अपनी बेफिक्री दिखाने की कोशिश है। क्योकि हजार घर घूमने के बाद भी किसी को चैन नहीं आता है। लेकिन क्यों चैन नहीं आता ये आज तक मैं समझ नहीं सका हूँ। केवल इन बातों को उपरी तौर पर देखा जाए तो समझ में नहीं आता लेकिन जब इसके परिदृश्य और पिछला अंश को देखा जाए तो
इनकी गूढता समझनी होगी। हाल फिलहाल में कई बार इस तरह के लिखावट की हँसी उडाई गई। लेकिन मैने तो निश्चय कर लिया है अब रुकना नहीं है, अनवरत लिखते रहना है।  चलते चलते एक और नमूना आपको दे जाउँ इसे भी देखे क्योकि ये कुछ अजीबो करीब लगेगा। ये नमूने मुझे एक बार फिर आप से मुखातिब होने का कारण दे गए। उम्मीद है कि इस तरह के कई मसले मुझे आप से जोडे रखेंगे ।...

Sunday, August 3, 2014

कैसे बदल गया ज़माना


नमस्कार को टाटा खाया जूती खाया बाटा
अंग्रेजी के चक्कर में भई हुआ बड़ा ही घाटा
बोलो धत्त तेरे की
माताजी को मम्मी खा गई पिता को खाया डैड
दादाजी को ग्रैंडपा खा गए सोचो कितना बैड
बोलो धत्त तेरे की
गुरुकुल को स्कूल खा गया गुरु को खाया चेला
सरस्वती जी की प्रतिमा पर उल्लू मारे ढेला
बोलो धत्त तेरे की
चौपालों को बार खा गया रिश्ते खाया टी वी
देख सीरियल लगा लिपस्टिक बक बक करती बीवी
बोलो धत्त तेरे की
अंगरखे को कोट खा गया धोती खायी पैन्ट
अंगोछे को टाई  खा गई अत्तर को खाया सेंट
बोलो धत्त तेरे की
रसगुल्ले को केक खा गया दूध पी गया अंडा
दातुन को टूथपेस्ट खा गया छाछ पी गया ठंढा
बोलो धत्त तेरे की
बातचीत को चेट  खा गया चिट्ठी पत्री नेट
हुतुतू को ताश खा गई  गुल्ली  खाया बैट
बोलो धत्त तेरे की
परंपरा को कल्चर खाया हिंदी को अंग्रेजी
दूध दही के बदले पीकर चाय बने हम लेजी
बोलो धत्त तेरे की

                        

दोस्ती सदा के लिए

हमने दोस्ती की है, वो है सदैव के लिए! हमने ये भी तय किया है कि अपने दोस्तों के लिए समय निकालकर उनसे रू ब रू होउगा ! मैं स्वार्थी नहीं हूँ , इतना जरूर है कि दोस्ती जब की है तो उसे हमेशा के लिए निभाउगा भी! ये जरूर है कि मेरे लिए हर दोस्त जरूरी है और  मैं उनके लिए हर हद को जा सकता हूँ! मित्रों आप सबों को भी दोस्ती का ये दिन मुबारक ....  ये मित्रता का  प्रतीक है समुद्र मे सेतू ! आप को याद है... राम ने अपने मित्रों के बल पर ही समुद्र में सेतू का निर्माण किया था। खैर ये तो आधुनिक सेतू है, इसे ही प्रतीक के रूप में आपके सामने लाया हूँ...